बात-बेबात : माल तो गायब हुआ ही… महिला भी गायब हो गयी!

आचार्य किशोर
24 फरवरी 2026
PATNA: कहावतें हर युग में जीवंत हो उठती हैं. क्योंकि यह हमारे पुरखों की शोध की देन हैं. तभी तो कभी नहीं मरती हैं. एक कहावत है कि चोर का धन उसे छिपाने वाला ही खा जाता है. विभिन्न बोलियों में इसका अलग-अलग रूप है. लेकिन, हर जगह मूल भाव यही है कि चोरी के माध्यम से आये धन को बचाने में अधिक श्रम की जरूरत होती है. इसका संदेश यही है कि चोरी के माध्यम से धन कमाया तो जा सकता है, इसे छिपा कर रखना कठिन होता है. यह मामला, जिसकी चर्चा हो रही है, किसी चोर से नहीं, माननीय कहे जाने वाले एक मंत्री से जुड़ा हुआ है. क्योंकि कानून उन्हें माननीय कहता है, इसलिए उन्हें चोर कहना मुनासिब नहीं होगा. चर्चा माननीय से शुरू करते हैं.
झोला में या बोरा में…
माननीय कार्य विभाग के मंत्री (Minister) हैं. कार्य विभागों में जितना कार्य होता है, उसका कमीशन भी कटता है. कमीशन का एक तयशुदा हिस्सा मंत्री के पास भी पहुंचता है. कमीशन का हिस्सा दो नम्बर का होता है, इसलिए एक नम्बर में इसका हिसाब नहीं रखा जाता है. कहने का मतलब यह कि रुपया झोला या बोरा में आता है. उसी प्रक्रिया से विचरण करता है. विचरण के क्रम में कुछ रुपया बैंक में घुस कर एक नम्बर का दर्जा हासिल कर लेता है. ऐसा ही एक बोरा माननीय के यहां भी पहुंचा. उसे छिपाने के लिए घर में काम करने वाली एक महिला को दे दिया गया.
महिला भी गायब हो गयी
उसे बताया गया कि स्टोर में जहां रसोई के जिंस के बोरे पड़े हैं, उन्हीं के बीच रख दो. महिला जिज्ञासावश बोरे को टटोलने लगी. जिंस के बारे में अंदाजा नहीं लगा तो बोरे का मुंह खोला. बोरा से ज्यादा उस महिला का मुंह खुल गया. उसने जल्दबाजी नहीं दिखायी. रोज कुछ-कुछ निकाल कर ले जाने लगी. कुछ ही दिनों में बोरा का सारा माल गायब हो गया. इसके साथ ही महिला भी गायब हो गयी. एकाध दिन महिला नहीं आयी तो सोचा गया कि मौसमी बीमारी की चपेट में आ गयी होगी. इंतजार किया गया.
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बोझ जनता पर
कई दिनों बाद भी वह नहीं आयी तो सामान घर में रखे उस बोरे की खोज हुई. बोरा खाली था. उसका मुंह खुला था. इसे देख कर माननीय का भी मुंह खुला और उससे तगड़ी चीख निकली. चीख सुन कर मैडम भी आ गयीं. फिर दोनों के मुंह से चीख निकलने लगी. चीख की आवाज बाहर तक गयी. उसे सुनकर संतरी भी आ गये. संतरी को काम वाली महिला के घर दौड़ाया गया. वहां ताला पड़ा हुआ था. थाना-पुलिस में इस तरह के मामले की रपट नहीं लिखवायी जा सकती है. यह बोझ भी जनता को ही उठाना पड़ेगा. निर्माण और कमजोर होगा.
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