मदन वात्स्यायन : घर के नाम पर एक झोपड़ी भी नहीं

बिहार के जिन प्रतिष्ठित साहित्यकारों की सिद्धि और प्रसिद्धि को लोग भूल गये हैं उन्हें पुनर्प्रतिष्ठित करने का यह एक प्रयास है. विशेषकर उन साहित्यकारों, जिनके अवदान पर उपेक्षा की परतें जम गयी हैं. चिंता न सरकार को है, न समाज को और अनेक मामलों में न उनके वंशजों को. इस बार प्रयोग और प्रगति के साहित्यवादों के समय में अपनी अलग पहचान रखने वाले मदन वात्स्यायन की स्मृति के साथ समाज और सरकार के स्तर से जो व्यवहार हो रहा है, उस पर दृष्टि डाली जा रही है. आलेख की यह चौथी कड़ी है.
अश्विनी कुमार आलोक
02 जनवरी 2026
यह मनियारी (Maniyari) गांव था, जहां बलान पर एक पुल खड़ा था. इस पुल को पार करते ही गढ़सिसई (Garhsisai) गांव आनेवाला था, इसीलिए मैंने किसी से स्वाभाविक ही पूछ लिया- ‘डा. श्रीनिवास सिंह (Dr. Srinivas Singh) का घर किधर है?’ मैंने जानबूझ कर मदन वात्स्यायन (Madan Vatsyayan) के बड़े भाई का नाम लिया; क्योंकि कवियों को स्थानीय तौर पर कम पहचाना जाता है. उसने बताया- ‘वो तो मर गये, यहां कोई नहीं है.’ मैंने दुबारा पूछा- ‘घर तो होगा?’ उसका उत्तर था- ‘कुछ नहीं है. यह नदी जो है, आधी नदी उन्हीं की जमीन में बहती है. घर के नाम पर एक झोपड़ी भी नहीं. घर रहने से होता है, नहीं रहे तो घर वन में तब्दील हो जाता है. आपको मिलना है, तो नवरात्रा में आइयेगा. उनके भतीजे गुड्डू बाबू दुर्गा पाठ करने आते हैं. मंदिर है, वहीं दुर्गा पाठ करते हैं.
कुलदेवी का मंदिर
उस व्यक्ति ने बताया-उनके घर के सब लोग बाहर-बाहर ही रहे. कुछ लोग शायद समस्तीपुर (Samastipur) और मोतिहारी (Motihari) में रहते हैं. गोतिया के लोगों से मिलना है, तो दया बाबा हैं. चले जाइए.’ मैं आया था, तो जाना ही था. पुल पार करते ही जो गांव मिला, उसमें आबादी का घनत्व कदाचित कम था. हल्दी और ओल के खेत बनाये जा रहे थे. धूप कड़ी थी, लेकिन हरे पेड़ों का स्नेह सुलभ था. मेरी भेंट दया बाबा से नहीं हुई. कड़ी धूप वाले दोपहर को शयन के लिए समर्पित किया जाता रहा है, दया बाबा सो रहे थे. दया बाबा अर्थात दयानंदन सिंह (Dayanandan Singh) , अस्सी पार के वृद्ध. उन्हें जगाना ठीक नहीं था. उनके घर से सटकर बनी हुई पीच सड़क की दूसरी तरफ है बंदी मंदिर (Bandi Mandir) . यह मंदिर मदन वात्स्यायन के बड़े भाई डा. श्रीनिवास ने बनवाया था. बंदी उनकी कुलदेवी का नाम है.
कोई था ही नहीं
भूमिहारों में भी कुल देवी के रूप में ‘बंदी’ अथवा ‘बन्नी’ को मानने की परंपरा है, यह मुझे नहीं मालूम था. लोक साहित्य में मेरी गहरी रुचि है, लेकिन लोक भावों को जानने-समझने के न जाने और भी कितने पक्ष मुझसे दूर-दूर हैं. लोकदेवी बंदी श्रीकृष्ण और बलराम की लोकदेवी मानी गयी हैं, बिहार में लोक-संस्कृति के अनुरूप उन्हें पूजने की परंपरा अनेक जातियों में रही है. बंदी कुलदेवी हैं, लेकिन घर के बाहर किसी बरामदे पर उनकी स्थापना की जाती रही है. यहां तो एक मंदिर ही बना दिया गया था. लेकिन, मंदिर बंद मिला, किसी पिंडी आदि के दर्शन न हुए. कोई था ही नहीं, जो कुछ बताता.
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एक पाया मिला, अकेला प्रस्तर स्तंभ
बंदी मंदिर के समीप हनुमान मंदिर (Hanuman Temple) है. लोक-संस्कृति में हनुमान को दिक्पाल अथवा द्वाररक्षक की तरह भी देखा गया है. मंदिर से सटे एक पाया मिला. अकेला प्रस्तर स्तंभ, उदास-उदास सा. जैसे स्मृतियों के किसी घनघोर तिमिर में खड़ा हो, निःशब्द-निरर्थक. यह कभी मुख्य द्वार रहा होगा, उस बड़े से घर का जो अब नहीं है. जमींदारी ठाठ की हवेली का आकार करीब चार बीघे में विस्तृत था. अब वहां ईंट-रोड़े के भग्न अवशेष हैं, कुछ ईंटें पश्चिमी दिशा में बचाकर रखी गयी हैं, जो सामान्यतः नहीं दिखीं. ईंटों पर जंगलों का जमावड़ा था, स्वतंत्र घास-फूसों की सघनता. मैं कुछ न कर सका, निराश होकर लौट आया. मदन वात्स्यायन के घर की कोई कल्पना ही जेहन में नहीं उभरी.
नहीं था कोई संस्मरण
नवरात्रा के समय भी कड़ी धूप थी. लेकिन इसी समय मुझे मदन वात्स्यायन के भतीजे गुड्डू बाबू (Guddu Babu) मिलते. निकल पड़ा. मैं इस बार अकेले नहीं था, साथ में पत्रकार मित्र सकलदीप कुमार थे. रास्ता भी दूसरा था, मोहिउद्दीननगर (Mohiuddinnagar) होते हुए बढ़ौना गांव के बाद गढ़सिसई पहुंचना था. गढ़सिसई चौक पर देवी दुर्गा के समीप बैठे लोगों से पूछा. वहीं उपेंद्र सिंह नामक बुजुर्ग बैठे मिले. मदन वात्स्यायन गोतिया में उपेंद्र सिंह के दादा लगते थे. उपेन्द्र सिंह एकाध बार मदन वात्स्यायन के घर सिंदरी (Sindri) गये थे, लेकिन उनके पास वैसा कोई संस्मरण नहीं था, जिसे वह सुनाते-बताते.
आकाशवाणी की ‘मैना बहिन’
बताने को उनके पास इतना था कि मदन वात्स्यायन कुल सात भाई थे, जिनमें से एक शशिनिवास सिंह की मृत्यु अविवाहित अवस्था में ही हो गयी थी. भाइयों में बड़े डा. श्रीनिवास थे, जिनकी पत्नी आकाशवाणी, पटना (Akashvani, Patana) के ‘चौपाल’ (Choupal) कार्यक्रम में ‘मैना बहिन’ बनती थीं, परिजन अमेरिका (America) में बस गये. मदन वात्स्यायन सिंदरी में रहे. उनका स्थानांतरण बरौनी (Barauni) उर्वरक कारखाने में हुआ था, आये नहीं. मदन वात्स्यायन की पत्नी ललिता सिन्हा (Lalita Sinha) मुजफ्फरपुर (Muzaffarpur) के एमडीडीएम कालेज (MDDM College) की प्राचार्या (Principal) थीं. बाद में बिहार विश्वविद्यालय (Bihar University) में कुलपति (Vice Chancellor ) हुई थीं. बेटे कनाडा (Canada) में जा बसे थे और बेटी का विवाह मोतिहारी में हुआ था.
जीवित हैं एक भाई
एक भाई शचिनिवास प्रोफेसर थे. गिरीशनिवास नामक भाई गढ़सिसई की जमींदारी देखते थे. लेकिन, बाद में वह भी सिकटिया नामक गांव में बस गये. उपेन्द्र सिंह ने बताया कि सिकटिया गांव उत्तर प्रदेश में है, लेकिन किस जिले में है, यह नहीं बताया. ललितनिवास नामक भाई गांव गढ़सिसई में रहते थे, 2003 में उनकी मृत्यु हो गयी. आजादी के बाद गढ़सिसई में पहले निर्वाचित मुखिया हुए थे. मदन वात्स्यायन के सबसे छोटे भाई रविनिवास (Ravinivas) आयुर्वेदिक दवाओं का व्यवसाय करने गुड़गांव गये थे, वहीं बस गये. मदन वात्स्यायन के एकमात्र भाई रविनिवास ही जीवित हैं.
कहां कौन रहते हैं, किसी को नहीं मालूम
उपेन्द्र सिंह से और बात करनी थी, लेकिन, बात ही नहीं रही. उन्होंने यह भी कह दिया कि गृहभूमि है, पर वहां बात करने को कोई मिलेगा नहीं. दो घंटे पूर्व गुड्डू बाबू गढ़सिसई में थे, दुर्गा पाठ करने आये थे. रोज आते हैं, समस्तीपुर लौट जाते हैं. गुड्डू बाबू मदन वात्स्यायन के भतीजे हैं. ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के पूर्व स्नातकोत्तर हिन्दी विभागाध्यक्ष डा0 चन्द्रभानु प्रसाद सिंह ने बताया था कि समस्तीपुर के अतिरिक्त लखनऊ और पटना में भी मदन वात्स्यायन के भाइयों के वंशज रहते हैं. लेकिन कहां कौन रहता है, यह गांव वालों को भी ठीक से पता नहीं.
पांचवीं एवं अंतिम कड़ी: किसी को कोई मतलब नहीं रहा गांव से
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