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सत्ता और सियासत : खतरा बराबर का

नीतीश कुमार कम पूंजी के बावजूद सबसे चतुर और सफल सौदागर साबित हुए. कभी बहुमत नहीं मिलने के बावजूद (एक छोटे से कालखंड को छोड़) नवंबर 2005 से लगातार सत्ता पर काबिज नीतीश कुमार भारत में ‘टिकाऊ’ और ‘अस्थिर’ गठबंधन सरकारों के सबसे बड़े विरोधाभासी उदाहरण हैं. राजनीतिक पंडित अगर यह मानते हैं कि नीतीश कुमार कोई खेल नहीं करेंगे, हाथ पर हाथ रखकर बैठे रहेंगे तो गलतफहमी में हैं.

विभेष त्रिवेदी
05 जनवरी 2026

Patna : पूरी दुनिया में आज बहुदलीय गठबंधन (Alliance) वाली सरकारों का चलन है. भारत में नरेन्द्र मोदी भी बड़ी सुगमता से सरकार चला रहे हैं. किसी दल को बहुमत नहीं मिलता है, तो विभिन्न राजनीतिक (Political) लक्ष्यों को हासिल करने के लिए गठबंधन सरकार बनती है, जैसे राष्ट्रीय हितों की रक्षा या आर्थिक तरक्की. भारत (India) हो या यूरोप (Europe), जनता गठबंधन की ‘स्थायी सरकार’ चाहती है, ताकि विकास हो. भारत के राज्यों में गठबंधन का उद्देश्य कुछ अलग होता है. यहां व्यक्ति पूजा की राजनीति प्रभावी है. परिवार और जाति आधारित दल का मुखिया हीरो होता है. यही वजह है कि क्षेत्रीय क्षत्रप संगठन और सरकार को व्यक्तिगत संपत्ति मानकर मालिक की तरह राज करते हैं. मजबूरी में समर्थन देने वाले छोटे-छोटे दल के जातीय ठेकेदार बड़ी हिस्सेदारी के लिए सौदेबाजी करते हैं.

विरोधाभाषी उदाहरण

नीतीश कुमार (Nitish Kumar) कम पूंजी के बावजूद सबसे चतुर और सफल सौदागर साबित हुए. कभी बहुमत नहीं मिलने के बावजूद (एक छोटे से कालखंड को छोड़) नवंबर 2005 से लगातार सत्ता पर काबिज नीतीश कुमार भारत में ‘टिकाऊ’ और ‘अस्थिर’ गठबंधन सरकारों के सबसे बड़े विरोधाभासी उदाहरण हैं. राजनीतिक पंडित अगर यह मानते हैं कि नीतीश कुमार कोई खेल नहीं करेंगे, हाथ पर हाथ रखकर बैठे रहेंगे तो गलतफहमी में हैं. दूसरी ओर यह मान लेना भी नादानी होगी कि भाजपा (BJP) उलटफेर की कोशिश नहीं करेगी. बिहार में सियासी उलटफेर होगा, लेकिन कब और कैसे होगा, यह अनुमान लगाना अभी मुश्किल है. इसके लिए प्रधानमंत्री (Prime Minister) नरेन्द्र मोदी (Narendra Modi) एवं केन्द्रीय गृह मंत्री (Union Home Minister) अमित शाह (Amit Shah) की चाल और नीतीश कुमार के बेकाबू हो रहे बॉडी लैंग्वेज पर पैनी नजर रखनी पड़ेगी.

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दूध का धुला कोई नहीं

पटना के गांधी मैदान (Gandhi Maidan) में हाल में जब नीतीश कुमार मुख्यमंत्री पद की 10वीं बार शपथ लेने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को विदा करते समय उनके पैर छू रहे थे तब शायद वह मन ही मन यही कह रहे थे कि- ‘शरीफ हम भी नहीं और अनाड़ी तुम भी नहीं!’ दोनों एक-दूसरे की जरूरत, मजबूरी और दांव को अच्छी तरह समझते हैं. कोई भी दूध का धुला नहीं है. नीतीश कुमार को पता है कि चौकसी नहीं बरती तो कभी भी पलट दिये जायेंगे. उन्हें बिहार विधानसभा (Bihar Assembly) में बहुमत का गणित अपने पक्ष में बनाये रखना पड़ेगा. ताकत बरकरार रखने के लिए हमेशा सहजता- सजगता व विनम्रता की चादर ओढ़कर आक्रामक रहना पड़ेगा. भाजपा की भी मजबूरी है कि वह नीतीश कुमार की सेहत, सक्रियता और संख्या बल पर सिर्फ नजर ही नही, आपात स्थिति से निपटने की फूलप्रूफ तैयारी भी रखे.

(विभेष त्रिवेदी बिहार के वरिष्ठ पत्रकार हैं.)

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