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भूली-बिसरी : जानिये, अंगिका के तानसेन को!

अपने दुःखों को पीना और लोगों के दुःखों को जीना यदुनंदन मंडल की नियति थी. जो एक बार उनके गीतों को सुन लेता वह उनका मुरीद हो जाता था. ऐसा कहा जाय कि यदुनंदन मंडल अंगिका के तानसेन थे., तो वह कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी. लोग कहते हैं तानसेन अपने गीतों से दीपक जला देते थे, तो यदुनंदन मंडल के गीतों को सुन-गुन धान-गेहूं की बालियां झूमने लगती थीं.

बासुकी पासवान
19 फरवरी 2026

Munger: ‘सैय्या रे मत कर दूर, परवल बेचै जैबे भागलपुर’… गीत आज भी अंग जनपद समेत राज्य के अन्य हिस्सों के ग्राम्यांचल में सुनने को मिल जाता है और इसके साथ ही साकार हो उठता है गेरुआ वस्त्रधारी, ठिगना कद और ओजस्वी चेहरे वाला एक ऐसा विदूषक जो अंग क्षेत्र की विहंगम संस्कृति का उद्घोष-गीत गाते-गाते खुद रो पड़ता था और सुननेवालों की भी आंखें नम कर देता था. यूं तो उन्होंने हजारों गीतों की रचना की, लेकिन-
हे हो डागडर बाबू, बीमार पड़ल बकरी
खाय के रहै घास-भूसा, खाय गैलै लकड़ी…
माघी पूर्णिमा के मेला है
जैबे गंगा नहाय
सैय्या से ठगबै रुपैया हे
जैबे गंगा नहाय…

हेगै छोटकी, हमै न जानलियो कि
मेलबा में हेराईये जैबे गे छोटकी
अगै मडुआ के रोटिया, पोठिया मछरिया
कै खिलैतै गे छोटकी…

मोर भौजी, तोर बहिनियां के
दोतल्ला मकान

अंडा गरम से ठंडा हो गया पाकिस्तान का
पापी उस शैतान का…

हेरू दियरा पहलै भस गये
भस गये फैरदा गांव
भसल जाय छै गांव के दुल्हनियां
कैसे सुधरी…
जैसे गीत आज भी अमर हैं.

गाते रहे, गुनगुनाते रहे

अपने गीतों के माध्यम से अंग जनपद के गांव-घर की सभ्यता, संस्कृति व संस्कारों को उकेरने वाले उस शख्स का नाम था यदुनंदन मंडल. अंगिका गीत (Angika Song) को स्वर देनेवाले प्रथम गायक यदुनंदन मंडल (Yadunandan Mandal) को भूलना आसान नहीं. अंग की माटी का यह सपूत ताउम्र अंगभूमि का जनगीत गाता रहा, गुनगुनाता रहा. यहां की हर धड़कन, हर अंगड़ाई को सुरों में बांध जन-जन तक पहुंचाता रहा. अपने गीतों के माध्यम से अंगिका साहित्य (Angika literature) की श्रीवृद्धि करता रहा. अंगिका को उंचाइयों तक पहुंचाता रहा. कोई माने या नहीं माने अंगिका साहित्य की आत्मा में उनके गीत अब भी रचे-बसे हैं.

तब ख्याति सरहद पार कर जाती

अंग क्षेत्र के जमालपुर (मुुंगेर) के केशोपुर गांव के एक गरीब परिवार का सदस्य यदुनंदन मंडल खेत-खलिहान, रोजी-रोजगार, मां की ममता, भाभी का प्यार व मातृतुल्य लगाव, भाई-बहनों के दुलार को अपने गीतों में ढालकर उन्हें अमरत्व प्रदान किया. उस कालखंड में अंगिका सिर्फ एक बोली थी, उसे संस्कृति व संस्कारों से जोड़कर जन-जन तक पहुंचाने के अभियान में यदुनंदन मंडल का महत्वपूर्ण योगदान रहा. कहा यह भी जाता है कि वह उस दौर के ऐसे गीतकार और गायक थे जिनका आंचलिक भाषा की काव्य रचना में कोई तुलना नहीं थी. उनके के जमाने में मीडिया का प्रचार-प्रसार का ऐसा माहौल नहीं था, जैसा आज है. अगर आज जैसा बेहतर माहौल उस वक्त होता, तो यदुनंदन मंडल की ख्याति बेशक सरहद पार तक पहुंची रहती. फिर भी उनकी गायकी को सम्मान नहीं मिला, ऐसा नहीं कहा जा सकता. वह अंगिका के पहले गायक और गीतकार (First Angika singer and lyricist) थे जिनके गीत रिकार्ड प्लेयर में दर्ज हुए.

रिकार्डिंग हुई थी गीतों की

साठ के दशक में उस जमाने की मशहूर रिकार्ड प्लेयर कम्पनी एचएमवी (HMV) ने उनके गीतों की रिकार्डिंग की थी. उसके बाद उन्हें फिल्मों के लिए कई प्रस्ताव मिले, लेकिन उनके पास मुम्बई आने-जाने के पैसे नहीं जुट सके. लिहाजा बात आयी-गयी हो गयी. अपने दुःखों को पीना और लोगों के दुःखों को जीना उनकी नियति थी. जो एक बार उनके गीतों को सुन लेता वह उनका मुरीद हो जाता था. ऐसा कहा जाय कि यदुनंदन मंडल अंगिका के तानसेन थे., तो वह कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी. लोग कहते हैं तानसेन (Tansen) अपने गीतों से दीपक जला देते थे, तो यदुनंदन मंडल के गीतों को सुन-गुन धान-गेहूं की बालियां झूमने लगती थीं. वे गीत मां के आंचल का ममत्व व देवर-भाभी के रिश्ते की ताप का अहसास करा देते थे.

इस तरह गुजरी जिन्दगी

बिल्कुल संन्यासी भेष- गेरुआ वस्त्र, लम्बी दाढ़ी, माथे पर संस्कृति का तिलक, हाथ में घुंघरू बंधा डंडा व साधारण सी डफली और कंधे से लटका एक झोला, जिसमें रहती थी उनके द्वारा लिखे गीतों की छोटी-सी पुस्तिका, के साथ हर सुबह केशोपुर स्थित अपनी टूटी-फुटी झोपड़ी से निकल खेतों, खलिहानों, बसों, ट्रेनों, प्लेटफार्म, चौराहों पर अंग जनपद की माटी में रचे-पगे अपने गीतों को सुनाता यह शख्स अंग संस्कृति का जयघोष करता रहता था. बात खेत-खलिहान की हो या रोजी-रोजगार की या पेट की आग की या फिर चीन-पाकिस्तान से बनते-बिगड़ते रिश्तों की, यदुनंदन मंडल ने इन सबको अपने गीतों में ढाला. खुद की रचित पुस्तिका दस पैसे प्रति बेच यह शख्स जिन्दगी गुजारता रहा.

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मरने के बाद भी न्याय नहीं

ताउम्र गरीबी व बेबसी झेलते यदुनंदन मंडल के साथ उनकी जिन्दगी में तो कभी न्याय नहीं ही हुआ, मरने के बाद भी उनके साथ अन्याय ही होता रहा है. उनके गीतों की चोरी कर अपने नाम से कैसेट बनवाकर बाजार में बेचा जाता रहा है और लाखों की अवैध कमाई की जाती रही है. बेशर्मी की हद तो यह है कि उन कैसेटों पर यदुनंदन मंडल का किसी भी रूप में जिक्र तक नहीं किया जा रहा है. बिहार (Bihar) की एक मशहूर गायिका ने उनके गीतों को मंच से गाकर, कैसेट बनवा कर लाखों रुपये बटोरे, लेकिन कभी उनका नाम तक नहीं लिया, उनके परिवार से उनके गीतों का कापीराइट छीन लेने का संज्ञेय अपराध किया.

कुली गाड़ी आईल गे…

यदुनंदन मंडल ने अपने गीत में अंग भूमि की पीड़ा इस प्रकार व्यक्त की है. उस वक्त जमालपुर रेल कारखाना (Jamalpur Railway Factory) के कर्मियों-श्रमिकों के आने-जाने के लिए कजरा-मुंगेर (Kajra-Munger) और कजरा-सुल्तानगंज (Kajra-Sultanganj) खंडों में कुली गाड़ी चलती थी. इधर के वर्षों से उसका परिचालन बंद है. उस कुली गाड़ी से जुड़ी अंग क्षेत्र की पीड़ा को उन्होंने अपने सुरों में पिरोया-
हेगै बड़की भौजी अगै
कुली गाड़ी आईल गे
चार पैसा के सतुआ भौजी
आधा गो प्याज गे
पत्थर फोड़े जैबै भौजी
जमालपुर पहाड़ गे

हेगै बड़की भौजी अगै कुली गाड़ी आईल गे

इस गीत के माध्यम से उन्होंने गांव के मजदूर देवर और भाभी के मां तुल्य रिश्ते को रेखांकित किया है.
दुल्हिन हो गैलै पास…
उनका एक दूसरा गीत है-
भोला बाबा हो
पूरा न होलै हमरो मन के आस
मैटरिक में हम फेल करी गेलियै

दुल्हिन हो गैलै पास…
यदुनंदन मंडल ने घर के रिश्ते को भी गीतों का आधार बनाया.
हेगै बड़की, हेगै छोटकी
तोर सैय्या मिललौ गंवार गे
तोर सैय्या बंगला पर सूतौ
तोरो जवनिया बेकार गे…

अनुकरणीय व वंदनीय

यदुनंदन मंडल के पिता महावीर मंडल (Mahavir Mandal) थे. उनका जन्म 01 जून 1922 को जमालपुर के ईदगाह रोड, केशोपुर में हुआ था. 10 अप्रैल 1988 को वह स्वर्ग सिधार गये. पुत्र राधेश्याम मंडल (Radheshyam mandal) हैं. उनका कहना है- ‘बाबूजी को भुलाना आसान है, लेकिन उनके गीतों को भुलाना आसान नहीं.’ अंगिका के भाव भरे यदुनंदन मंडल के गीत आज भी अंग देश में गूंजते रहते हैं. यदुनंदन मंडल ने अंगिका का जो अलख जगाया वह निःसंदेह अनुकरणीय व वंदनीय है.

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