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किछौछा शरीफ दरगाह : पूरी होती हैं मन्नतें-मुरादें

एस एन श्याम
23 जून 2026
Lucknow : सूफी संत मखदूम अशरफ जहांगीर सिमनानी रहमतुल्लाह अलैह के मजार पर कई मेले लगते हैं. उनमें सबसे महत्वपूर्ण सालाना उर्स मेला (Annual Urs Fair) है जो मुस्लिम माह के मुहर्रम (Muharram) की 25 से 28 तारीख तक आयोजित होता है. सालाना उर्स के दौरान भारत (India) के विभिन्न प्रांतों से तकरीबन छह लाख श्रद्धालु दरगाह परिसर (Dargah complex) में जमते हैं. ऐसी मान्यता है कि उर्स के मौके पर मखदूम अशरफ जहांगीर (Makhdum Ashraf Jahangir) की पोशाक सहित अन्य वस्तुओं के दर्शन करके दुआएं मांगने से मन्नतें-मुरादें पूरी होती हैं.

सालाना उर्स के अलावा अगहन मेला (Aghan Fair) और मजार शरीफ का गुस्ल मुबारक मेला (Gusl Mubarak Fair) काफी प्रसिद्ध है. स्थानीय लोगों के मुताबिक दीपावली की रात हर साल दरगाह स्थित 627 वर्ष पुराने तालाब का तट लाखों दीपों से जगमगा उठता है. इसे ‘दीपोत्सव’ भी कहा जाता है. इस्लाम के अलावा हिन्दू धर्म के लोग भी उस दिन वहां दीप जलाते हैं. उसी दिन से अगहन मेला शुरू होता है जो 40 दिन तक चलता है. मेले में अधिकतर हिन्दू लोग ही दर्शन-पूजन के लिए आते हैं और अपनी बीमारियों का रूहानी इलाज कराते हैं.

दो दिवसीय गुस्ल मुबारक का भी काफी महत्व है. किछौछा शरीफ दरगाह (Kichhaucha Sharif Dargah) में साल में सिर्फ एक बार मखदूम अशरफ जहांगीर के मजार को गुस्ल दिया जाता है. उसे ही गुस्ल मुबारक कहते हैं. मजार शरीफ को गुस्ल देने के बाद जायरीनों में गुस्ल का पानी वितरित किया जाता है. वे उसे घर ले जाते हैं. रूहानी बीमारी और शैतानी साया के शिकार लोग गुस्ल का पानी पीते हैं तो वे निरोग हो जाते हैं. हर साल उर्दू महीना रज्जब में अजमीरी मेला (Ajmeri Fair) और प्रत्येक उर्दू माह में प्रथम वृहस्पतिवार को नौचंदी मेला लगता है. इन मेलों में भी भारी भीड़ जुटती है. (समाप्त)

(यह आस्था और विश्वास की बात है. मानना और न मानना आप पर निर्भर है.)

(एस. एन. श्याम बिहार के वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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