मेडिकल में नामांकन : दिव्यांगता में सेंध… लगा रहे बड़े-बड़े लोग!

डा. शिलेन्द्र कुमार की गिरफ्तारी सहरसा के लिए चौंकने-चौेंकाने वाली बात हो सकती है. पर, फर्जी दिव्यांगता प्रमाण-पत्र के आधार पर मेडिकल कालेजों में नामांकन से संबंधित यह कोई पहला मामला नहीं है. इस फर्जीवाड़े का दायरा देशव्यापी है.

तेजस्वी ठाकुर
17 जनवरी 2026
सहरसा : अंतिम सच क्या सामने आता है, यह वक्त बतायेगा, फिलहाल जो बातें सोशल मीडिया में सुर्खियां बटोर रही हैं, वे कोशी अंचल के चिकित्सा (Medical) जगत के शर्मसार होने के लिए पर्याप्त हैं. प्रबुद्ध वर्ग को गंभीरता से सोचने के लिए भी कि क्या पढ़े-लिखे समाज का कोई इज्जतदार व्यक्ति तुच्छ लाभ के लिए ऐसी नीचता कर सकता है? मामला सहरसा के प्रसिद्ध नेत्र रोग विशेषज्ञ (Famous Ophthalmologist) डा. शिलेन्द्र कुमार (Dr. Shilendra Kumar) से जुड़ा हुआ है. सोशल मीडिया (Social Media) की चर्चाओं पर भरोसा करें, तो अपनी ओछी करतूतों को लेकर वह तकरीबन ढाई माह से मध्यप्रदेश (Madhyprades) की जेल में बंद हैं. पुत्र हिमांशु कुमार भी. विरासत संवारने की उत्कट अभिलाषा में डा. शिलेन्द्र कुमार ने जाने-अनजाने खुद के साथ पुत्र का भी भविष्य (Future) बिगाड़ दिया है. ऐसा क्यों और कैसे हुआ, किस्सा कुछ इस प्रकार है.
जेल में हैं डा. शिलेन्द्र कुमार
सहरसा के रिफ्यूजी कालोनी (Refugee Colony) निवासी डा. शिलेन्द्र कुमार की गिरफ्तारी भोपाल (Bhopal) में हुई. आरोप पुत्र हिमांशु कुमार (Himanshu Kumar) का भोपाल के गांधी मेडिकल कालेज एवं अस्पताल (Gandhi Medical College and Hospital) में नामांकन में जालसाजी (Forgery) का है. यूजी काउंसलिंग में फर्जी (Fake) दिव्यांगता प्रमाण-पत्र (Disability Certificate) प्रस्तुत करने का. 08 नवम्बर 2025 को डा. विवेक कुमार कोरी (Dr. Vivek Kumar Kori) द्वारा भोपाल के कोहेफिजा थाने (Kohefija Police Station) में दर्ज करायी गयी प्राथमिकी में कहा गया है कि सिर्फ हिमांशु कुमार का ही नहीं, छात्रा क्रिस्टल डी कोस्टा का भी दिव्यांगता प्रमाण-पत्र फर्जी पाया गया है. दोनों का दिव्यांगता प्रमाण-पत्र बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (Banaras Hindu University) के नाम से निर्गत है. उन प्रमाण- पत्रों की जांच बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के इंस्टीच्यूट ऑफ मेडिकल सांइसेज (Institute of Medical Sciences) के ईएनटी (ENT) विभाग के प्रोफेसर डा. विशम्भर सिंह (Dr. Vishambar Singh) द्वारा करायी गयी तो वे फर्जी निकले. इस रूप में कि इन दोनो छात्रों के नाम संस्थान ने ऐसा कोई दिव्यांगता प्रमाण-पत्र जारी ही नहीं किया था.
जुड़ाव है भाजपा से
हिमांशु कुमार और उनके पिता डा. शिलेन्द्र कुमार के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई (Police Action) इसी सिलसिले में हुई. छात्रा क्रिस्टल डी कोस्टा (Crystal De Costa) और उनके पिता कलाईव (klaiv) के खिलाफ भी. कोशी अंचल में प्रसिद्ध नेत्र रोग विशेषज्ञ की पहचान रखने वाले डा. शिलेन्द्र कुमार सहरसा में अपना नेत्र चिकित्सालय चलाते हैं. कहते हैं कि वह सुपौल (Supaul) में भी प्रैक्टिस करते हैं. सिर्फ डाक्टरी ही नहीं करते हैं, राजनीति (Politics) में भी सक्रिय हैं. जुड़ाव भाजपा (BJP) से है. पार्टी की प्रदेश कार्यसमिति के सदस्य (State Working Committee Member) हैं. 2024 के संसदीय चुनाव में मधेपुरा (Madhepura) और 2025 के विधानसभा चुनाव (Assembly Elections) में सिमरी बख्तियारपुर (Simri Bakhtiyarpur) से भाजपा की उम्मीदवारी के लिए उन्होंने खूब जोर लगाया था. निराशा के सिवा और कुछ नहीं मिला. प्रजापति (Prajapati) समाज से आनेवाले डा. शिलेन्द्र कुमार की अचानक हुई गिरफ्तारी (Arrest) की खबर से सहरसा का एक बड़ा तबका सन्न रह गया. उस तबके को गहरा सदमा इसलिए भी पहुंचा कि उनकी राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों (Political and Social Activities) में उसे खुद का हित दिखता था.
फर्जीवाड़े का है बड़ा दायरा
डा. शिलेन्द्र कुमार की गिरफ्तारी सहरसा के लिए चौंकने-चौेंकाने वाली बात हो सकती है. पर, फर्जी दिव्यांगता प्रमाण-पत्र के आधार पर मेडिकल कालेजों में नामांकन (Admission) से संबंधित यह कोई पहला मामला नहीं है. इस फर्जीवाड़े का दायरा देशव्यापी है. पूर्व में भी नीट में अपेक्षित अंक नहीं ला पाने वाले अनेक छात्र ऐसे फर्जी दिव्यांगता प्रमाण-पत्र के आधार पर कई मेडिकल कालेजों में नामांकन पा चुके हैं. गौरतलब है कि देश भर के मेडिकल कालेजों में पांच प्रतिशत सीटें विशिष्ट दिव्यांगता पहचान-पत्र (यूडीआईडी) धारक छात्रों के लिए आरक्षित हैं. आरक्षित सीटों पर सिर्फ विशिष्ट दिव्यांगता पहचान-पत्र के आधार पर नामांकन नहीं होता है. इसके लिए मूल आधार भारत सरकार की ओर से प्राधिकृत सुपर स्पेशलिटी हास्पिटल द्वारा जारी दिव्यांगता प्रमाण-पत्र होता है. इसको थोड़ा और स्पष्ट करें, तो दिव्यांग कोटे में नामांकन के लिए पहचान-पत्र और प्रमाण-पत्र, दोनों की जरूरत होती है. 40 प्रतिशत से अधिक की दिव्यांगता वाले को इसका लाभ मिलता है.

सक्रिय है संगठित गिरोह
जानकारों के मुताबिक देश के अलग-अलग हिस्सों में ऐसे कई संगठित गिरोह सक्रिय हैं जो बड़ी रकम लेकर फर्जी विशिष्ट दिव्यांगता पहचान-पत्र के साथ चंडीगढ़ (Chandigarh), कोलकाता (Kolkata), वाराणसी (Varanasi), गोवा (Goa) आदि जगहों के सुपर स्पेशलिटी हास्पिटल (Super Specialty Hospital) के नाम पर फर्जी दिव्यांगता प्रमाण-पत्र भी उपलब्ध करा देते हैं. आरक्षित सीटों पर नामांकन स्थानीय यानी संबद्ध राज्य के छात्रों का ही होने का प्रावधान है. संगठित गिरोह इसके लिए दूसरे राज्यों के छात्रों का फर्जी आधार कार्ड भी बनवा देता है. सहरसा के डा. शिलेन्द कुमार और उनके पुत्र हिमांशु कुमार संभवतः ऐसे आरोप में भी घिरे हैं. ऐसा कहा जाता है कि नोएडा (Noida) इस गोरखधंधे का बहुत बड़ा केन्द्र बना हुआ है. इस फर्जीवाड़े की वजह से वास्तविक दिव्यांग छात्र मुंह देखते रह जाते हैं और पैसे वाले बड़े घरों के सामान्य छात्र दिव्यांगता में सेंध लगा डाक्टर बन जा रहे हैं.
पूर्णिया में आठ नामांकन
और जगहों की बात अपनी जगह है, राजकीय चिकित्सा महाविद्यालय एवं अस्पताल, पूर्णिया (Government Medical College and Hospital, Purnia) में भी ऐसा फर्जीवाड़ा खूब हुआ है. उपलब्ध जानकारी के मुताबिक पिछले तीन सत्रों में नामांकित ‘दिव्यांग’ छात्रों में आठ के दिव्यांगता प्रमाण-पत्र प्रथम द्रष्टया फर्जी पाये गये हैं. दिलचस्प बात यह कि जिन आठ छात्रों ने दिव्यांगता प्रमाण-पत्र आधारित आरक्षण पाया वे सब के सब ‘बहरे’ हैं. यानी कान से दिव्यांग (Hearing Impaired) हैं. फर्जीवाड़े का खुलासा तब हुआ जब 2025 में नामांकित ‘कान से दिव्यांग’ छात्र कार्तिक यादव (Kartik Yadav) सामान्य निकला. मेडिकल जांच में उसमें तनिक भी ‘बहरापन’ नहीं पाया गया. पटना के इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (Indira Gandhi Institute of Medical Sciences) के तीन सदस्यीय मेडिकल बोर्ड ने उसके बहरेपन की जांच की. गोवा मेडिकल कालेज एवं अस्पताल के नाम से जारी दिव्यांगता प्रमाण-पत्र फर्जी निकला. राजकीय चिकित्सा महाविद्यालय एवं अस्पताल, पूर्णिया ने गोवा मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल से उसकी वैद्यता की बावत जानकारी मांगी, तो उसने इस पर कोई गंभीरता नहीं दिखायी.
इन सबका हुआ नामांकन
राजकीय चिकित्सा महाविद्यालय एवं अस्पताल, पूर्णिया में एमबीबीएस (MBBS) की पढ़ाई 2023 में शुरू हुई. दिव्यांगता प्रमाण-पत्र के आधार पर 2023 के प्रथम सत्र में तीन और 2024 के द्वितीय सत्र में चार नामांकन हुए. मीडिया में जो बातें आयी हैं उसके मुताबिक 2023 में नामांकित ‘दिव्यांग’ मो. शहाबुद्दीन, फरहत शमीम और अजीत कुमार तथा 2024 में नामांकित मोहसिन फहीम, मोजाहिद, अजहर और मो. रशीद अहमद के दिव्यांगता प्रमाण-पत्र के फर्जी होने का संदेह है. 2025 में जिस कार्तिक यादव का दिव्यांगता आधारित नामांकन हुआ है वह सीतामढ़ी (Sitamarhi) का रहने वाला है.
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तलाश रही है पुलिस
कार्तिक यादव का विशिष्ट दिव्यांगता पहचान-पत्र 21 अगस्त 2025 की तारीख में महाराष्ट्र से बना हुआ है. 30 सितम्बर 2025 की तारीख में गोवा मेडिकल कालेज एवं अस्पताल (Goa Medical College and Hospital) के नाम से दिव्यांगता प्रमाण-पत्र है. राजकीय चिकित्सा महाविद्यालय एवं अस्पताल, पूर्णिया के प्राचार्य डा. हरिशंकर मिश्र के मुताबिक कार्तिक यादव के दिव्यांगता प्रमाण-पत्र के मुतल्लिक गोवा मेडिकल कालेज एवं अस्पताल से जानकारी मांगी गयी तो वहां से कोई जवाब नहीं आया. जालसाजी के आरोप में कार्तिक यादव जेल में है. उसके साथ कुणाल कुमार की भी गिरफ्तारी हुई, जो अनुग्रह नारायण मगध मेडिकल कालेज एवं अस्पताल, गया (Anugrah Narayan Magadh Medical College and Hospital, Gaya) का द्वितीय वर्ष का छात्र है. ऐसा माना जाता है कि कुणाल कुमार का तार ‘मेडिकल माफिया’ से जुड़ा हुआ है. बहरहाल, पूर्व में नामांकित ऐसे सभी सात छात्रों को मेडिकल कालेज से निष्कासित कर दिया गया है. मामला थाने में दर्ज है. पूर्णिया पुलिस उन सबको तलाश रही है.


