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कामाख्या मंदिर : अम्बूवाची पर्व… कामरूपों का कुंभ

ऐसी मान्यता है कि ‘अम्बूवाची पर्व’ के दौरान मां कामाख्या रजस्वला होती हैं और योनि कुंड से जल प्रवाह की जगह रक्त प्रवाह होता है. इस वजह से मां कामाख्या को बहते हुए खून की देवी भी कहा जाता है. कलिकाल में इसे अद्भुत माना जा रहा है.

  • वाम मार्ग साधना का सर्वोच्च पीठ

  • तांत्रिकों-अघोरियों का भारी जमावड़ा

  • देवी कामाख्या के मामले में ऐसा नहीं है

  • चार दिनों के बाद खुलेगा गर्भगृह का कपाट

विशेष संवाददाता
22 जून 2025

Guwahati: कामरूप कामाख्या मंदिर देश का सर्वाधिक पुराना शक्तिपीठ (Shaktipeeth) है. इसे कामरूप कामाख्या सिद्धपीठ (Kamrup Kamakhya Siddhapeeth) के रूप में भी जाना जाता है. मंदिर में प्रति वर्ष जून माह में चार दिवसीय अम्बूवाची पूजा (Ambuvachi Puja) का आयोजन किया जाता है. इस पूजा को नारी शक्ति और प्रजनन क्षमता के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है. इसमें अन्य श्रद्धालुओं के अलावा देशभर के तांत्रिक और अघोरी (Tantric and Aghori) हिस्सा लेते हैं. काफी संख्या में तांत्रिक विदेशों से भी पहुंचते हैं. उन सबका मेला लगता है. इस वर्ष यह मेला 22 जून से शुरू हुआ है. इसे देवी कामाख्या (Goddess Kamakhya) के वार्षिक मासिक धर्मचक्र (Annual Menstrual Cycle) का उत्सव भी कहा जाता है.

जल प्रवाह की जगह रक्त प्रवाह

ऐसी मान्यता है कि ‘अम्बूवाची पर्व’ के दौरान मां कामाख्या रजस्वला (Rajswala) होती हैं और योनि कुंड से जल प्रवाह की जगह रक्त प्रवाह होता है. इस वजह से मां कामाख्या को बहते हुए खून की देवी भी कहा जाता है. कलिकाल में इसे अद्भुत माना जा रहा है. कामाख्या तंत्र में कहा गया है:

योनि मात्र शरीराय कुंजवासिनि कामदा।
रजोस्वला महातेजा कामाक्षी ध्येताम सदा।।

रजस्वला यानी मासिक धर्म (Menstruation) को अपने देश में अशुद्ध माना जाता है. इस प्रक्रिया से गुजरने वाली लड़कियों को आमतौर पर उस दौरान ‘अछूत’ समझा जाता है. पर, मां कामाख्या के मामले में ऐसा नहीं है.

बंद हो जाते हैं कपाट

उक्त अवधि में मंदिर का कपाट तीन दिनों तक बंद रहेगा. चौथे दिन 26 जून को ‘निवृति अनुष्ठान’ के बाद कपाट खुल जायेंगें. उस दिन विशेष पूजा एवं साधना की जायेगी. इसकी महत्ता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इस पर्व में तंत्र-मंत्र-यंत्र साधना तथा सभी प्रकार की सिद्धियां एवं मंत्रों के पुरश्चरण हेतु पूरे विश्व के उच्च कोटि के तांत्रिकों-मांत्रिकों, अघोरियों का बड़ा जमघट लगा रहता है.

अम्बूवाची का है बड़ा महत्व

जिस प्रकार उत्तर भारत में कुंभ महापर्व (Kumbh Mahaparv) का महत्व है, ठीक उसी प्रकार या उससे भी कहीं अधिक इस आद्य शक्ति के अम्बूवाची पर्व (Ambuvachi Festival) का महत्व है. समस्त तांत्रिकों, मांत्रिकों एवं सिद्ध पुरुषों के लिए यह योग पर्व वरदान के समान है. इसके अन्तर्गत विभिन्न प्रकार की दिव्य अलौकिक शक्तियों का अर्जन तंत्र-मंत्र में सिद्ध साधक अपनी-अपनी मंत्र शक्तियों को पुरश्चरण अनुष्ठान कर स्थिर रखते हैं. इस पर्व में मां भगवती (Maa Bhagwati) के रजस्वला होने से पूर्व गर्भगृह स्थित महामुद्रा पर सफेद वस्त्र चढ़ाये जाते हैं, जो उक्त अवधि में रक्तवर्ण हो जाते हैं. ऐसा कहा जाता है, यह अनसुलझा रहस्य है.

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अम्बूवाची वस्त्र के टुकड़े होते हैं प्रसाद

मंदिर के पुजारियों द्वारा ये वस्त्र, जिसे अम्बूवाची वस्त्र कहते हैं, इसके टुकड़े प्रसाद के रूप में श्रद्धालु भक्तों में विशेष रूप से वितरित किये जाते हैं. इस अम्बूवाची प्रसाद को अंगोदक और अंगवस्त्र कहा जाता है. कहा जाता है कि जिन्हें यह प्रसाद मिलता है, उनके तमाम कष्ट दूर हो जाते हैं. अंगोदक का इस्तेमाल तांत्रिक साधनाओं और उपायों में किया जाता है. पौराणिक धर्मग्रंथों के अनुसार सतयुग में यह पर्व 16 वर्ष, द्वापर में 12 वर्ष तथा त्रेता युग में 7 वर्ष में एक बार आयोजित हुआ करता था. कलिकाल में हर साल जून माह में तिथि के मुताबिक मनाया जाता है. वाममार्ग साधना का यह सर्वाेच्च पीठ है. मछन्दरनाथ, गोरखनाथ, लोना चमारी, ईस्माइल जोगी इत्यादि तंत्र साधक भी सांवर तंत्र में यहीं स्थान बनाकर अमर हुए हैं.

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(यह आस्था और विश्वास की बात है. मानना और न मानना आप पर निर्भर है.)

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