यह कैसी विडम्बना? जहां गंगा बहती है… वहां पानी बिकता है!

आंकड़े बताते हैं कि भारत के 05.8 लाख गांव में से 01.4 लाख गांवों को पीने का शुद्ध पानी नहीं मिल रहा है. विश्व में प्रतिवर्ष लगभग सात करोड़ लोगों की मृत्यु जल की अनुपलब्धता की वजह से हो जाती है. एक सर्वेक्षण के मुताबिक सिर्फ भारत में ही नहीं, पूरे विश्व के तकरीबन एक अरब लोगों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध नहीं है.

प्रदीप कुमार नायक
11 जनवरी 2026
Patna: जीवन के लिए जल कितना आवश्यक है, यह गर्मी के समय में गुजरात (Gujarat) और राजस्थान (Rajasthan) के निवासी खूब अच्छी तरह बता सकते है. वैसे, बड़े शहरों में रहने वालों को भी जल संकट (Water Crisis) से प्रायः जूझना पड़ता है. गर्मियों में पीना, खाना पकाना, कपड़े धोना, घर सफाई करना, मवेशियों को नहाना-पानी पिलाना आदि के लिए प्रतिदिन जल (Water) की आवश्यकता होती है. वैसे, आजकल बिहार के दरभंगा (Darbhanga), मधुबनी (Madhubani), समस्तीपुर (Samastipur), सीतामढ़ी (Sitamarhi) सहित अन्य कई जिलों में भी पानी की किल्ल्त महसूस की जा रही है. इसी जरुरत को देखते हुए देशी-विदेशी कंपनियों ने पेयजल के व्यवसाय में बेशुमार धन लगा रखी है. शायद यही कारण है कि यहां पानी का व्यापारिक ग्राफ दिन प्रति-दिन बढ़ता जा रहा है.
मनमानी कीमत
जिस वस्तु की बाटलिंग (Bottling) या पैकेजिंग (Packaging) हो जाती है वह स्वतः मंहगी हो जाती है. ये कम्पनियां आम जरूरतों को देख अपने मुनाफे के लिए इतनी तत्पर हैं कि लोगों को प्रभावित करने के लिए करोड़ों रुपये विज्ञापन (Advertisement) पर खर्च कर देती हैं. यही कारण है कि एक रुपये का पानी बाजार में 20 से 50 रुपये तक में बिक रहा है. आश्चर्य की बात यह है कि जिस देश में गंगा, जमुना, सरस्वती जैसी अनेक पवित्र नदियां बहती हैं उस देश में पानी बिकता है! बोतल में…! वह भी मनमानी कीमत पर.
प्रति वर्ष सात करोड़ लोगों की मौत
आज जहां सरकार सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में शुद्ध पेयजल नहीं पहुंचा पायी है, वहां बोतलबंद पानी (Bottled Water) और पाउच वाटर राष्ट्रीय और बहुराष्ट्रीय कंपनियों (Multinational Companies) की व्यवसायिक दूरदर्शिता के कारण आसानी से उपलब्ध है. अपने देश के 05.8 लाख गांव में से 01.4 लाख गांवों को पीने का शुद्ध पानी नहीं मिल रहा है. विश्व में प्रतिवर्ष लगभग सात करोड़ लोगों की मृत्यु (Death) जल की अनुपलब्धता की वजह से हो जाती है. एक सर्वेक्षण के मुताबिक सिर्फ भारत में ही नहीं, पूरे विश्व के तकरीबन एक अरब लोगों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध नहीं है. पर्यावरणविदों (Environmentalists) का मानना है कि मलमूत्र निस्सारण प्रणाली विकसित कर स्थानीय परिस्थितियों एवं आर्थिक साधनों के अनुकूल जल का प्रदूषण (Water Pollution) दूर किया जा सकता है.
नहाना भी संक्रामक जोखिम
चिन्ता अब यह है कि हमारे देश की पंद्रह प्रमुख नदियों की जल ग्रहण क्षमता (Water Holding Capacity) तेजी से घट रही है. जल ग्रहण की जो स्थिति बची है उनमें पांच प्रतिशत शहरीकरण वाला क्षेत्र इन नदियों को इतना प्रदूषित कर दे रहा है कि बेलगाम आधुनिकता के कारण जल को पीना तो दूर, इसमें नहाना भी संक्रामक जोखिम बन गया है. अधिकृत आंकड़ों के मुताबिक भारत के गंगा घाटों में आजादी के समय प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष 6008 घन मीटर पानी उपलब्ध रहता था, जो 1990 के दशक के अंत में घटकर 2266 घन मीटर रह गया था.
अदूरदर्शिता नहीं तो क्या?
2001 में पानी की उपलब्धता 1525 घन मीटर थी और 2025 तक घटकर प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष 1060 घन मीटर हो जाने की आशंका जतायी गयी थी. इसका प्रमुख कारण देश की नियामक हृदयहीन नीतियां हैं,जो विश्व की मुफ्त बाजार व्यवस्था की ओर उन्मुख हैं. केरल (Kerala) राज्य के पालक्काड़ जिले (Palakkad) के प्लाचीमडा (Plachimada) गांव का उदाहरण आंखें खोलने वाला है. वहां एक बड़ी कंपनी ने पानी का बाटलिंग संयंत्र (Bottling Plant) लगाया है. इसके लिए कम्पनी ने तीन सौ से चार सौ फीट गहरे साठ बोरवेल खोदे हैं, जो प्रतिदिन पंद्रह लाख लीटर पानी जमीन से खींच रहे हैं. इस कारण उस क्षेत्र के कुएं, पोखर, धान के खेत यहां तक कि बड़े-बड़े जलाशय सूखने लगे हैं. इसे भारत सरकार की अदूरदर्शिता ही कही जा सकती है.
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सब ढाक के तीन पात
मिनरल वाटर (Mineral Water) और शीतल पेय (Cold Drink) के साथ-साथ लोगों को परिरक्षक के रूप में प्रयुक्त रसायन (Chemicals) जैसे साईट्रिक अम्ल, पोटेशियम मेटाबाई सल्फाईट, एसिटिक एसिड, सोडियम बेंजोएट, सोडियम मेटा बाई-सल्फाइट आदि को भी अपने हलक के नीचे उतारना पड़ता है. जैसा कि विगत वर्षों के दौरान निर्धारित मानक से अधिक रसायन प्रयोग करने के कारण एक शीतल पेय कम्पनी को परीक्षण के दौर से गुजरना पड़ा था और मीडिया ने कलई खोल सनसनी पैदा कर दी थी. दुर्भाग्यवश पैसों के आगे सब ढाक के तीन पात हो गया. कम्पनी आज भी मजे में अपना उत्पाद बेच रही है और लोग धड़ल्ले से प्यास बुझा रहे हैं.

(प्रदीप कुमार नायक लेखक एवं स्वतंत्र पत्रकार हैं.)
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