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एक थे चंदा बाबू : किन-किन बातों पर और कितनी बार रोते!

विष्णुकांत मिश्र
06 जनवरी 2026
siwan : घने अंधकार में घिरी जिंदगी में उजाले की एकमात्र उम्मीद 36 वर्षीय बड़े पुत्र राजीव रोशन (Rajeev Roshan) की हत्या से हृदयविदीर्ण चन्द्रकेश्वर प्रसाद उर्फ चंदा बाबू (Chandrakeshwar Prasad alias Chanda Babu) की हिम्मत करीब-करीब टूट गयी थी. व्यथित भावनाओं का भरदम शोषण-दोहन कर राजनीति चमकाने वालों के दृश्य-अदृश्य छल-कपट भरे व्यवहार से भी वह पूरी तरह क्षुब्ध थे. राजीव रोशन अपने दो सहोदर भाइयों की निर्मम हत्या का एकमात्र चश्मदीद था. मामले में अन्य लोगों के साथ पूर्व बाहुबली सांसद शहाबुद्दीन (Shahabuddin) भी आरोपित थे. राजीव रोशन की हत्या 16 जून 2014 को सीवान के बहुचर्चित डीएवी कॉलेज (DAV College) चौराहा पर हुई.

गवाही से पहले हत्या

तब की परिस्थितियों और कनफुसकियों ने पूर्व सांसद शहाबुद्दीन और उनके शागिर्दों को संदेह के दायरे में लाया था. आधार यह कि राजीव रोशन से किसी को ज्यादा परेशानी थी तो वह शहाबुद्दीन ही थे. कहा जाता है कि 19 जून 2014 को दो सहोदर भाइयों की हत्या के मामले में उसकी आखिरी गवाही होनी थी. तीन दिन पूर्व उसकी इहलीला समाप्त कर दी गयी. हालांकि, इससे मामले की सुनवाई और दोष निर्धारण में कोई खास फर्क नहीं आया. दिसम्बर 2015 में शहाबुद्दीन एवं अन्य तीन आरोपितों को उम्रकैद की सजा मिल गयी.

यह भी रहा एक कारण

राजीव रोशन हत्याकांड के चश्मदीद चन्द्रकेश्वर प्रसाद उर्फ चंदा बाबू ने मामले में शहाबुद्दीन के पुत्र ओसामा शहाब (Osama Shahab) एवं दो अज्ञात को आरोपित किया था. तब जेल में बंद सजायाफ्ता पूर्व सांसद शहाबुद्दीन को मुख्य साजिशकर्त्ता बताया था. परिजनों का कहना रहा कि राजीव रोशन की हत्या मुख्यतः दो कारणों से की गयी. एक सहोदर भाइयों की हत्या के मामले में महत्वपूर्ण गवाही तो थी ही, दूसरा यह कि संसदीय चुनाव (parliamentary elections) के वक्त इसके फिर से चर्चा में आ जाने से उनकी पत्नी राजद (RJD) उम्मीदवार हीना शहाब (Heena Shahab) की सीवान में फिर हार हो गयी.

सींच दिया तब उनकी संभावनाओं को

ऐसा माना जाता है कि नरेन्द्र मोदी (Narendra Modi) के सीवान के सभा मंच से अपने दो पुत्रों की नृशंस हत्या का हृदय विदारक बखान करने के क्रम में चन्द्रकेश्वर प्रसाद उर्फ चंदा बाबू के सुबक उठने का हीना शहाब की चुनावी सेहत पर गहरा असर पड़ा. सभा में मौजूद लाखों लोगों की नम हुईं आंखों ने उनकी संभावनाएं समाप्त कर दी. चंदा बाबू के आंसुओं ने शहाबुद्दीन के तथाकथित धुर विरोधी भाजपा (BJP) प्रत्याशी ओमप्रकाश यादव (Omprakash Yadav) की संभावनाओं को सींच दिया. इसका लाभ उन्हें आसान जीत के रूप में मिल गया. कहते हैं कि ओमप्रकाश यादव ने उनकी सिसकियों का लाभ बाद में भी उठाया.

साबित नहीं हुई संलिप्तता

ऐसा कहा गया कि हीना शहाब की हार शहाबुद्दीन के सिपहसालारों को बर्दाश्त नहीं हुई और राजीव रोशन का काम तमाम करा दिया गया. हालांकि, हीना शहाब ने तब ऐसे आरोपों को आधारहीन बताया था. उनका कहना रहा कि इस मामले में भी साजिश के तहत उनके पति शहाबुद्दीन और पुत्र ओसामा शहाब को फंसाया गया . वैसे, चंदा बाबू ने दावे के साथ कहा था कि राजीव रोशन को गोली ओसामा शहाब ने ही मारी थी. कनपट्टी में पिस्तौल सटाकर. ऐसा होते उन्होंने खुद देखा था. चंदा बाबू के दावे के इतर पुलिस के अनुसंधान में ओसामा शहाब की संलिप्तता साबित नहीं हो पायी. उन्हें आरोपमुक्त कर दिया गया. ओसामा शहाब वर्तमान में रघुनाथपुर (Raghunathpur) से राजद के विधायक हैं.

ओमप्रकाश यादव की भूमिका

सच क्या है, यह नहीं कहा जा सकता, पर उस वक्त यह चर्चा खूब हुई थी कि आपराधिक मामले में पुत्र को फंसाये जाने से शहाबुद्दीन काफी विचलित हो उठे थे. कथित रूप से भाजपा के पूर्व सांसद ओमप्रकाश यादव को उन्होंने फोन किया था. शहाबुद्दीन ने शायद उनसे कहा था कि एक पुत्र उन्हें (ओमप्रकाश यादव) भी है. ऐसा कहने का उनका तात्पर्य क्या था, यह नहीं कहा जा सकता. पर, सामान्य समझ है कि उस कथित फोन के बाद ही ओसामा शहाब को राहत मिलने लग गयी.

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हार गये चुनाव

लोग तो यहां तक कहते हैं कि उस मामले में ओमप्रकाश यादव की कथित भूमिका का खामियाजा पार्टी को 2020 के विधानसभा चुनाव (Assembly elections) में भुगतना पड़ गया. ओमप्रकाश यादव सीवान से भाजपा के उम्मीदवार थे. मौजूदा विधायक व्यासदेव प्रसाद (Vyasdev Prasad) को हाशिये पर डाल उन्हें अवसर उपलब्ध कराया गया था. भाजपा के मुख्य जनाधार माने जाने वाले वैश्य समाज का मुकम्मल साथ नहीं मिलने से पराजय का मुंह देखना पड़ गया. वैसे, उनसे इस समाज की अंदरुनी नाराजगी के और भी अनेक कारण बताये जाते हैं. 2025 में भाजपा की उम्मीदवारी स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय (Mangal Pandey) को मिली. आसान जीत भी हासिल हो गयी.

वह भी तो इंसान थे !

जो हो, इसे विडम्बना ही कहेंगे कि चन्द्रकेश्वर प्रसाद उर्फ चंदा बाबू को लगभग 10 साल पूर्व हुई दो पुत्रों की नृशंस हत्या के मामले में इंसाफ मिलने से पहले तीसरे पुत्र से भी हाथ धोना पड़ गया. ऐसे में उनकी हिम्मत टूट गयी, आंसू सूख गये तो वह कोई हैरत वाली बात नहीं थी. आखिर, वह भी तो इंसान ही थे. किन-किन बातों पर और कितनी बार रोते! तब भी आरोपितों को सजा दिलाने का उनका हौसला बना रहा. तीसरे पुत्र राजीव रोशन की शादी हत्या के मात्र 21 दिनों पूर्व हुई थी. गोपालगंज (Gopalganj) की स्वीटी से. मेंहदी का रंग अभी मिटा भी नहीं था कि उसकी मांग का सिन्दूर धुल गया. चंदा बाबू इस चिंता से भी बेहाल हो उठे कि एक झटके में विधवा बन गयी स्वीटी की लंबी जिंदगी किसके सहारे कटेगी! पर, कहा जाता है कि स्वीटी के मायके वालों ने उन्हें इस चिंता से उबार दिया. वे स्वीटी को सदा के लिए अपने घर ले गये. चंदा बाबू की यह चिंता तो मिट गयी, पर मलाल इस बात का रह गया कि बेटा तो गया ही, पतोहू भी छोड़कर चली गयी.

(विष्णुकांत मिश्र वरिष्ठ पत्रकार हैं.)

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