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एक थे चंदा बाबू : तब नहीं थमतीं सीवान की सिसकियां!

विष्णुकांत मिश्र
05 जनवरी 2026

siwan : सीवान और शहाबुद्दीन (Shahabuddin) के आतंक की जब कभी चर्चा होगी, चंदा बाबू (Chanda Babu) की जीवटता भी खुद-ब-खुद उसमें शामिल हो जायेगी. हालिया संपन्न विधानसभा चुनाव (Assembly Elections) के दौरान प्रधानमंत्री (Prime Minister) नरेन्द्र मोदी (Narendra Modi) और केन्द्रीय गृह मंत्री (Union Home Minister) अमित शाह (Amit Shah) ने अलग-अलग सभाओं में सीवान और शहाबुद्दीन प्रसंग की चर्चा की, तो चंदा बाबू की याद बरबस ताजा हो उठी. लंबे समय तक जीवन के महाशोक में डूबे उस चंदा बाबू की, जो तकरीबन पांच साल पहले न्यायपालिका, विधायिका एवं कार्यपालिका के कथित सुस्त कार्यकलापों को कोसते हुए चल बसे. अपने प्रण के अनुरूप उन्होंने और कहीं नहीं, गृह शहर सीवान में ही अंतिम सांस ली.16 दिसम्बर 2020 को.

याद करेगी दुनिया

चन्द्रकेश्वर प्रसाद उर्फ चंदा बाबू (Chandrakeshwar Prasad alias Chanda Babu) सीवान शहर के साधारण व्यवसायी थे, पर उसूल के मामले में उनका व्यक्त्वि असाधारण था. मिट गये, पर झुके नहीं, डरे नहीं. उसूलों से कभी समझौता नहीं किया. उनके संघर्ष को सीढ़ी बना अपनी राजनीति चमकाने वाले भले भूल जायें, इस दृढ़ता व जीवटता के लिए दुनिया उन्हें हमेशा याद रखेगी. ‘जंगलराज’ (Jangalraj) के जिस चरम काल में सीवान ही नहीं, संपूर्ण सारण (saran) के बड़े-बड़े सुरमा भी आतंक का पर्याय रहे पूर्व बाहुबली सांसद शहाबुद्दीन का नाम जुबां पर नहीं लाते थे, शासन-प्रशासन के लोग आमतौर पर नतमस्तक रहते थे, थर्र-थर्र कांपते थे. उस खौफनाक दौर में चंदा बाबू ने उनसे बेखौफ लोहा लिया.

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तब भी नहीं मानी हार

उनके इस दुःसाहस का दुष्परिणाम इस रूप में सामने आया कि जवानी की दहलीज पर खड़े उनके दो पुत्रों को तेजाब से नहला दिया गया. चंदा बाबू टूटे नहीं. अकेले इस ‘अंतर्राष्ट्रीय आतंक’ का मुकाबला करते रहे. तीसरे बेटे की अर्थी भी कंधे पर डाल दी गयी. तब भी हार नहीं मानी. खुद के बूते कानूनी लड़ाई लड़ शहाबुद्दीन को सलाखों के पीछे पहुंचा कर ही दम लिया. उनके इस अदम्य साहस को भी मिसाल के तौर पर दुनिया याद करेगी. यह भी कि खुद का खराब स्वास्थ्य, पत्नी की असाध्य बीमारी, चौथे पुत्र की दिव्यांगता और पारिवारिक आर्थिक असमर्थता के बीच चंदा बाबू बाहुबली शहाबुद्दीन के खिलाफ लंबी लड़ाई नहीं लड़े होते तो शायद ‘सुशासन’ (sushasan) में भी सीवान सिसकियां भरते रहता.

राजनीतिज्ञों ने की गद्दारी

आतंक से त्राण पाने के लिए चंदा बाबू पर स्वजनों व शुभचिंतकों का सीवान छोड़ देने का भारी दबाब था. परन्तु, उन्होंने अंतिम सांस तक सीवान नहीं छोड़ने का जो दृढ़ निश्चय किया उसे पूरा कर दिखाया.चंदा बाबू की इस खुद्दारी से सीवान गौरवान्वित है, तो उनके प्रति राजनीतिज्ञों की गद्दारी से शर्मसार भी है. बेटों की हत्या के मामले में 16 वर्षों तक वह न्याय मांगते रहे, दर-दर भटकते रहे, अंदर ही अंदर तड़पते रहे. परन्तु सच्चे हृदय से किसी भी राजनीतिज्ञ का साथ नहीं मिला. यहां तक कि उनके असीमित शोक का अनवरत आक्रामक राजनीतिक लाभ जिस भाजपा ने उठाया, उसने भी उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया. उनके सुकून के लिए कभी कुछ नहीं किया.

साक्षात सबूत थे ‘जंगलराज’ के

राजद (RJD) अध्यक्ष लालू प्रसाद (Lalu Prasad) ‘पोषित-पालित व संरक्षित’ शहाबुद्दीन की खूंख्वारियत का अंतहीन दंश झेलने वाले चन्द्रकेश्वर प्रसाद उर्फ चंदा बाबू उस वैश्य समाज से थे जिसे आमतौर पर भाजपा का अंध समर्थक माना जाता है. इस नाते भी भाजपा कभी जमीनी तौर पर उनके प्रति संवेदनशील नहीं दिखी. उसकी दिखावटी संवेदनशीलता राजनीतिक आचरणों में ही सिमटी रही. दुखद यह कि भाजपा (BJP) के स्थानीय नेताओं ने जब कभी सहानुभूति प्रदर्शित की तो उसमें भी प्रायः उपेक्षा और उपहास का भाव ही दिखा. चंदा बाबू लालू-राबड़ी (Lalu-Rabri) शासन काल के ‘जंगलराज’ के जीता-जागता साक्षात सबूत थे.

तब जीने की ललक होती

सीवान के संवेदनशील लोगों की समझ में विधायिका (vidhayika) के किसी सदन में उनकी सदेह उपस्थिति ही ‘जंगलराज’ का आरोप झेलने वालों की बोलती बंद रखती. तर्क यह भी कि तीन जवान बेटों की अर्थियां उठाने से टूट चुके चंदा बाबू को सदन की सदस्यता से संबल-सम्मान मिलता. सुरक्षा की भावना जगती और हताशा-निराशा से उबर नयी जिंदगी जीने की ललक पैदा होती. लेकिन, उनके जीते जी भाजपा ने ऐसी सदाशयता तो नहीं ही दिखायी, मरने के बाद संवेदनहीनता की सीमा तक लांघ दी. इस रूप में कि भाजपा के किसी भी बड़े नेता ने उनके ‘अमरत्व’ पर श्रद्धा सुमन अर्पित करने की औपचारिकता तक नहीं निभायी. यही है आज की राजनीति (Politics) का चरित्र!

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