सत्ता और सियासत : समीकरण उतना आसान नहीं

नीतीश कुमार के इतिहास का हवाला देने वाले विश्लेषक ऐसी परिस्थितियों का पूर्वानुमान कर रहे हैं, जब नीतीश कुमार रातो-रात 85 विधायकों के साथ एनडीए छोड़कर फिर महागठबंधन में शामिल होने का प्रयास करेंगे. बदलाव की बावत बहुत ही आसान मगर हास्यास्पद गणित जोड़ा जा रहा है.

विभेष त्रिवेदी
03 जनवरी 2026
Patna: बिहार में गठबंधन सरकार के भविष्य का आकलन करने के लिए विधानसभा के 2025 के चुनाव (Assembly Elections 2025) परिणाम का विश्लेषण जरूरी है. एनडीए (NDA) को कुल 202 सीटें और महागठबंधन (Mahagathbandhan) को 35 सीटें मिली हैं. इसके अलावा एआईएमआईएम (AIMIM) को पांच और बसपा (BSP) को एक सीट मिली है. कुल 89 विधायकों की बदौलत भाजपा (BJP) सबसे बड़ी पार्टी और 85 विधायकों के साथ जदयू (JDU) दूसरी बड़ी पार्टी है. नीतीश कुमार (Nitish Kumar) के इतिहास का हवाला देने वाले विश्लेषक ऐसी परिस्थितियों का पूर्वानुमान कर रहे हैं, जब नीतीश कुमार रातो-रात 85 विधायकों के साथ एनडीए छोड़कर फिर महागठबंधन में शामिल होने का प्रयास करेंगे.
पलट जायेगी तब बाजी
बदलाव की बावत बहुत ही आसान मगर हास्यास्पद गणित जोड़ा जा रहा है. महागठबंधन के 35 विधायकों से जुड़कर जदयू 120 के आंकड़े को छू लेगा और एआईएमआईएम एवं बसपा के समर्थन से 126 का निर्णायक बहुमत प्राप्त कर लेगा. लेकिन, कागज पर आसान दिख रहे इस गणित पर जैसे ही अमल किया जायेगा, बाजी पलट जा सकती है. कांग्रेस (Congress) की बात छोड़िये, राजद (RJD) और जदयू, दोनों में भी सेंध लग जा सकती है. विश्लेषकों की समझ में नीतीश कुमार नासमझी भरी ऐसी जल्दबाजी तब तक नहीं करेंगे, जब तक पानी नाक के ऊपर से नहीं बहने लगे.
कोई बुराई नहीं
भाजपा अगर अपना मुख्यमंत्री (Chief Minister) बनाने का सपना देखती है, तो इसमें कोई आश्चर्य, हर्ज या बुराई नहीं है. जब एक भी विधायक नहीं होने के बाद भी वीआईपी (VIP) सुप्रीमो मुकेश सहनी (Mukesh Sahani) उपमुख्यमंत्री बनने का ख्वाब देख सकते हैं, 25 विधायकों की बदौलत तेजस्वी प्रसाद यादव (Tejaswi Prasad Yadav) मुख्यमंत्री बनने का सपना देख सकते हैं, तो 19 विधायकों वाले चिराग पासवान (Chirag Paswan) ऐसा कोई सपना क्यों नहीं देख सकते हैं? बात भाजपा की, तो उसे सही वक्त का इंतजार करना पड़ेगा और वह कर भी रही है. राजनीति संन्यासियों, त्यागी-तेजस्वी की साधना नहीं होती है. संन्यासी अपनी मूल पहचान मिटाते हैं. ‘मैं’ का त्याग करते हैं. राजनीति में जो त्याग करेगा, लुट जायेगा, कंगाल हो जायेगा.
यह भी पढ़ें :
सत्ता और सियासत : खतरा बराबर का
होगी रोमांचक ड्रामेबाजी
राजनीति में परिचय, पहचान और प्रभाव बढ़ाना जरूरी है. इसका मूल उद्देश्य अपनी ताकत, एकाधिकार बढ़ाना, अपनी पार्टी को सुदृढ़ करना होता है. इसलिए विरोधी दलों से ही नहीं, बल्कि गठबंधन के घटक दलों के बीच भी आंतरिक खींचतान, प्रतिस्पर्धा रहती है. मोल-तोल की सौदेबाजी होती है. राजनीति (Politics) एक ऐसा खेल है, जिसमें अपने अस्तित्व के लिए एक-दूसरे को छकाने, हराने और बुरबक बनाने की कलाबाजी जरूरी है. इसमें गलाकाट प्रतिस्पर्धा से भागना नहीं चाहिये, हाथ आजमाना चाहिये. इसलिए डायरी के पन्ने पर लिख लीजिये, वक्त जो लगे, आने वाले समय में बिहार के सियासी रंगमंच पर दिलचस्प और रोमांचक ड्रामेबाजी होगी.
(विभेष त्रिवेदी बिहार के वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
***

