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मदन वात्स्यायन : विस्तृत नहीं हो पाया किशोरवय का कवित्व

सामाजिक सान्निध्य

अज्ञेय (Agyeya) के सप्तक परिवार के कवियों की कविताओं का जन्म वैसी संवेदनाओं से हुआ था, जिनमें अपने परिवेश और परिस्थितियों का बोध था, भाषा का कोई शुद्ध घनत्व था, जीवन के अस्तित्व पर बोलने की व्यग्रता थी. उद्योगों के आतंककारी उत्ताप के अवयव थे, प्रकृति के साहचर्य और सामाजिक सान्निध्य का भाव था. मदन वात्स्यायन इन्हीं गुणों की काव्य प्रवृत्ति के कवि थे.परंतु वह अपनी कविताओं में कम ही उद्धरणशीलता बना पाये. कविताओं के आलोचना क्षेत्र का अलग दंभ है, अलग-अलग वाद-विवाद हैं. मत भी कम नहीं, मतभेद तो और भी. कवि अन्याय के प्रतिकार के लिए कविताएं लेकर निकलता है, परंतु कविता की ऊर्जा कवि के शरीर और व्यवहार की संपूर्णता नहीं होती.

संतुष्ट हुए अज्ञेय

हिन्दी साहित्य की समालोचना संस्कृति में ऐसी उदार दृष्टि होती, तो मदन वात्स्यायन को गढ़सिसई में खोजनेवाला मैं अकेला नहीं होता-

‘अंत तक स्थिर बलता वह
एक अकेला शुक्रतारा दीप’

अज्ञेय ने जब ‘तीसरा सप्तक’ (Teesra Saptak) का संपादन किया था, तब मदन वात्स्यायन को एक पत्र लिखा था. 25 जून 1956 को लिखे अपने पत्र में अज्ञेय ने संतोष व्यक्त किया था कि – ‘तीसरा सप्तक’ का संपादन व प्रकाशन ‘दूसरा सप्तक’ की अपेक्षा अच्छा हुआ है. अज्ञेय को उनकी लिखी हुई कविता ‘शिफ्ट फोरमैन’ बहुत पसंद थी.

अप्रकाशित नहीं थी

प्रतीक’ के सितंबर 1951 के अंक में अज्ञेय ने मदन वात्स्यायन के बारे में लिखा था- ‘बिहार के इस प्रतिभाशाली लेखक का हम स्वागत करते हैं. ‘शिफ्ट फोरमैन’ के रचयिता, जिन्होंने औद्योगिक रसायन शास्त्र की शिक्षा पायी है और जो कारखाने से संबद्ध हैं, उनकी कविताओं में यंत्र के संचालक मानव का अदम्य साहस बोल रहा है. प्रगतिवादी जो नहीं कर पाये, वह उन्होंने किया है, क्योंकि ‘शिफ्ट फोरमैन’ में किताबी मतदान या सिद्धांत नहीं, निजी अनुभव बोलता है. रश्मि रेखा ने ‘शुक्रतारा’ पुस्तक में भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित कराने के लिए जो कविताएं जुटायी थीं, वे सभी अप्रकाशित नहीं थीं.

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जो लिखा सब छपा

यह स्पष्ट है कि साठ के दशक में मदन वात्स्यायन ने भले ही बहुत नहीं लिखा, लेकिन जो भी लिखा, वह सब छपता रहा. इस संबंध में नीलाभ की उक्ति पर ध्यान देना चाहिए- ‘एक समय मदन वात्स्यायन की कविताएं बहुत शान से प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में छपती थीं. नये-नये लिखनेवालों में उनका बड़ा रोब और रुतबा था.’ मदन वात्स्यायन किशोर वय से लिखते थे. परंतु वह अपना लिखा हुआ बहुत बचा कर नहीं रख पाये.

‘तीसरा सप्तक’ का प्रकाशन

‘तीसरा सप्तक’ में कविता के साथ दिये गये उनके वक्तव्य की ओर ध्यान दें- ‘एक किशोर कवि था मदन, जो बहुत दिन हुए, मर गया. उसकी कापियों में से बहुत कुछ लेकर व्यापारिक दृष्टि से हेर-फेर कर पचा लेता हूं.’ तात्पर्य यह कि मदन वात्स्यायन ने किशोर वय में जो लिखा था, वही उनका मूल लेखन था. उनके मन में यह टीस अवश्य थी कि किशोर वय में उपजे कवित्व को वह आगे की उम्र तक विस्तृत नहीं कर सके. इसका कुछ भी निजी कारण हो सकता है. ‘तीसरा सप्तक’ का प्रकाशन भारतीय ज्ञानपीठ से 1959 में हुआ था, अज्ञेय ने कुंवर नारायण, कीर्ति चौधरी, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना (Sarveshwar Dayal Saxena) , मदन वात्स्यायन, प्रयाग नारायण त्रिपाठी, केदारनाथ सिंह (Kedarnath Singh) और विजय देवनारायण शाही को सम्मिलित किया था. मदन वात्स्यायन की ऋतु संहार, नखशिख, दो विहाग, शुक्रतारा जैसी कविताएं प्रकृति, पुरुष और स्त्री के सौंदर्य के लिए उद्दीपन जगाती हैं. उनकी कविता ‘नखशिख’ में सौंदर्य और शिष्टता की प्राकृतिक सुषमा का कितना मनोहर वर्णन हुआ है-


‘बेगहनों के तेरे गोरे अंग हैं
और बेबेलबूटों की तेरी श्वैत साड़ी
चार ओर उछले बादल हैं
और ग्लावा चमक रही है.’

तीसरी कड़ी : कुछ नहीं लिखा अंतिम चार दशकों में