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खेेलों में बेटियां : गौरवान्वित है भारत

डा. विजय गर्ग
08 दिसंबर 2025

New Delhi : भारत में खेलों के परिदृश्य में हाल के वर्षों में युगांतकारी बदलाव आया है. बड़ी बात यह कि इस बदलाव की मुख्य नायक हैं भारत की बेटियां. हरमनप्रीत कौर (Harmanpreet Kaur) और शेफाली वर्मा (Shefali Verma) से लेकर पीवी सिंधु (PV Sindhu), मीराबाई चानू (Mirabai Chanu) और लवलीना बोरगोहेन (Lovlina Borgohain) तक ने न केवल अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत का परचम लहराया है, बल्कि लाखों युवा लड़कियों के लिए प्रेरणा का स्रोत भी बनी हैं. इस परिप्रेक्ष्य में यह कहना अतिश्योक्ति नहीं कि भारत में खेल ‘खुशनुमा दौर’ में है, महिला खिलाड़ियों (Female Players) की अभूतपूर्व सफलता से इसकी चमक और भी निखर रही है. भारत की बेटियों ने लगभग हर खेल में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करायी है. भारतीय महिला क्रिकेट टीम (Indian Women’s Cricket Team) की हालिया सफलता जिसमें 2025 में वनडे वर्ल्ड कप (Oneday World Cup) और टी-20 वर्ल्ड कप (T-20 World Cup) जीतना शामिल है, जो महिला क्रिकेट (Women’s Cricket) को नयी ऊंचाइयों पर ले गयी है. इससे महिला क्रिकेट के प्रति देश में एक नया जुनून पैदा हुआ है.

बन गया मजबूत सिलसिला

कर्णम मल्लेश्वरी (Karnam Malleswari) के सिडनी 2000 ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने के साथ शुरू सफर अब एक मजबूत सिलसिला बन चुका है. पीवी सिंधु (बैडमिंटन), मैरी कॉम (बॉक्सिंग), साक्षी मलिक (कुश्ती) और मीराबाई चानू (भारोत्तोलन) ने लगातार ओलंपिक और विश्व चैंपियनशिप में पदक जीतकर यह साबित किया है कि भारत की महिला खिलाड़ी विश्व स्तर की प्रतिस्पर्धाओं (World Class Competitions) के लिए पूरी तरह तैयार हैं. कबड्डी (Kabaddi), हॉकी (Hockey), शूटिंग (Shooting) और एथलेटिक्स (Athletics) जैसे खेलों में भी महिला टीमों और खिलाड़ियों, जैसे रानी रामपाल (Rani Rampal) की कप्तानी में हॉकी टीम या हिमा दास (Hima Das) का प्रदर्शन सराहनीय रहा है. भारत में यह खुशनुमा दौर यूं ही नहीं आया है. इन महिला खिलाड़ियों में से अधिकतर ने गरीबी, सामाजिक रूढ़ियों और लैंगिक भेदभाव (Gender Discrimination) जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना किया है. छोटे शहरों और ग्रामीण परिवेश, जहां खेल को आमतौर पर लड़कियों के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता था, से निकलकर शीर्ष पर पहुंचना उनके अटूट हौसले, दृढ़ इच्छा शक्ति और कठोर परिश्रम का परिणाम है.

सुधरा है प्रशिक्षण का स्तर

मैरी कॉम का मुक्केबाजी के लिए संघर्ष, हिमा दास का धान के खेतों से निकलकर ट्रैक पर धूम मचाना और कई अन्य खिलाड़ियों की कहानियां दर्शाती हैं कि सुविधाएं सफलता की गारंटी नहीं होंती. इच्छाशक्ति, मेहनत और हौसला ही चैंपियन (Champion) बनाते हैं. इस खुशनुमा दौर के लिए सरकारों और खेल संघों का सहयोग भी महत्वपूर्ण कारक रहा है. ‘खेलो इंडिया’ जैसी पहल ने जमीनी स्तर पर प्रतिभाओं (Talents) को पहचानने और उन्हें प्रशिक्षित (Trained) करने में मदद की है. हॉकी इंडिया जैसी संस्थाएं अब खिलाड़ियों को बेहतर उपकरण और सुविधाएं (Better Equipment and Facilities) प्रदान कर रही हैं. इससे प्रशिक्षण का स्तर सुधरा है. पुरस्कार राशि और सम्मान में वृद्धि से महिला खिलाड़ियों को खेलों में करियर बनाने के लिए प्रेरित किया है. वह समय अब बीत चुका है जब खेलों को लड़कियों के लिए ‘दूसरी प्राथमिकता’ माना जाता था. आज वे खेलों में करियर तलाशने से झिझकती नहीं, बल्कि दृढ़ संकल्प के साथ आगे बढ़ती हैं. यह बदलाव अभिभावकों की सोच, सरकार की नीतियों और खिलाड़ियों की इच्छाशक्ति तीनों के संयुक्त प्रयासों का परिणाम है.

हर खेल में छोड़ी है अपनी छाप

भारतीय बेटियों ने लगभग हर खेल में अपनी छाप छोड़ी है. बॉक्सिंग (Boxing) में निकहत जरीन (Nikhat Jarin) और लवलीना बोरगोहेन, बैडमिंटन में पी.वी. सिंधु और साइना नेहवाल (PV Sindhu and Saina Nehwal), वेटलिफ्टिंग (Weightlifting) में मीराबाई चानू, कुश्ती (Wrestling) में विनेश फोगाट और साक्षी मलिक (Vinesh Phogat and Sakshi Malik), एथलेटिक्स (Athletics) में हिमा दास और ज्योति याराजी (Hima Das and Jyoti Yaraji), हॉकी और क्रिकेट टीमों में युवा खिलाड़ी, इन सभी ने अपने प्रदर्शन से यह सिद्ध किया है कि प्रतिभा लिंग पर निर्भर नहीं होती. ये उपलब्धियां आसान नहीं थीं. सामाजिक दबाव, संसाधनों की कमी, पारिवारिक आर्थिक चुनौतियां और खेल सुविधाओं के अभाव के बीच बेटियों ने अपने सपनों को संयोजे रखा. फिटनेस, कठोर अभ्यास और मानसिक सहनशक्ति के बल पर उन्होंने वे सीमाएं तोड़ीं, जिन्हें कभी उनके लिए असंभव माना जाता था.

पीछे धकेलना अब आसान नहीं

बेटियां आज सिर्फ खेल नहीं रही हैं, बल्कि खेल की भाषा बदल रही हैं. वे आत्मविश्वास (Self-Confidence), अनुशासन (Discipline) और पेशेवर दृष्टिकोण का नया मानक स्थापित कर रही हैं. मैदान में उनका आक्रामक और निर्भीक खेल यह संदेश देता है कि भारतीय महिलाओं को अब पीछे धकेलना आसान नहीं है. इन बेटियों की सफलता महिला सशक्तीकरण (Women Empowerment) के एक बड़े आंदोलन का प्रतीक है. जब एक बेटी खेल के मैदान पर तिरंगा (Tiranga) लहराती है, तो वह पूरे देश को, खासकर अन्य लड़कियों को, यह संदेश देती है कि सपने देखना और उन्हें पूरा करना संभव है. उन्हें समान अवसर और सहयोग मिले, तो वे खेल के हर क्षेत्र में अद्वितीय कीर्तिमान स्थापित करती रहेंगी और देश का गौरव बढ़ाती रहेंगी.

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