तापमान लाइव | Tapmanlive

न्यूज़ पोर्टल | Hindi News Portal

छपरा जेल कांड : बहादुरी’ परखने में लग गये 24 साल!

बिहार के पुलिस महानिदेशक (अभियान) कुन्दन कृष्णन को 2026 का ‘वीरता पदक’ मिला है. खबर की दृष्टि से यह कोई खास मायने नहीं रखता है. गणतंत्र दिवस के मौके पर हर साल पुलिस और उससे संबद्ध सेवाओं के चुनिंदे अधिकारियों- जवानों को मिलता है. इस साल भी मिला. एक-दो को नहीं, एक साथ 22 अधिकारियों-जवानों को. उनमें एक कुन्दन कृष्णन भी हैं, जिन्हें 24 साल पहले छपरा जेल में हुए कैदियों के हिंसक उपद्रव के दौरान ‘बहादुरी’ दिखाने के लिए यह ‘पुरस्कार’ मिला है. इसमें खबर यह है कि उनकी ‘वीरता’ परखने में सरकार को 24 साल लग गये! छपरा जेल में उपद्रव कब, क्यों और कैसे हुआ? नियंत्रण कैसे पाया गया? वीरता परखने में 24 साल क्यों लग गये? उससे संबंधित यहां जो तथ्य रखे जा रहे हैं, वे अन्यत्र शायद ही पढ़ने को मिलेंगे. प्रस्तुत है, किस्तवार आलेख की पहली कड़ी :

विष्णुकांत मिश्र
22 फरवरी 2026

Chapra: छपरा जेल के कैदियों की 30 मार्च 2002 की बगावत और जेल को कब्जा में लेने की घटना को स्वतंत्र भारत की चौंकाऊ घटनाओं में एक मान हैरान होने की जरूरत बिहारवासियों को इसलिए नहीं थी कि इस जेल को पहले भी कैदी समय-समय पर घंटा-चार घंटा के लिए कब्जे में लेते रहते थे. बेबस जेल प्रशासन (Jail Administration) के समक्ष मूक दर्शक बने रहने के अलावा और कोई विकल्प नहीं रहता था. ऐसा भी नहीं कि उस दिन के खून-खराबे के बाद उपद्रव (Nuisance) का सिलसिला बंद हो गया. बाद के वर्षों में भी वैसी वारदातें होती रही हैं. जहां तक पुलिस महानिदेशक (अभियान) कुन्दन कृष्णन की बहादुरी को राष्ट्रपति
(President) का ‘वीरता पदक’ (Bravery Medal) दिलानेवाली वारदात की बात है, तो उसका किस्सा कुछ इस प्रकार है.

सारण के पुलिस अधीक्षक थे तब

कतिपय कारणों से पहले से उबल रहे कैदियों ने 27 मार्च 2002 की रात में छपरा जेल पर ‘स्थाई कब्जे’ का खुला ऐलान कर दिया और आजादी का बोध करानेवाला तिरंगा लहरा दिया. जेल को बागी कैदियों के कब्जे से मुक्त कराने के लिए हुकूमत को जो ‘कमांडो कार्रवाई’ (Commando Action) करनी पड़ी, उसी से 24 वर्षों बाद यह ‘वीरता पदक’ निकला है. ‘कमांडो कार्रवाई’ में छह विद्रोही कैदियों को जान गंवानी पड़ी थी. केन्द्रीय गृह मंत्रालय (Union Home Ministry) द्वारा गणतंत्र दिवस (Republic Day) पर हर साल पुलिस एवं संबद्ध सेवाओं के ‘बहादुर’ जवानों को ‘वीरता पदक’ और ‘विशिष्ट सेवा पदक’ दिया जाता है. राष्ट्रपति उन्हें सम्मानित करते हैं. 2026 के गणतंत्र दिवस पर बिहार (Bihar) के ऐसे 22 अधिकारियों-जवानों का चयन हुआ. उनमें एक कुन्दन कृष्णन भी हैं, जो छपरा जेल में विद्रोह के वक्त सारण के पुलिस अधीक्षक थे.

वही था एकमात्र उपाय

छपरा मंडल कारा (Chhapra Divisional Jail) में हुकूमत की उस दिन की कमांडो कार्रवाई पर तब कई गंभीर सवाल उठे थे. मुख्य यह कि पुलिस प्रशासन (Police Administration) ने खीझ उतारने के लिए छह कैदियों को मौत की नींद सुला दी. हालांकि, हुकूमत ने इस आरोप को सिरे से खारिज कर दिया और कहा कि ऑपरेशन को विफल बनाने की खातिर गोलियों और बमों से हमला कर रहे उपद्रवी कैदियों को काबू में करने के एकमात्र उपाय के तहत पुलिस ने गोलियां चलायी. उसमें चार कैदी मौके पर मौत के मुंह में समा गये. जबकि घायल दर्जन भर कैदियों में दो अक्षयवट सिंह और रंजीत कुमार सिंह ने इलाज के दौरान दम तोड़ दिया. सारण (Saran) के तत्कालीन प्रमंडलीय आयुक्त (Divisional Commissioner) पंचम लाल (Pancham Lal) और पुलिस उपमहानिरीक्षक (DIG) एमए काजमी (MA Kajmi) ने तब के गृह सचिव (Home Secretary) यूएन पंजियार (UN Panjiyar) को अपनी रिपोर्ट भेजी.

यह भी पढ़ें :

बात-बेबात : नहीं चलेगा अब चच्चा और बच्चा!

निष्कर्ष क्या निकला जांच का?

उस रिपोर्ट में पुलिस गोली चालन (Bullet firing) को जायज ठहराते हुए जिलाधिकारी (DM) पंकज कुमार (Pankaj Kumar) और पुलिस अधीक्षक (SP) कुन्दन कृष्णन (Kundan Krishnan) की पीठ थपथपा दी. लेकिन, बात वहीं नहीं रुकी. चतुर्दिक उठी मांग के समक्ष झुकते हुए सरकार ने गोली चालन की जांच कराने की घोषणा कर दी. वह जांच कब पूरी हुई, निष्कर्ष क्या निकला, जांच रिपोर्ट (Investigation Report) सार्वजनिक हुई या नहीं, इन सबके बारे में कोई अधिकृत जानकारी नहीं है. कुन्दन कृष्णन की ‘बहादुरी’ परखने में 24 साल क्यों लग गये, इसके बारे में भी नहीं. संभव है, कोई तकनीकी कारण रहा हो. वैसे, कहा जाता है कि इस चयन में राज्य सरकार की कम, मुख्य भूमिका केन्द्रीय गृह मंत्रालय की रही है.

***

अगली कड़ी
छपरा जेल कांड: कैदी रहते थे… अपनी मर्जी से!

#Tapmanlive