सवाल विरासत का : लुट गया कैसे… लालू प्रसाद का कारवां?

विशेष संवाददाता
26 दिसम्बर 2025
Patna : सवाल उठ रहा है कि बिहार में राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद की राजनीतिक विरासत का अब क्या होगा? बिहार विधानसभा (Bihar Assembly) के 2025 के चुनाव में सभी दलों से अधिक 23 प्रतिशत मत लाकर भी राजद बैकफुट पर क्यों है? समर्थक सामाजिक समूहों, विशेष कर यादव और मुस्लिम मतदाताओं द्वारा लगभग पूरी ताकत झोंक दिये जाने के बाद भी महागठबंधन (Mahagathbandhan) की गाड़ी लुढ़क क्यों गयी? तेजस्वी प्रसाद यादव के मुख्यमंत्री (Chief Minister) बनने के सपने ताश के पत्तों की तरह बिखर क्यों गये? राहुल गांधी (Rahul Gandhi) और मुकेश सहनी (Mukesh Sahani) के जाल को फाड़कर सत्तारूपी मछलियां एनडीए (NDA) के बाड़े में कूद गयीं, तो फिर चूक कहां हुई? कैसे लुट गया लालू प्रसाद (Lalu Prasad) का कारवां? यह सचमुच ‘तिलिस्मी लालू युग’ का अंत है या मध्यांतर है? नुक्ते के हेर-फेर से खुदा जुदा हो गये!
क्यों उठ रहा सवाल?
2025 के चुनाव में राजद (RJD) को 01 करोड़ 14 लाख 56 हजार 055 मत प्राप्त हुए. यह 2020 की तुलना में महज 0.11 प्रतिशत कम है. पर, विधायकों की संख्या 75 से घटकर 25 पर आ गयी. ऐसा क्यों और कैसे हुआ?142 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली जिस पार्टी को हर सीट पर औसतन 80 हजार 676 वोट प्राप्त हुए, उसके नेता के सियासी भविष्य पर सवाल क्यों उठ रहा है? विधानसभा के लगातार पांच चुनावों में जिस पार्टी को सर्वाधिक वोट (प्रतिशत में) प्राप्त होता रहा है, वाकई उसके ‘लालटेन’ की रोशनी गुम हो रही है? क्या तेजस्वी प्रसाद यादव (Tejaswi Prasad Yadav) की किस्मत में बिहार का तख्त-ओ-ताज नहीं बदा है? इस सवाल का जवाब ‘हां’ है तो क्यों नहीं बदा है? जवाब ‘नहीं’ है तो कौन, कब और कैसे दिलायेगा उन्हें बिहार का तख्त-ओ-ताज?
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एकाधिकार कब तक?
क्या यादव समाज तेजस्वी प्रसाद यादव के सिर पर ताज बंधवा पायेगा? आखिर कब तक मुस्लिम समाज पर लालू प्रसाद के परिवार का एकाधिकार रहेगा? क्या मुसलमान (Musalman) राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा (BJP) से लोहा ले रहे कांग्रेस नेता राहुल गांधी की ओर मुखातिब नहीं होंगे? ऐसा क्यों कहा जा रहा है कि निकट भविष्य में बिहार में किसी यादव नेता के सिर पर ताज बंधना मुश्किल है? दोष सिर्फ यादव समाज की आक्रामकता, दबंगई में है या तेजस्वी प्रसाद यादव की चुनावी रणनीति में ही बड़ी कमियां-खामियां हैं? तेजस्वी प्रसाद यादव आज जिस सियासी चौराहे पर खड़े हैं, वहां से रास्ते कहां-कहां जाते हैं? इन सवालों के जवाब बिहार में आने वाले दशक में सिर्फ विपक्ष ही नहीं, सत्ता पक्ष के भी भविष्य तय करेंगे.
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काठ की हांडी साबित होंगे?
बिहार की राजनीति की गहरी समझ रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार विभेष त्रिवेदी का मानना है कि अगले एक दशक में बहुत कुछ तय होने वाला है. लेकिन, बड़ा सवाल यहां यह भी है कि नीतीश कुमार (Nitish Kumar) और लालू प्रसाद के बाद बिहार का क्षेत्रीय क्षत्रप कौन होगा? अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी (Narendra Modi) के कंपकंपाते हाथ भी उनके सियासी कैरियर के ढलान पर होने के संकेत दे रहे हैं. क्या उनकी सोशल इंजीनियरिंग बिहार के सियासी मैदान में कोई नया वटवृक्ष पनपने नहीं देगी? क्या तेजस्वी प्रसाद यादव काठ की हांडी साबित होंगे, जिसमें सत्ता की खिचड़ी दोबारा नहीं पक सकती? या वह विधानसभा के 2015 के चुनाव जैसे या उससे भी अधिक प्रचंड बहुमत से वापसी करेंगे? इस आलेख में मुख्य रूप से उन कड़वी सच्चाइयों की ही विवेचना है, जिनकी वजह से बिहार में मजबूत वोट बैंक होने के बावजूद जनता के दिल तक राजद नहीं उतर पाया है. बढ़-चढ़कर प्रचार-प्रसार किया गया, लोक लुभावन (Populist) वादे किये गये. नारे उछाले गये. तेजस्वी प्रसाद यादव को बिहार का भविष्य बता बदलाव का उद्घोष किया गया. हर घर में रोजगार देने का वादा किया गया, फिर भी चूक गये तेजस्वी प्रसाद यादव!
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