बात-बेबात : वह एक और तुम उन्नीस… फिर भी बेचारा!

आचार्य किशोर
19 फरवरी 2026
Patna: यह ऐसा है कि अगर सचमुच के किसी बेचारा को सार्वजनिक रूप से बेचारा कहा जाता है तो वह बुरा मान जाता है. यहां तो बात एकदम से उल्टी थी. उम्र भर अपनी शर्त्तों पर राजनीति (Politics) करने वाले दिवंगत पासवान जी को विधानसभा में बेचारा कह दिया गया. ऐसे सभी माननीय चुप रहे, जिनका सदन में प्रवेश ही पासवानजी (Paswanji) की पार्टी और उनके पुत्र की कृपा पर हुआ है. बेचारा कहने वाले उस दल के थे, जिनके सदस्यों की संख्या महज 25 है. उधर जिन्हें बेचारा कहा गया, उनके दल के विधायकों की संख्या 19 है. उसमें भी दो अदद मंत्री हैं.
तुरंत याद आ गया…
सो, यह खबर जब पासवानजी के पुत्र और उनकी पार्टी के सर्वेसर्वा तक पहुंची तो उन्हें बुरा लगा. बहुत बुरा लगा. शोले वाला डायलाग देने लगे-वह एक और तुम उन्नीस. फिर भी बेचारा कह कर बच गया. लानत है. उनका मन हुआ कि एक-एक को खड़ी-खड़ी और कड़ी-कड़ी सुना दें. तुरंत याद आया कि ज्यादा तो दूसरे दलों से आये हैं या किसी दल में कभी नहीं रहे हैं. तत्काल सेवा का लाभ लेकर पार्टी से जुड़े हैं. दो में से एक मंत्री भी उसी कोटा के हैं. जोर से बोले और डांट-फटकार लगायी तो विधायक बुरा मान जायेंगे.
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मन मसोस कर रह गये
और बुरा मान गये तो बहुत ही बुरा हो जायेगा. पार्टी का अतीत सामने आ गया. एक बार जो पार्टी के टिकट पर जीतता है, परिवार को छोड़ बाकी अगले चुनाव तक पार्टी में नहीं रह पाता है. अब तो परिवार का भी साथ नहीं रहा. पिछले लोकसभा चुनाव में जीते परिवार के दो सदस्य भी साथ नहीं रह पाये थे. बेचारे मन मसोस कर रह गये. इस घटना ने उन्हें सावधान किया है. यह सोचने पर मजबूर किया है कि टिकट बंटवारे में तत्काल कोटा को कम किया जाये. देखिये, इस विचार का असर कितने दिनों तक रह पाता है. अधिक दिन रहना तो नहीं चाहिए.
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