कितना बदल गया इंसान… किराये पर दादा-दादी भी!

विजय गर्ग
22 दिसम्बर 2025
हाल में जापान (Japan) में ‘ओके ओबाचान’ नाम की सेवा शुरू की गई है जिसमें 60 से 94 साल तक की महिलाएं किराये पर दादी (Grandmother) का रोल निभाती हैं. कोई परिवार उन्हें कुछ घंटों के लिए घर बुलाता है, वे बच्चों की देखभाल करती हैं, खाना बनाती हैं, बातें करती हैं और जरूरत पड़ने पर रिश्तों या जीवन से जुड़े सुझाव भी देती हैं. इस सेवा का उद्देश्य दोहरा है- बुजुर्ग महिलाओं को आय और उद्देश्य देना और अकेलेपन से जूझते युवाओं एवं परिवारों को मां या दादी के प्रेम का अनुभव कराना. भारत से भी इसी तरह की खबर सामने आयी जब आगरा (Agra) के रामलाल वृद्धाश्रम (Old Age Home) ने हाल में ‘रेंट ए ग्रैंडपैरेंट’ नाम की सेवा शुरू की. यहां परिवार महीने भर के लिए 11,000 रुपये देकर किसी बुजुर्ग को घर ला सकते हैं. आश्रम का तर्क है कि इससे बच्चों को दादा-दादी (Grandparents) या नाना-नानी (Maternal Grandparents) का प्यार मिलेगा और बुजुर्गों को घर जैसे माहौल में रहने और आय का अवसर मिलेगा.
यह है पृष्ठभूमि
भारत की पारंपरिक पारिवारिक संरचना हमेशा से संयुक्त परिवार (Joint Family) पर आधारित रही है. यहां दादा-दादी बच्चों के जीवन का अहम हिस्सा माने जाते हैं. कहानियों, लोकगीतों और अनुभवों से वे बच्चों को जीवन जीने की कला और मूल्य सिखाते हैं, लेकिन शहरीकरण, नौकरियों के दबाव और करियर की दौड़ ने पारिवारिक ढांचे को बदल दिया है. अब महानगरों और शहरों में अधिकतर परिवार एकल रूप में रहते हैं. बच्चे दादा-दादी के साथ बड़े होने का अनुभव खो रहे हैं और बुजुर्ग भी अकेलेपन से जूझ रहे हैं. यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें ‘रैंट ए ग्रैंडपैरेंट’ जैसी सेवा जन्म ले रही है. भारत में बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ रही है. अनुमान है कि 2050 तक लगभग 20 प्रतिशत आबादी 60 साल से ऊपर होगी. ऐसे में वृद्धाश्रमों और देखभाल केंद्रों पर दबाव बढ़ेगा.
पैसे से खरीदे नहीं जा सकते रिश्ते
दूसरी ओर, बच्चे अपने दादा-दादी के बिना बड़े हो रहे हैं जिससे उनकी सांस्कृतिक जड़ें कमजोर हो रही हैं. इस लिहाज से यह सेवा कुछ हद तक एक व्यावहारिक समाधान लग सकती है, लेकिन स्थायी समाधान यह नहीं है. दरअसल भारत की जरूरत केवल किराये पर दादा-दादी नहीं है, बल्कि ऐसे प्रयास हैं, जो स्वाभाविक रूप से पीढ़ियों को जोड़ें. मोहल्लों और सोसायटी (Neighborhoods and Societies) स्तर पर कार्यक्रम, स्कूलों में बुजुर्गों की भागीदारी, सामुदायिक केंद्रों में पीढ़ियों का संवाद ऐसे रास्ते हैं जिनसे बच्चों और बुजुर्गों को जोड़ना संभव है. सरकार और संस्थानों को भी चाहिये कि बुजुर्गों के लिए बेहतर स्वास्थ्य सुविधा (Health Care), रोजगार के अवसर और सामाजिक जीवन की व्यवस्था करें, ताकि उन्हें मजबूरी में किराये पर जाना न पड़े. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि रिश्ते पैसे से खरीदे नहीं जा सकते. उन्हें समाज और परिवार की जिम्मेदारी के तहत ही फिर से जीवित करना होगा.
(लेखक सेवानिवृत प्रिसिंपल मलोट पंजाब)
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