मदन वात्स्यायन : किसी को कोई मतलब नहीं रहा गांव से

बिहार के जिन प्रतिष्ठित साहित्यकारों की सिद्धि और प्रसिद्धि को लोग भूल गये हैं उन्हें पुनर्प्रतिष्ठित करने का यह एक प्रयास है. विशेषकर उन साहित्यकारों, जिनके अवदान पर उपेक्षा की परतें जम गयी हैं. चिंता न सरकार को है, न समाज को और अनेक मामलों में न उनके वंशजों को. इस बार प्रयोग और प्रगति के साहित्यवादों के समय में अपनी अलग पहचान रखने वाले मदन वात्स्यायन की स्मृति के साथ समाज और सरकार के स्तर से जो व्यवहार हो रहा है, उस पर दृष्टि डाली जा रही है. आलेख की यह पांचवीं एवं अंतिम कड़ी है.
अश्विनी कुमार आलोक
03 जनवरी 2026
उपेन्द्र सिंह से छूटने के बाद मैं और सकलदीप कुमार एक बार फिर गृहभूमि की ओर बढ़े. यह दूसरा रास्ता था, इसीलिए एक दोराहे पर पुलिया के समीप बैठे दो बुजुर्गों से पूछना पड़ा. उनमें से एक देवेन्द्र पाठक मुझे अपने साथ लेकर गृहभूमि तक आये, घुमाकर दिखाया. देखने को कुछ नहीं था. किसी ने बताया कि घर में कोई रहता नहीं था, लेकिन पता नहीं किस तरह आग लग गयी थी. इस बार वह दयानंदन सिंह उर्फ दया बाबा भी मिले, जिनसे पिछली बार बातचीत नहीं हो पायी थी. दयानंदन सिंह (Dayanandan Singh) ने बताया कि वह गोतिया में सबसे अधिक उम्र के बुजुर्ग नहीं हैं, दो और भी चचेरे भाई हैं, जो यहां रहते नहीं. मदन वात्स्यायन के पिता प्यारे शरण सिंह से दो और भाई बड़े थे. वृजनंदन प्रसाद सिंह और किशोरीनंदन प्रसाद सिंह. दयानंदन सिंह के पिता वृजनंदन प्रसाद सिंह के पुत्र दामोदर सिंह थे.
फिर कभी नहीं आये
दयानंदन सिंह के पास भी बताने को कुछ नहीं था, सिर्फ इतना कि मदन वात्स्यायन (Madan Vatsyayan) और उनके अन्य भाई अंतिम बार अपने पिता प्यारेशरण सिंह (Pyaresharan Singh) के श्राद्ध में आये थे, उसके बाद कभी नहीं आये. घर गिर जाने के बरसों बाद डा. श्रीनिवास के पुत्र नवीन सिंह आये थे और गुड्डू सिंह को कहा था कि मलवे को साफ कराकर जोतवा दिया जाये. उनकी योजना गढ़सिसई (Garhsisai) में दुबारे घर बनाने की थी. कुछ बरसों बाद नवीन सिंह की पत्नी के मरने की सूचना आयी, पर नवीन सिंह फिर नहीं आये. अन्य ग्रामीणों की तरह दयानन्दन सिंह और देवेन्द्र पाठक ने भी कहा कि मदन वात्स्यायन और उनके भाइयों की तरह ही उनके किसी परिजन-वंशज ने गांव से कोई मतलब नहीं रखा.
कुछ नहीं किया गांव के लिए
दयानंदन सिंह ने बताया- ‘उनके किसी वंशज की मृत्यु की खबर सुनकर गांव के लोग भले नख-बाल कटा लें, वे लोग नहीं कटवाते. वे शुरू से ही समाज से कटे रहे. उन लोगों ने गांव के लिए कुछ नहीं किया. चाहते, तो पचास लोगों को अपने प्रयासों से नौकरियां दिलवा देते. आज गांव बहुत आगे रहता. उनका स्मारक बनता, मूर्ति बनती, नाम बचा रह जाता.’ बहुत जमीन थी, आज भी है. परंतु परिजनों में बंटवारे पर असंतोष है, बंटवारे को टालने का दुःख भी. गढ़सिसई गांव की सैंकड़ों एकड़ भूमि के अतिरिक्त अन्य ग्यारह मौजे की मिल्कियत थी.
सीपी सिंह के भगीना थे
हरपुर जयराम,कांचा, आलमपुर सिमरी, बहादुरपुर, अजनौल, मरिचा, राजखंड, वैना, तिसवारा, चकपहाड़, तेलसर और बेला पंचरूखी मौजे की मिल्कियत. बहुत जमीन बिकी, अभी भी बहुत बची है. पर निरर्थक, कोई उपयोग नहीं. ननिहाल वीरसिंहपुर (Veersinghpur) में भी जमींदारी थी, संपन्नता थी. मामू सीपी सिंह (CP Singh) बड़े कांग्रेसी नेता थे, उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के राज्यपाल (Governor) भी हुए थे. मदन वात्स्यायन और उनके सभी भाइयों की आरंभिक शिक्षा भी वहीं हुई थी, वे सभी बचपन ही से गांव से कटे-कटे रहे. अब गांव ने उन्हें काटकर रख दिया. न कोई स्मारक, न कोई पहचान बचाये रखने की पहल.
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गांव का मान नहीं किया
पिता तीन भाई थे, बारह मौजे की सैंकड़ों एकड़ की मिल्कियत थी. खुद सात भाई और सब एक पर एक बड़ी नौकरियों के हकदार. बड़े भाई डा. श्रीनिवास (Dr. Srinivas) ने कुछ साहित्य भी लिखा था. छोटे भाई मुखिया रहे. दौलत-शोहरत का बेशुमार सेहरा जिस परिवार के सिर बंधा था, आज गांव में उसके लिए सिर छुपाने की एक झोपड़ी तक नहीं. ग्रामीणों ने कह दिया- ‘उस परिवार ने गांव का मान न किया, तो उसकी प्रतिष्ठा के लिए कोई स्मारक (Smarak) क्यों बने.’ नाम बचा है, परंतु आगे की पीढ़ी तक शायद ही बचा रहे. पांच बीघे में बना घर अब ईंट-रोड़े से सनी ऊबड़-खाबड़ मिट्टी की पुराकथा भर है, उस पर उपजे आवारा घास-फूस में कोई झांकता भी नहीं.
नहीं रह गया कोई अपनापन
घासों के बीच छुप रहा करीब दो फीट व्यास वाला एक कुंआ और एक लाल पक्की मिट्टी से निर्मित अपरिचित पिंडी. जिन मदन वात्स्यायन को अज्ञेय (Agyeya) ने ‘तीसरा सप्तक’ (Teesara Saptak) में शामिल किया था, जिनकी एक मात्र प्रकाशित पुस्तक ‘शुक्रतारा’ (Sukratārā) ने कविता में गांव के बिंब देकर वंचित समाज का पक्ष रखा था, उनके अपने ही गांव में क्यों नहीं रह पाया उनके लिए अपनापन? एक सूने से निर्जन विजन में बलान के तट पर अकेला खड़ा है कुलदेवी बंदी का मंदिर (Kuldevi Bandi Ka Mandir) , जिसमें कुल का कोई व्यक्ति प्रतिदिन दीप बालने को भी नहीं आता.
गांव में नाम मदन ही था
‘शुक्रतारा’ सूर्याेदय से पहले और सूर्यास्त के बाद आसमान में सर्वाधिक चमकनेवाला एक तारा है, खगोलविदों ने उसे सौरमंडल का ग्रह भी कहा है. माननेवाले उसे ग्रहों की रानी भी मानते हैं. किसी समय हिंदी साहित्य में ‘शुक्रतारा’ कविता के माध्यम से अपनी तेजस्विता लेकर प्रकट हुए मदन वात्स्यायन के गढ़सिसई गांव में वही ‘शुक्रतारा’ नहीं चमका. मदन वात्स्यायन का स्कूली नाम लक्ष्मीनिवास सिंह था, तब भी वह अपने गांव में मदन नाम से जाने गये थे. कुछ लोगों ने बताया कि गांव में उनका नाम मदन ही था, जिसे उन्होंने साहित्यिक नाम बना लिया था. गांव में किसी ने ‘शुक्रतारा’ पढ़ी हो, या पढ़ने की चेष्टा नहीं की. दयानंदन सिंह ने बताया- ‘शुक्रतारा का नाम सुना था, पढ़ने का अवसर नहीं मिला.’
जमींदोज हो गया सब कुछ
समस्तीपुर (Samastipur) जिले के विद्यापतिनगर (Vidyapatinagar) का यह गढ़सिसई गांव, जिसके समीप भक्तकवि विद्यापति के स्मारक स्वरूप प्रसिद्ध मंदिर है ‘बालेश्वरनाथ मंदिर’ (Baleshwarnath Temple) , समीप बहती गंगा में मिलने की व्यग्रता में नयी राह और नया प्रवाह बनानेवाली नून और जमुआरी नदियों ने बलान को जन्म देकर जहां गंडक (Gandak) के हवाले किया. उसी गढ़सिसई की बड़ी जमींदारी और ड्योढ़ी-हवेली जमींदोज होकर रह गयी.‘शुक्रतारा’ के लिए गांव में सिर छुपाने को एक झोपड़ी तक नहीं. महज है तो बंदी मंदिर, जिसके बरामदे और चारों ओर नीरवता है. शायद यही रह गया एक अकेला शुक्रतारा दीप. (समाप्त)
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