सर्वोच्च अदालत : उद्योग तबाह… ट्रेड यूनियन जिम्मेवार

तापमान लाइव ब्यूरो
24 फरवरी 2026
New Delhi : ट्रेड यूनियनों की वजह से देश की औद्योगिक प्रगति (Industrial Progress) काफी हद तक रुक गयी है. कई कल-कारखाने (Ffactories) और पारंपरिक उद्योग बंद हो गये हैं. यह कथन किसी राजनीतिक दल के नेता का नहीं, देश के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत का है. सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) में घरेलू कामगारों के लिए न्यूनतम मजदूरी और कल्याणकारी उपायों की मांग से संबंधित दायर लोकहित याचिका पर सुनवाई के दौरान उन्होंने ऐसा कहा. याचिका पेन थोजिलारगल संगम (Pen Thozhilalargal Sangam) और अन्य यूनियनों ने दायर की थी. उसमें कहा गया था कि घरेलू कामगारों को न्यूनतम मजदूरी अधिसूचना के तहत शामिल किया जाये.
दूसरे तरीके भी हैं…
‘लाइव लॉ’ के अनुसार प्रधान न्यायाधीश (Chief Justice) सूर्यकांत (Suryakant) और न्यायाधीश जॉयमाल्या बागची (Justice Joymalya Bagchi) की दो सदस्यीय खंडपीठ ने याचिका पर सुनवाई की. सुनवाई की शुरुआत में ही प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि ऐसा होने से हर घर मुकदमे में फंस जायेगा. इसी सिलसिले में उन्होंने कहा कि ट्रेड यूनियन (Trade Union) लीडर देश की औद्योगिक वृद्धि रोकने के लिए ज्यादा जिम्मेदार हैं. यह सही है कि शोषण होता है, लेकिन शोषण रोकने के दूसरे तरीके हैं. लोगों को उनके व्यक्तिगत अधिकारों के बारे में जागरूक करना चाहिए. उन्हें ज्यादा स्किल्ड बनाना चाहिए, कई अन्य सुधार होने चाहिए.
खारिज हो गयी याचिका
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘ट्रेड यूनियन लीडर मजदूरों को बीच में छोड़ देते हैं. बड़े शहरों में अब एजेंसियां घरेलू कामगारों (Domestic Workers) की सेवाएं दे रही हैं. वे ही असली शोषक हैं. उन्होंने एक मिसाल दी कि सर्वोच्च अदालत ने एक एजेंसी को प्रति कामगार 40 हजार रुपये दिये थे, लेकिन कामगार को सिर्फ 19 हजार रुपये मिले. उन्होंने चेतावनी दी कि अगर न्यूनतम मजदूरी तय कर दी गयी, तो लोग घरेलू कामगार रखना बंद कर देंगे. इससे बेरोजगारी (Unemployment) बढ़ेगी और मजदूरों को अधिक नुकसान होगा. यह कहते हुए प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायाधीश जॉयमाल्या बागची ने याचिका खारिज कर दी.
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यह काम राज्यों का है
शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि वह केन्द्र या राज्यों को कानून बनाने का आदेश नहीं दे सकती. यह विधायी मामला है. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक याचिका में 2025 के एक फैसले का हवाला दिया गया था जिसमें प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने घरेलू कामगारों के लिए कानून बनाने की बात कही थी. तब केन्द्र ने कहा था कि यह राज्यों का काम है.
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