मदन वात्स्यायन : कुछ नहीं लिखा अंतिम चार दशकों में

बिहार के जिन प्रतिष्ठित साहित्यकारों की सिद्धि और प्रसिद्धि को लोग भूल गये हैं उन्हें पुनर्प्रतिष्ठित करने का यह एक प्रयास है. विशेषकर उन साहित्यकारों, जिनके अवदान पर उपेक्षा की परतें जम गयी हैं. चिंता न सरकार को है, न समाज को और अनेक मामलों में न उनके वंशजों को. इस बार प्रयोग और प्रगति के साहित्यवादों के समय में अपनी अलग पहचान रखने वाले मदन वात्स्यायन की स्मृति के साथ समाज और सरकार के स्तर से जो व्यवहार हो रहा है, उस पर दृष्टि डाली जा रही है. आलेख की यह तीसरी कड़ी है.
अश्विनी कुमार आलोक
01 जनवरी 2026
मदन वात्स्यायन (Madan Vatsyayan) का जन्म 4 मार्च 1922 को समस्तीपुर (Samastipur) जिले के वीर सिंहपुर में हुआ था. उनका मूल नाम लक्ष्मीनिवास सिंह (Lakshminiwas Singh) था. उन्होंने इलाहाबाद (Allahabad) विश्वविद्यालय (university) से एमएससी और इंगलैंड (England) से केमिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी, सिंदरी (Sindri) के खाद कारखाने में नौकरी की थी. ‘तीसरा सप्तक’ (Teesara Saptak) के प्रकाशन के बाद कुछ दिनों तक कविताएं, गीत लिखते रहे थे. फिर उन्होंने कुछ सानेट लिखे थे. अपने जीवन के अंतिम चार दशकों में उन्होंने प्रायः कुछ नहीं लिखा था. दिल्ली (Delhi) में परिजनों के यहां रहते हुए उन्हें मेनिनजाइटिस (Meningitis) की बीमारी हो गयी थी. 11 जुलाई 2004 को 82 वर्ष की अवस्था में उनका वहीं निधन हो गया.
मन आगे-पीछे करने लगा
मैं गढ़सिसई (Garhsisai) जाने के रास्ते पर था. मदूदाबाद से विश्वासपुर होते हुए जो पुराना रास्ता निकला है, उसकी सड़क अपेक्षाकृत पतली है. घनी आबादी के बीच से निकली हुई सड़क में थोड़ी सावधानी तो चाहिए ही. मोटरसाइकिल की गति में थोड़ी तीव्रता दिखानी हो, तो वरुणा पुल से दलसिंहसराय (Dalsinghsarai) की ओर बनी चौड़ी सड़क उपयुक्त रहती है. मैंने दलसिंहसराय की ओर जाने के लिए इन दोनों सड़कों का कई बार उपयोग किया है. फर्क यही है कि गढ़सिसई- पीपरपांती के रास्ते पर मदूदाबाद से पहुंचने के लिए मध्य विद्यालय से मुझे उत्तर मुड़ना पड़ता. वरुणा पुल से सीधे पूरब बढ़ गया. जब बहादुर अरमौली आया, तो मेरा मन आगे-पीछे करने लगा.
नाच परंपरा के उस्ताद
इसी गांव में रामखेलावन थे, जो कभी भिखारी ठाकुर (Bhikhari Thakur) की उत्तरवर्ती नाच परंपरा के उस्ताद होकर उभरे थे. लोककला के उस प्रसिद्ध व्यक्तित्व से मिलकर बात करने के लिए मुझमें जो इच्छा जगी थी, वह नयी नहीं थी. करीब डेढ़ दशक पुरानी थी. उस समय वह जीवित थे. मुझे लगा कि इस बार उनसे भी मिल ही लेना चाहिए, लेकिन क्या पता कि वह जीवित हों भी या नहीं. मैंने किसी जगह रुककर पूछताछ करना बहुत उपयुक्त नहीं समझा. वैसे भी हरिभजन के रास्ते में कपाट ओटने बैठ जाना मेरी प्रवृति रही है. इस प्रवृति से कई नुकसान भी हुए हैं. अब मैं ‘एक पंथ पर एक काज’ लेकर चलना कार्य की संपूर्णता के लिए आवश्यक मानने लगा हूं. उम्र बढ़ी है, तो अनुभव भी जमेगा ही.
ब्रह्मस्थान की याद
लेकिन, इसी गांव के सुन्नर ब्रह्म स्थान ने मेरे पांव में छान लगा दिया. पीपल के सैंकड़ों वर्ष पुराने वृक्ष के नीचे अवस्थित इस ब्रह्मस्थान से जुड़ी हुईं कई दंतकथाएं हैं. सैंकड़ों सालों पूर्व कोई तपस्वी यहां धुनी रमाकर बैठा था. उसने गांव को किसी प्राकृतिक आपदा से मुक्ति दिलायी थी. तपस्वी के बाद भी पीपल वृक्ष का यश कम न हुआ. स्थानीय लोग जीवन की विपरीत परिस्थितियों में फंसते हैं, तो उन्हें इसी ब्रह्मस्थान (Brahmasthan) की याद आती है. विशाल पीपल की डालें टूटकर जहां-जहां गिरीं, वहां पीपल की जड़ें जमती चली गयी. मैं घटहो से दक्षिण की ओर मुड़ गया. इस घटहो गांव का नामकरण कुछ लोग हिडिंबा और भीम के पुत्र घटोत्कच के नाम पर हुआ मानते है.
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घटहो और त्रिकुटीधाम
स्थानीय इतिहासविदों के निजी तर्कों के फेरे में पड़ना फिलहाल ठीक नहीं. यह गांव बलान नदी के किनारे बसा हुआ है. भैरोपट्टी घाट पर अब पुल बन गया है. भैरोपट्टी में भी कोई तपस्वी रहता था, उसी के नाम पर इस गांव का नाम भैरोपट़ी पड़ा था. कैडस्ट़ल सर्वे में इसका नाम मोहम्मदपुर गौस उर्फ भैरोपट्टी दर्ज है. घटहो से ककरघट्टी की ओर निकलने पर त्रिकुटी धाम का सान्निध्य स्वतः मिल जाता है. मान्यता है कि जमुआरी, नून और बलान नदियों का यहां मेल होता है. पहले इसे संगम मानकर मिथिलांचल के अनेक गांवों से लोग यहां स्नान के लिए आते थे. यहां नीलकंठ महादेव भुसनी मठ है, जो अध्यात्म और सनातन संस्कृति का प्राचीन केंद्र है.
अवश करके रख दिया
नदियां पानी के अजस्र प्रवाह का नाम है. प्रवाह रुका, तो नदी नदी न रह पायी. गड्ढे और नाले में तब्दील होती नदियों को हमारे स्वार्थ और असावधानी ने अवश करके रख दिया. नदियां जीवन हार गयीं, तो जीवन हर किसी का सूखता चला गया. नदियां एक-दूसरी से जुड़ीं, जैसे कि सृष्टि के समन्वय को स्नेह का सर्वस्व समर्पित कर रही हों. मैं नदियों पर सोचने लगा; क्योंकि मैं नदी के आसपास चल रहा था. यह बलान नदी थी. किसी ने कहा कि यह नेपाल से आती है. कभी आयी होगी, आती रही होगी.
नदी के पुनर्जीवन का अहलाद
अब तो यह भी कहा जाता है कि यह नून और जमुआरी नामक नदियों के संयोग से बनी और बढ़ी है. घटहो मुसापुर के समीप से निकल कर यह नदी महज अठहत्तर किलोमीटर तक बही और बेगूसराय (Begusarai) के समीप बूढ़ी गंडक नदी में जा मिली. लेकिन, यह लंबे समय तक बरसाती नाले की तरह बनी रही. भला हो सरकार का, सरकार ने गाद उड़ाही परियोजना में करोड़ों रुपये खर्च किये हैं. अब नदी नदी की तरह बह रही है. लोग पानी के पानीपन को देख-समझ रहे हैं. मुझे नदी के पुनर्जीवन से आह्लाद का अनुभव हुआ.
चौथी कड़ी : घर के नाम पर एक झोपड़ी भी नहीं
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