अतीत का पन्ना : दरभंगा राज पर थी नेहरू की वक्र दृष्टि!

देखा यह गया कि जिन राजे-रजवाड़ों ने भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में भरपूर सहयोग किया, आजादी के बाद उन्हें भी सियासत से बाहर कर दिया गया. कहा गया कि बेशुमार दौलत इकट्ठा करने वाले राजे-रजवाड़े शोषक और अत्याचारी थे. लेकिन, जब लोकतांत्रिक भारत में शासकों के घोटालों, लूट, बेईमानी के काले चिट्ठे खुलते हैं, तो भारतीय इतिहास के अध्येता उन राजे-रजवाड़ों से आज के राजनेताओं की नैतिकता, शुचिता व योगदान की तुलना करने पर मजबूर हो जाते हैं.

विभेष त्रिवेदी
17 फरवरी 2026
Darbhanga: क्या देश के सभी राजे-रजवाड़े वास्तव में क्रूर, शोषक, बेईमान और जुल्मी होते थे? क्या उनमें मानवता, करुणा, दया और समाज सेवा की भावना नहीं थी? क्या वे हकीकत में वैसे ही थे, जैसी नकारात्मक छवि हिन्दी फिल्मों में गढ़ी जाती है? क्या वे सामाजिक-शैक्षणिक विकास, व्यावसायिक व औद्योगिक प्रगति, आम लोगों की रोजी-रोटी, स्वास्थ्य व परिवहन सेवाओं के प्रति गैरजिम्मेदार थे? दरभंगा के महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह (Maharajadhiraj Kameshwar Singh) के शैक्षणिक-आर्थिक योगदान, समाज कल्याण (Social Welfare) का मूल्यांकन करें तो तथाकथित लोकतांत्रिक राजनेता कठघरे में नजर आते हैं. सवाल उठता है कि आखिर देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू (Pandit Jawaharlal Nehru), बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री डा. श्रीकृष्ण सिंह (Dr. Shrikrishna Singh) और बाद के कई शासकों ने उन राजे-रजवाड़ों को उखाड़ फेंकने, उजाड़ने में पूरी ताकत क्यों झोंक दी, जिनकी लोकतंत्र में आस्था थी?
मजबूरी थी वह उनकी
आजादी के बाद शासक वर्ग के लिए एक पक्षीय इतिहास लिखने वालों ने प्रचारित किया कि राजे-रजवाड़े अंग्रेजी हुकूमत के पिट्ठू थे. इस सच्चाई को नजरंदाज नहीं किया जा सकता है कि अंग्रेजी हुकूमत से तालमेल रखना राजे-रजवाड़े की मजबूरी थी. इसका यह मतलब नहीं है कि सभी राजे-रजवाड़े अंग्रेजी शासन कायम रखने के पक्ष में थे या लोकतंत्र विरोधी थे. देखा यह गया कि जिन राजे-रजवाड़ों ने भारतीय स्वाधीनता आंदोलन (Freedom Agitation) में भरपूर सहयोग किया, आजादी के बाद उन्हें भी सियासत से बाहर कर दिया गया. कहा गया कि बेशुमार दौलत इकट्ठा करने वाले राजे-रजवाड़े शोषक और अत्याचारी थे. लेकिन, जब लोकतांत्रिक भारत में शासकों के घोटालों, लूट, बेईमानी के काले चिट्ठे खुलते हैं, तो भारतीय इतिहास के अध्येता उन राजे-रजवाड़ों से आज के राजनेताओं की नैतिकता, शुचिता व योगदान की तुलना करने पर मजबूर हो जाते हैं.
महल दे दिया कांग्रेस को
कांग्रेस पाटी (Congress Party) 1892 में इलाहाबाद (Allahabad) में अधिवेशन करना चाहती थी, पर अंग्रेज हुकूमत ने किसी सार्वजनिक स्थल पर अधिवेशन की इजाजत नहीं दी. इसकी सूचना मिलने पर दरभंगा महाराज (Darbhanga Maharaj) ने वहां एक महल ही खरीद लिया. उसी महल के ग्राउंड पर कांग्रेस का अधिवेशन हुआ. दरभंगा महाराज ने वह महल कांग्रेस को ही दे दिया. अंतिम महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह ने भी राष्ट्रीय आन्दोलन में काफी योगदान दिया. 1933 से 1946 और फिर 1947 से 1952 तक भारत की संविधान सभा के सदस्य रहे. महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) तो उन्हें अपने पुत्र के समान मानते थे. लेकिन, पंडित जवाहर लाल नेहरू उन्हें पसंद नहीं करते थे. आजादी के बाद1952 में लोकसभा का पहला चुनाव हुआ तब महाराजा कामेश्वर सिंह को कांग्रेस ने प्रत्याशी बनाना मुनासिब नहीं समझा. दरभंगा महाराज जयनगर (Jainagar) संसदीय क्षेत्र से मैदान में उतर गये. पंडित जवाहर लाल नेहरू ने उनके खिलाफ पूर्व विदेश मंत्री श्यामनंदन मिश्र (Shyamnandan Mishra) को कांग्रेस प्रत्याशी बना दिया. महाराज चुनाव हार गये.1962 में स्वतंत्र पार्टी के उम्मीदवार के रूप में वह दोबारा दरभंगा से लोकसभा का चुनाव लड़े, फिर हार गये.
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भृकुटी तनी रही कांग्रेसी शासकों की
1952 में झारखंड पार्टी (Jharkhand Party) ने उन्हें राज्यसभा का सदस्य बनवा दिया. 1960 में दूसरी बार भी राज्यसभा भेजे गये 1962 में राज्यसभा का सदस्य रहते उनका निधन हो गया. आजाद भारत में दरभंगा राज (Darbhanga Raj) पर कांग्रेसी शासकों की भृकुटी तनी रही. पत्रकार सुरेंद्र प्रसाद के शब्दों में -‘दरभंगा से पंडित जवाहर लाल नेहरू उतना ही चिढ़ते थे, जितना नरेंद्र मोदी उनसे यानी पंडित जवाहर लाल नेहरू से.’ 1883 में दरभंगा के महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह (Maharaja Lakshmeshwar Singh) चुनाव जीतकर सदन पहुंचनेवाले पहले जनप्रतिनिधि थे. उन्हें ही रॉयल कोमोनियर (Royal Commoneur) की उपाधि मिली थी. 1883 से 1962 तक दरभंगा राज कभी सदन से बाहर नहीं रहा. ऐसी राजनीतिक विरासत न पंडित जवाहर लाल नेहरू के पास थी और न ही मोहम्म्द अली जिन्ना (Muhammad Ali Jinnah) के पास.

(विभेष त्रिवेदी बिहार के वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
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