सत्ता और सियासत : करते रहिये जोड़-घटाव, नहीं होगा अभी कोई बदलाव

यह सवाल राजनीति के गलियारों में घूम रहा है कि सरकार को खतरा मुक्त रखने के लिए नीतीश कुमार और जदयू के रणनीतिकार विपक्षी दलों के विधायकों को तोड़ेंगे या खुद उनकी पार्टी टूटकर बिखर जायेगी? यह सवाल इसलिए कि इस दिशा में जदयू का हाथ-पांव चला, तो भाजपा मूकदर्शक बन बैठी नहीं रहेगी.

विभेष त्रिवेदी
04 जनवरी 2026
Patna : यह स्थापित तथ्य है कि बगैर किसी किन्तु-परन्तु के राजनीति (Politics) बड़ी बेरहम होती है. नीतीश कुमार (Nitish Kumar) इसका तीखा अहसास तीन बार लालू प्रसाद (Lalu Prasad) को और दो बार भाजपा (BJP) को करा चुके हैं. कभी महाराष्ट्र (Maharashtra) में उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) ने भी भाजपा को ऐसा सबक दिया था. राजनीति इतनी बेमुरव्वत होती है कि जिस एकनाथ शिंदे (Eknath Shinde) को उद्धव ठाकरे ने भरोसेमंद समझा था, उसी ने शिवसेना (Shiv Sena) के 39 विधायकों को ‘सम्मोहित’ कर उनका खेल बिगाड़ दिया था. एकनाथ शिंदे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री (Chief Minister) तो बने, लेकिन अगले चुनाव में भाजपा ने फिर से अपने नेता देवेंद्र फडणवीस (Devendra Fadnavis) को मुख्यमंत्री बना लिया.1995 में आंध्र प्रदेश (Andhra Pradesh) में चंद्रबाबू नायडू (Chandrababu Naidu) ने अपने ससुर एनटी रामाराव (NT Rama Rao) से मुख्यमंत्री की कुर्सी और उनकी तेलगू देशम पार्टी (Telugu Desam Party) छीन ली थी. एक साल बाद इसी सदमे में एनटी रामाराव की जान चली गयी.
मूकदर्शक नहीं रहेगी भाजपा
बिहार (Bihar) में छोटे भाई तेजस्वी प्रसाद यादव (Tejaswi Prasad Yadav) को राजद (RJD) अध्यक्ष लालू प्रसाद का राजनीतिक वारिस स्वीकार करने वाले बड़े भाई तेजप्रताप यादव (Tejpratap Yadav) को निष्ठुर राजनीति ने ‘दूध कीे मक्खी की तरह’ बाहर फेंक दिया. जिस रोहिणी आचार्य ने पिता लालू प्रसाद की प्राण रक्षा के लिए अपनी किडनी दे दी, निर्लज्ज राजनीति ने उस पर चप्पल चलाकर मायके से बाहर निकाल दिया. ऐसे में राजनीति बिहार के मुख्यमंत्री पद की 10वीं बार शपथ ले चुके नीतीश कुमार पर रहम करेगी, ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती है. इसलिए यह सवाल राजनीति के गलियारों में घूम रहा है कि सरकार को खतरा मुक्त रखने के लिए नीतीश कुमार और जदयू (JDU) के रणनीतिकार विपक्षी दलों के विधायकों को तोड़ेंगे या खुद उनकी पार्टी टूटकर बिखर जायेगी? यह सवाल इसलिए कि इस दिशा में जदयू का हाथ-पांव चला, तो भाजपा मूकदर्शक बन बैठी नहीं रहेगी.
जब तोड़-जोड़ का खेल होगा…
बिहार में तख्तापलट आसान नहीं दिखता है, तो यह असंभव भी नहीं है, क्योंकि जंगल में शिकार करते समय जब शेर खुद जख्मी होता है, तब उसकी बादशाहत कायम नहीं रहती है. पिछली बार नीतीश कुमार एनडीए (NDA) छोड़कर महागठबंधन (Mahagathbandhan) में शामिल हुए थे तो उन्होंने यही कारण बताया था- ‘उनकी पार्टी को तोड़ने की साजिश चल रही थी.’ जैसे ही विपक्षी दलों के विधायकों को तोड़ने-जोड़ने की कार्ययोजना पर अमल शुरू होगा, मुख्यमंत्री की कुर्सी खुद-ब-खुद डगमगाने लगेगी, सियासत हिचकोले खाने लगेगी. हालांकि, भाजपा नहीं चाहेगी कि पश्चिम बंगाल (West Bengal) के चुनाव से पहले बिहार एनडीए में कोई खटास पैदा हो, लेकिन जब विधायकों के तोड़-जोड़ का खेल शुरू होगा, तो नहीं चाहते हुए भी उसे पांव बढ़ाना पड़ ही जा सकता है.
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वहां दिख रही अधिक बेताबी!
यहां दिलचस्प बात यह दिख रही है कि विपक्षी विधायकों के तोड़जोड़ को लेकर सत्ताधारी दलों से अधिक बेताबी इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर है. वहां चिड़ियों के उड़ने से पहले अंडों को उड़ाया जा रहा है. नवनिर्वाचित विधायकों ने शपथ भी नहीं ली थी, उससे पहले ही उनके तोड़ने-टूटने की खबरें छानने लगे. शपथ ग्रहण से पहले वे तकनीकी रूप से विधायक नहीं बने थे, पाला बदलने का तो सवाल ही नहीं था. खबर शपथ ग्रहण से पहले भी चलायी जा रही थी और अब भी चलायी जा रही है कि कांग्रेस (Congress), एआईएमआईएम (AIMIM) और बसपा (BSP) विधायकों को तोड़ने की कवायद हो रही है. आईआईपी (IIP) विधायक को भी तोड़ने की. सबकी मोबाइल फोन की घंटियां घनघनाने लगी हैं. अब उन्हें कौन समझाये कि जोड़-तोड़ का ऑपरेशन मोबाइल कॉल से नहीं, गोपनीय मुलाकात में होता है. क्या होता है क्या नहीं, यह वक्त बतायेगा, बहरहाल, तोड़-जोड़ ये जुड़ी झूठ-सच बातें परोसने का सिलसिला तेज है.
(विभेष त्रिवेदी बिहार के वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
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