एक थे चंदा बाबू : बदकिस्मती ऐसी कि बेटों का कंधा भी नहीं मिल पाया!

o आबाई वतन की मिट्टी भी नसीब नहीं हुई
o आतंक का ग्रास बन गये तीन पुत्र
o सीवान से बाहर रहता था एक पुत्र
o भूखंड पर थी माफिया नजर
विष्णुकांत मिश्र
07 जनवरी 2026
Siwan : विधवा पतोहू के मायके में बस जाने के बाद चन्द्रकेश्वर प्रसाद उर्फ चंदा बाबू (Chandrakeshwar Prasad alias Chanda Babu) के परिवार में उनके अलावा उनकी बीमार पत्नी कलावती देवी और एक दिव्यांग पुत्र नीतीश राज (Nitish Raj) बच गये थे. दिसम्बर 2019 में कलावती देवी स्वर्ग सिधार गयीं. चंदा बाबू के निधन के बाद दिव्यांग नीतीश राज बिल्कुल असहाय हो गया. चंदा बाबू को छह संतानें थीं- चार पुत्र और दो पुत्रियां. कथित तौर पर तीन पुत्र शहाबुद्दीन के आतंक का ग्रास बन गये. दो पुत्रियों की उन्होंने शादी कर दी. दो भाइयों की हत्या का चश्मदीद (Eyewitness To Murder) राजीव रोशन (Rajeev Roshan) तब की क्रूरता (Cruelty) को देख इस कदर आतंकित (Terrorized) हुआ था कि जान बचाने के लिए गोरखपुर में भूमिगत हो गया था. पर्व-त्योहारों में भी सीवान आने से परहेज करता था. राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद सीवान ने सुकून की सांस ली और पुलिस (Police) ने सुरक्षा का भरोसा दिलाया तब हत्या से आठ माह पूर्व वह लौट आया था. सीवान स्थित अपने मकान में ही मोबाइल फोन की दुकान खोल व्यवसाय करने लगा था.
खुलासा पुलिस ने किया
जानकारों की मानें तो पहले ऐसा ही व्यवसाय (Besuness) वह गोरखपुर (Gorakhpur) में करता था. मां कलावती देवी (Kalawati Devi) की बीमारी भी उसके सीवान लौटने की एक बड़ी वजह थी. परिजनों के मुताबिक उसे ‘सुशासन’ में जंगलराज के पुनरागमन का थोड़ा भी इलहाम होता तो फिर कहीं और सिर छुपा आततायियों का निशाना बनने से बचने का प्रयास अवश्य करता. लेकिन, विधि ने तो कुछ और ही रच रखा था. सीवान के बड़हरिया (Badhariya) बस स्टैंड के समीप हास्पीटल रोड में रहने वाले चन्द्रकेश्वर प्रसाद उर्फ चंदा बाबू के दो पुत्रों 23 वर्षीय सतीश राज उर्फ सोनू और 18 वर्षीय गिरीश राज उर्फ नीकू (Girish Raj alias Neeku) पर 16 अगस्त 2004 को बर्बरता ढायी गयी थी.
भूखंड पर थी दबंग की नजर
पुलिस के अनुसंधान और विशेष अदालत (Special court) में सुनवाई के दौरान बताया गया था कि चंदा बाबू के घर से सटे छोटे से भूखंड के लिए हैवानियत की हद पार कर दी गयी थी. उक्त भूखंड पर कथित रूप से उस दौर में शहबुद्दीन के खासमखास रहे एक दबंग व्यक्ति की नजर जमी थी. पर, चंदा बाबू किसी भी कीमत पर उसे नहीं देने के लिए अड़े थे. इसी क्रम में दो लाख रुपये की रंगदारी (Extortion) मांगी गयी थी. असमर्थता जताने पर उनके तीनों पुत्रों का दुकान से अपहरण (kidnapping) कर लिया गया था. राजीव रोशन तो अपराधियों के चंगुल से किसी तरह बच निकला. पर, सतीश राज उर्फ सोनू और गिरीश राज उर्फ नीकू का कोई अता-पता नहीं चला.
दिल दहलाने वाला विवरण
अपहरण के दिन चंदा बाबू की पत्नी कलावती देवी ने जो प्राथमिकी दर्ज करायी थी उसमें दो लोगों को नामजद और शेष अज्ञात को आरोपित किया गया था. आरोपितों में पूर्व बाहुबली सांसद शहाबुद्दीन (Shahabuddin), उनके सहयोगी राजकुमार साह (Rajkumar Sah), मुन्ना मियां (Munna Mian) और शेख असलम (Sheikh Aslam) शामिल थे. मामले की सुनवाई के दौरान राजीव रोशन ने उक्त वीभत्स कांड का जो विवरण पेश किया था वह दिल दहलाने वाला था. अन्य कई गवाहों ने भी उसकी पुष्टि की थी. गवाहों (Witnesses) के मुताबिक अपहरण के बाद उन दोनो किशोरों को उनके सामने तब तक तेजाब (Acid) से नहलाया गया जब तक उनकी सांसें चलती रहीं. दम टूट जाने के बाद उनकी लाशों को टुकड़ों में कर उन पर नमक छिड़क ईंट भट्ठे की चिमनी में झोंक दिया गया था. निर्दयता ऐसी कि चंदा बाबू से उन दोनों के अंतिम संस्कार का हक भी छीन लिया गया.
यह भी पढ़ें :
एक थे चंदा बाबू : किन-किन बातों पर और कितनी बार रोते!
शहाबुद्दीन को भी…
चन्द्रकेश्वर प्रसाद उर्फ चंदा बाबू की जिद ही थी कि शहाबुद्दीन को दिल्ली (Delhi) के तिहाड़ जेल (Tihar Jail) में उम्रकैद (Life Imprisonment) की सजा काटनी पड़ी. वहां रहते ही उन्होंने अंतिम सांस ली. इसे संयोग कहें या दुर्योग, 16 दिसम्बर 2020 को स्वर्ग सिधार गये चंदा बाबू को बेटों का कंधा नहीं मिला. चार बेटों में तीन की हत्या हो गयी. चौथा दिव्यांग पुत्र कंधा देने लायक नहीं था. उधर, चंदा बाबू के निधन से लगभग साढ़े पांच माह बाद ही तिहाड़ जेल में रहते शहाबुद्दीन कोरोना से संक्रमित हो गये. 01 मई 2021 को दिल्ली के दीनदयाल उपाध्याय अस्पताल में इलाज के दौरान उनका इंतकाल हो गया. कारण जो रहा हो, सीवान के पैतृक गांव (Paitrk Gaanv) प्रतापपुर (Pratappur) में सुपूर्द-ए-खाक (Laid to Rest) का अवसर नहीं मिला. 03 मई 2021 को यह काम दिल्ली के आईटीओ (ITO) कब्रिस्तान (Graveyard) में संपन्न हुआ. चंदा बाबू की बेटों के कंधों पर अर्थी की आस अधूरी रह गयी, तो शहाबुद्दीन को आबाई वतन की मिट्टी नसीब नहीं हो पायी!
(विष्णुकांत मिश्र वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
***

