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एएमयू किशनगंज : खूब हुआ जमीन-जमीन का खेल

किशनगंज के लफड़े को तत्कालीन कांग्रेस सांसद मौलाना असरारुल हक कासमी और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति प्रो. पी के अब्दुल अजीज ने जमीन- जमीन खेलकर विस्तार दे दिया. कहते हैं कि प्रारंभिक दौर में तब राजद से जुड़े विधायक अख्तरूल ईमान का भी उन्हें साथ मिला. स्थल चयन की कहानी रोचकता भरी है.

राजकिशोर सिंह
21 जनवरी 2026

Kishanganj: किशनगंज-बहादुरगंज रोड में हलीम चौक पर स्थित सरकारी अल्पसंख्यक छात्रावास (Government Minority Hostel) में एएमयू की विस्तारित शाखा का कार्यालय खुल गया. स्थायी प्राध्यापकों एवं शिक्षकेत्तर कर्मियों की अनुपलब्धता के बावजूद भाड़े के एक-दो भवनों में कुछ पाठ्यक्रमों में पठन-पाठन का काम भी शुरू हो गया. एमबीए (MBA) और बीएड (B.Ed) की पढ़ाई होने लगी. बाद में बीएड की संसाधनविहीन पढ़ाई पर नेशनल काउंसिल फॉर टीचर एजुकेशन (NCET) ने रोक लगा दी. मामला अदालत में लंबित है. उपलब्ध जानकारी के अनुसार वर्तमान में एमबीए में सौ के आसपास छात्र ‘अध्ययनरत’ हैं. उनकी समुचित पढ़ाई के लिए तकरीबन 30 प्राध्यापकों और शिक्षकेत्तर कर्मियों की जरूरत है. जबकि एक भी पद स्वीकृत नहीं है. ले-देकर एक निदेशक और कुछ अनुबंध आधारित प्राध्यापकों एवं कर्मियों की बहाली हुई थी.

निदेशक भी छोड़ गये

लगभग सात साल पहले निदेशक (Director) के रूप में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (Aligarh Muslim University) के इतिहास विभाग के प्राध्यापक डा. हसन इमाम (Dr. Hasan Imam) की पदस्थापना हुई थी. किशनगंज के लोग बताते हैं कि अपने स्तर से उन्होंने इसकी स्थापना के उद्देश्य को मूर्त्त रूप देने की हरसंभव कोशिश की. लेकिन, सरकार की उदासीनता और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय प्रशासन के असहयोगात्मक रुख के कारण दो छात्रावासों के निर्माण के अलावा कुछ विशेष नहीं कर पाये. थक-हार कर अक्तूबर 2023 में निदेशक का पद त्याग विश्वविद्यालय में अपने मूल पद पर लौट गये.

नहीं आना चाहता कोई!

नये निदेशक की पदस्थापना की बाबत लंबे समय तक कहीं कोई गंभीरता नहीं दिखी रही. कार्यालय की संपूर्ण जिम्मेवारी लाइब्रेरियन (Librarian) को सौंप विश्वविद्यालय प्रशासन (University Administration) इत्मीनान हो गया. वैसे, डा. हसन इमाम को यहां जिन हालात का सामना करना पड़ा उसको देखते हुए निदेशक के तौर पर विश्वविद्यालय से कोई प्राध्यापक यहां आना नहीं चाहते हैं. काफी मशक्कत के बाद अप्रैल 2024 में प्रो. इशरत आलम (Prof. Ishrat Alam) की निदेशक के तौर पर पदस्थापना हुई. वर्तमान में प्रो. मोहम्मद तारिक (Prof. Mohammad Tariq) निदेशक का पद संभाल रहे हैं. उम्मीद इस रूप में जग रही है कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की कुलपति (Vice Chancellor) प्रो. नईमा खातून (Prof. Naima Khatoon) किशनगंज विस्तारित शाखा की समस्याओं के निदान के प्रति कुछ गंभीर दिख रही हैं.

लपक लिया मुद्दे को

सबसे पहले यह जानते हैं कि किशनगंज में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की विस्तारित शाखा की जरूरत सर्वप्रथम किस नेता ने महसूस की और फिर उस संदर्भ में आगे क्या सब हुआ. इस सच से संपूर्ण सीमांचल (Seemanchal) अच्छी तरह वाकिफ है कि इसकी आवश्यकता सबसे पहले मरहूम पूर्व केन्द्रीय मंत्री तसलीम उद्दीन (Tasleem Uddin) ने महसूस की और तदनुरूप पहल भी की. मुस्लिम बहुल यह क्षेत्र शिक्षा से रौशन हो, इसके लिए उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री (Prime Minister) मनमोहन सिंह (Manmohan Singh) से आग्रह किया था. लोग बताते हैं कि उनके इस आग्रह पर निर्णय होता, इससे पहले पूर्व केन्द्रीय मंत्री तारिक अनवर (Tariq Anwar) ने मुद्दे को लपक लिया. उस समय वह राकांपा (NCP) में थे. पार्टी सुप्रीमो शरद पवार (Sarad Pawar) के सहयोग से अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के उस समय के कुलपति को प्रभावित कर कटिहार में उसकी विस्तारित शाखा खोलने के लिए उन्होंने राजी करा लिया था.

हो जाती स्थापना

विश्वविद्यालय ने 2008 में स्वीकृति भी प्रदान कर दी थी. तारिक अनवर की गंभीरता को देखते हुए वहां इसकी स्थापना भी हो जाती. वह तो कटिहार (Katihar) में वांछित तकरीबन 300 एकड़ जमीन के अधिग्रहण में राज्य सरकार की असमर्थता की वजह से यह किशनगंज स्थानांतरित हो गया. वहां जमीन उपलब्ध करा दी गयी. इसे संयोग ही कहेंगे कि इससे तसलीम उद्दीन की इज्जत बच गयी. विस्तारित शाखा के लिए कटिहार बनाम किशनगंज का झमेला सुलझ गया तब किशनगंज में स्थल चयन का लफड़ा फंस गया. ठीक वैसा ही, जैसा दरभंगा एम्स (Darbhanga AIIMS) के मामले में फंसा हुआ था.

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कहानी स्थल चयन की

किशनगंज के लफड़े को तत्कालीन कांग्रेस सांसद (Congress MP) मौलाना असरारुल हक कासमी (Maulana Asrarul Haq Qasmi) और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति प्रो. पीके अब्दुल अजीज (Prof. PK Abdul Aziz) ने जमीन-जमीन खेलकर विस्तार दे दिया. कहते हैं कि प्रारंभिक दौर में तब राजद से जुड़े विधायक अख्तरूल ईमान (MLA Akhtarul Iman) का भी उन्हें साथ मिला. स्थल चयन की कहानी रोचकता भरी है. प्रो. पीके अब्दुल अजीज ने कई भूखंडों का मुआयना किया. उपयुक्त-अनुपयुक्त की कसौटी पर चढ़ाने-उतारने का लंबा खेल चला. लोगों को उस खेल के पीछे के खेल का रहस्य बाद में पता चला.

बदल गया फिर रुख

ऐसी चर्चा हुई कि मौलाना असरारुल हक कासमी पोठिया प्रखंड के शीतलपुर पंचायत (Sheetalpur Panchayat of Pothia Block) क्षेत्र में स्थित अफजल हुसैन (Afzal Hussain) की विवादित जमीन का इस कार्य के लिए अधिग्रहण कराना चाहते थे. कुलपति प्रो. पीके अब्दुल अजीज उनके प्रभाव में आ गये थे. कथित रूप से इसमें अख्तरुल ईमान की भी सहमति थी. बाद में कुलपति का रुख बदल गया. मौलाना असरारुल हक कासमी की मंशा फलीभूत नहीं हो पायी.मरहूम पूर्व केन्द्रीय मंत्री तसलीम उद्दीन खुले तौर पर ऐसा कहा करते थे.

(राजकिशोर सिंह पटना के वरिष्ठ पत्रकार हैं.)

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