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मदन वात्स्यायन : एक अकेला शुक्रतारा दीप

वीरसिंहपुर में ननिहाल

यह तो और भी उत्साहजनक लगा कि मदन वात्स्यायन मेरे गृह जनपद समस्तीपुर के थे. उनके संबंध में कुछ और पढ़ा, तो पता चला कि वह कल्याणपुर (Kalyanpur) प्रखंड के वीरसिंहपुर के थे. मेरे जैसे घुमंतू भोटिया को अब तक किसी यात्रा ने पछाड़ा नहीं, क्योंकि मैं अपनी धुन का धुनी हूं. मस्त-मलंग, दुनिया जो चाहे समझे. मुझे वीरसिंहपुर जाकर मदन वात्स्यायन के गांव-गिरांव की टोह लेनी थी.लेकिन, तत्काल यह हो न सका. कारण यह कि मैथिली कवि नरेश कुमार विकल (Naresh Kumar Vikal) का एक लेख पढ़ा. उन्होंने लिखा था कि मदन वात्स्यायन गढ़सिसई के थे, वीरसिंहपुर में ननिहाल था.

प्रथम हृदयरोग शल्य चिकित्सक

इधर के डेढ़ साल में गढ़सिसई होकर मैं न जाने कितनी बार आया-गया. लेकिन एक तो नौकरी की परवशता, उस पर समय का असहयोग. इसके बाद भी उस दिन निकला, तो अकेले निकल गया. मन में सिर्फ मदन वात्स्यायन ही चलते रहे, जिन्हें अज्ञेय ने अपनी काव्य परंपरा के स्तंभरूप में स्वीकार किया था. दलसिंहसराय (Dalsinghsarai) अनुमंडल में है गढ़सिसई, विद्यापतिनगर (Vidyapatinagar) प्रखंड का उत्तरवर्ती गांव. यह वही गांव है, जहां जन्म लेने वाले डा. श्रीनिवास देश के प्रथम हृदयरोग शल्य चिकित्सक हुए. उन दिनों गढ़सिसई में कोई स्कूल नहीं था. अब तो पंद्रह वार्डों में बंटे इस गांव में करीब सवा दर्जन स्कूल हैं.

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प्रयोग और प्रगति

गांव में स्कूल नहीं होने के कारण डा. श्रीनिवास ने अपनी आरंभिक पढ़ाई वीरसिंहपुर में पूरी की. उनके भाई लक्ष्मीनिवास सिंह ने भी गढ़सिसई के बजाय अपने आरंभिक जीवन का बहुलांश वीरसिंहपुर में गुजारा. वह सिंदरी (Sindri) के खाद कारखाने में निरीक्षी वैज्ञानिक हुए. डा. श्रीनिवास सिंह के दो बेटे हुए. एक तो बोकारो (Bokaro) में इंजीनियर बने और दूसरे अमेरिका (America) में डाक्टर. लक्ष्मीनिवास सिंह ने जिस संयत्रशाला में काम किया था, उसी की गति और उत्तुंग उठते कोलाहल को अपनी कविता-कहानियों का विषय बनाया था. उनकी साहित्य रचनाओं ने जीवनरोधी जटिलताओं और जीवन में हस्तक्षेप करते यंत्रों, भविष्य और भयावह होती व्यस्तताओं को अपना साहित्य विषय बनाया, तो प्रयोग और प्रगति के साहित्यवादों के समय में उन्हें अलग तरह से पहचाना जाने लगा.

साहित्यिक नाम गढ़ लिया

अज्ञेय (Agyeya) ने उन्हें ‘तीसरा सप्तक’ में शामिल किया. लक्ष्मीनिवास सिंह भी अज्ञेय से प्रभावित थे. अज्ञेय के मूल नाम का उपनाम ‘वात्स्यायन’ जोड़ते हुए उन्होंने अपना एक अलग साहित्यिक नाम गढ़ लिया- मदन वात्स्यायन. 2022 में मदन वात्स्यायन पर भारत सरकार की साहित्यिक पत्रिका ‘आजकल’ (Ajkal) ने एक विशेषांक प्रकाशित किया. मदन वात्स्यायन पर थोड़ा बहुत और पढ़ा-लिखा गया है. लेकिन, जो काम होना था, वह होने से रह गया. अज्ञेय ने जिन काव्य संकलनों का संपादन किया था, उनका महत्व न सिर्फ साहित्य के परिवर्तित हो रहे स्वरों की पहचान के लिए है, बल्कि साहित्य में समाज का यथार्थ, कल्पनाशीलता के अनुपयोगी चरित्र को दिखाने के लिए भी कम नहीं है.

अज्ञेय का ध्यान खींचा

अज्ञेय की प्रतिभा साहित्य में अन्यतम रही. जब वह सप्तकों का संपादन करने बैठे, तो उन्होंने अपनी तरह की ही प्रतिभाएं तलाशीं. मदन वात्स्यायन वैसी प्रतिभा के कवि थे, जिन्होंने अज्ञेय का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया था. अज्ञेय ने उनकी कविताओं को ‘तीसरा सप्तक’ में सम्मिलित किया था. मदन वात्स्यायन जिस दौर के कवि थे, उस दौर में न तो आज की तरह मशीनीकरण का घोर उत्पात था और न ही पूंजीवाद के सामने उत्पाद लेने की ऐसी बैचैनी थी. मशीनीकरण की शुरुआत लेकिन उस दौर में हो चुकी थी, पूंजीवाद दौड़ने लगा था. मदन वात्स्यायन इंजीनियर थे, वह मशीनों के आसपास रहते थे. मशीनों की भाषा समझते थे, लेकिन आदमी की आदमीयत का करुण पक्ष और उसकी रुग्ण मनोदशा भी पढ़ रहे थे. उनके भीतर कोई विद्रोह उठ रहा था. वह धन के बढ़ते प्रभुत्व से चिंतित हो रहे थे. विषवदन होती प्रवृत्ति को अपनी कविताओं- कहानियों में उठा रहे थे.

दूसरी कड़ी : विस्तृत नहीं हो पाया किशोरवय का कवित्व