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छपरा जेल कांड : कैदी रहते थे… अपनी मर्जी से!

छपरा जेल कांड का तात्कालिक कारण कुख्यात कैदियों का दूसरे जेलों में स्थानांतरण ही था. इस उपद्रव से पहले के दो वर्षोंं के दरमियान इस जेल में मारपीट की 26 घटनाएं हो चुकी थीं. कैदियों के स्थानान्तरण के विरोध में जेलकर्मियों पर हमला भी होता रहा था. उन सबसे सबक ले 17 मार्च 2002 की घटना के परिप्रेक्ष्य में सतर्कता बरती जाती तो खूनी इतिहास नहीं बनता.

विष्णुकांत मिश्र
23 फरवरी 2026

Patna: छपरा जेल में कमांडो कार्रवाई की कहानी काफी रोमांचक है. महीनों से पूर्णकालिक जेल अधीक्षक और कारापाल विहीन जेल में जेलकर्मी भी आवश्यकता से काफी कम थे. फिर भी जेल (Jail) है, इसका आभास वह कराता था. उस वक्त 600 की क्षमता के विरुद्ध 01 हजार 182 कैदी बंद थे, लेकिन अपनी मर्जी से. सिर्फ छपरा (Chapra) में ही नहीं, उस कालखंड में राज्य के प्रायः सभी जेलों में कैदी अपनी मर्जी से ही रहते थे. जो नहीं रहना चाहते थे, आराम से चलते बनते थे. वर्तमान में भी बिहार के जेलों के हालात कमोबेश वैसे ही हैं. जेलों की बदइंतजामी और अप्रिय वारदातों को रोकने के लिए सरकारी उपायों के तहत कुख्यात कैदियों के दूसरे जेलों में स्थानान्तरण का सहारा लिया जाता रहा है. जेल से मोबाइल फोन (Mobile Phone) के जरिये गिरोह और आपराधिक गतिविधियों के संचालन पर लगाम लगाने के लिए सरकार ने जैमर का नुस्खा अपनाया, लेकिन उस पर मुकम्मल रूप में अमल नहीं हो पाया.

नहीं बरती गयी तब सतर्कता

छपरा जेल कांड (Chapra Jail Kand) का तात्कालिक कारण कुख्यात कैदियों का दूसरे जेलों में स्थानांतरण ही था. इस उपद्रव से पहले के दो वर्षोंं के दरमियान इस जेल में मारपीट की 26 घटनाएं हो चुकी थीं. कैदियों के स्थानान्तरण के विरोध में जेलकर्मियों पर हमला भी होता रहा था. उन सबसे सबक ले 17 मार्च 2002 की घटना के परिप्रेक्ष्य में सतर्कता बरती जाती तो खूनी इतिहास नहीं बनता. वस्तुतः जेल पर बंदियों का कब्जा उस दिन ही हो गया था. लेकिन, ऐलानिया कब्जा 27 मार्च 2002 को हुआ. उपलब्ध जानकारी के मुताबिक 17 मार्च 2002 को मुलाकातियों के सवाल पर मामला गरमा गया था. वह मामला छपरा के मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी (Chief Judicial Magistrate) की अदालत (Court) में भी गया था.

कर दी तोड़फोड़ जेल में

हुआ यह था कि बंदी शशिभूषण सिंह को मुलाकाती एक बंद कार्टून देना चाहते थे. उस कार्टून में क्या था, किसी को नहीं मालूम. सुरक्षाकर्मियों ने उसे जेल में ले जाने का विरोध किया. इससे कैदियों के एक तबके ने उत्तेजित हो जेल में तोड़फोड़ कर दी. ड्यूटी पर तैनात सुरक्षाकर्मियों से चाबी छीन 10 जेलकर्मियों को बंधक बना तकरीबन पांच घंटे तक जेल को अपने कब्जे में कर लिया था. मुक्त कराने के लिए जिला प्रशासन को काफी मशक्कत करनी पड़ी थी. इससे पहले 02 अक्तूबर 2001 को भी प्रेम कुमार सिंह और गणेश साह नामक कैदियों की मौत से आक्रोशित बंदियों ने जेल पर कब्जा जमा लिया था. फिर 24 फरवरी 2002 को कैदियों के दो गुटों के बीच गोलीबारी हुई थी.

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जेल पर कब्जा कर लिया

स्थिति की गंभीरता के मद्देनजर जिलाधिकारी (DM) पंकज कुमार (Pankaj Kumar) ने उत्पाती पांच कैदियों- जटाशंकर सिंह, शशिभूषण सिंह, अक्षयवट सिंह, संजय राय और वकील राय के स्थानान्तरण की अनुशंसा कर दी. उस अनुशंसा को कारा महानिरीक्षक की सहमति भी मिल गयी. तीन कैदियों को बक्सर (Buxar) और दो को भागलपुर (Bhagalpur) केन्द्रीय कारा ले जाने के लिए 27 मार्च 2002 की रात में संबद्ध दंडाधिकारी स्थानान्तरण का चालान लेकर जेल में पहुंचे तो कैदियों ने तोड़-फोड़ शुरू कर दी. जेल के अधिसंख्य अधिकारियों और सुरक्षाकर्मियों को बाहर निकाल एवं कुछ को वार्ड संख्या आठ में बंद कर भीतर से मुख्य द्वार पर ताला जड़ जेल पर कब्जा जमा लिया.

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