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बात-बेबात : नहीं चलेगा अब चच्चा और बच्चा!

आचार्य किशोर
21 फरवरी 2026

Patna: बिहार की राजनीति में रिश्ते खूब चलते हैं. भैया की तो कमी नहीं है. अभी तेजू भैया का जोर चल रहा है. तेजू भैया मतलब तेजप्रताप यादव (Tejpratap Yadav). एक दौर चचा का चला था. वह कांग्रेस का दौर था. उस पार्टी में दो चचा खूब चर्चा में रहे. चचा केसरी तो इस नाम से इतने मशहूर हुए कि उनके हमउम्र तक चचा कह देते थे. सीताराम केसरी (Sitaram Keshri) उनका पूरा नाम था. पर, आमतौर पर यह नाम नहीं लिया जाता था. चचा केसरी कहना ही काफी था. कांग्रेस (Congress) में ही दूसरे चचा भी थे, गफूर चचा. अब्दुल गफुर. बाद में वह कांग्रेस से समाजवादी धारा की राजनीति में आ गये. इसी धारा में रहते हुए उनकी विदाई भी हुई. दोनों एक तरह से सर्वदलीय चचा थे. जब तक जीवित रहे, चचा ही बने रहे. रिश्ते का यह रुतबा बिहार की राजनीति में किसी और को हासिल नहीं हुआ.

चचा से अधिक बाबा का जोर

वैसे, बिहार की राजनीति (Bihar Politics) में चचा से अधिक बाबा का जोर रहा. मगर बाबा लोगों को राष्ट्रीय स्तर का दर्जा हासिल नहीं हुआ. एक समाजवादी बाबा हैं, तिवारी बाबा यानी शिवानंद तिवारी (Shivanand Tiwari). उन्हें राज्य स्तर का कह सकते हैं. अन्य बाबाओं का दर्जा क्षेत्रीय स्तर का है. इनमें से कुछ चले गये. कुछ बचे हुए हैं. क्षेत्रीय स्तर के बाबाओं में दो चौबे बाबा हुए. इनमें से एक आज भी सक्रिय हैं, अश्विनी चौबे (Ashwini Choubey). हलांकि, अब लगभग निस्तेज हैं. दूसरे वाले स्वर्ग सिधार गये… लालमुनि चौबे (Lalmuni Choubey). इधर भाजपा (BJP) में पटना के एक बड़े कद वाले नेता को लगा कि चचा की वैकेंसी बहुत दिनों से चल रही है. क्यों न इसे भर दिया जाये? वह विचार ही कर रहे थे कि मौका हाथ लग गया. पटना के ही एक भतीजे को बड़ी तरक्की हाथ लग गयी. स्थानीय से सीधे राष्ट्रीय स्तर पर चले गये. पदभार ग्रहण करके लौटे तो एयरपोर्ट पर जबरदस्त स्वागत किया गया.

पसंद नहीं आया भतीजे को

उस दिन बिहार भाजपा का कोई नेता घर में नहीं बैठा. सब के सब एयरपोर्ट पर पहुंच गये. उनमें चचा भी शामिल थे. चचा को लगा कि चचागिरी के लांचिग का यह राइट टाइम है. उन्होंने खुद को लांच कर दिया. बड़े पदधारक का सत्कार गाल थपथपा कर किया. बेशक उस दिन से पहले तक दोनों के बीच चचा-भतीजा का ही रिश्ता था. लेकिन, पद का भार लेकर पटना लौटे भतीजे को सत्कार और प्यार का यह तरीका कुछ पसंद नहीं आया. भतीजा से अधिक बुरा तो लाइव देख रहे दिल्ली वाले नेताओं को लगा. फिर क्या था.

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फिर नहीं शान में गुस्ताखी

चचा दिल्ली (Delhi) तलब किये गये. सत्कार के बदले फटकार से उनका स्वागत किया गया. उन्होंने सफाई दी कि वह छुटपन से ही जानते रहे हैं. मेरे सामने का बच्चा है. उन्हें समझा दिया गया कि अब वह आपका बच्चा नहीं है, आपका चच्चा बन चुका है. अदब से पेश आइये. जबरन चचा बनने की कोशिश मत कीजिये. पहले से आपका सितारा गर्दिश में तैर रहा है. बच्चा को चच्चा नहीं मानेंगे तो और भी बुरे दिन देखने पड़ेंगे. वह दिन और आज का दिन, नेताजी ने कभी बड़े पदधारक की शान में गुस्ताखी नहीं की. ढंग से मिलते हैं. झुक-झुक कर सलाम भी बजाते हैं. ये चच्चा और बच्चा कौन हैं, समझ ही गये होंगे!

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