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सवाल विरासत का… पुश्तैनी जनाधार अब भी है दमदार

राजद को जब तक 23 प्रतिशत के आसपास वोट मिलता रहेगा, भले ही तेजस्वी प्रसाद यादव सरकार नहीं बना पायेंगे, उनके विधायकों की संख्या बढ़ती-घटती रहेगी और वह ताकतवर विपक्ष की भूमिका में रहेंगे. लेकिन, सवाल यहां यह उठता है कि लंबे समय तक सत्ता से दूर रहने पर तेजस्वी प्रसाद यादव इस 23 प्रतिशत वोट पर कब तक एकाधिकार रख पायेंगे?

विशेष संवाददाता
27 दिसम्बर 2025

Patna : विधानसभा चुनाव (Assembly Elections) में राजद की दुर्गति की बातों को विस्तार दें, तो एक-दो चुनाव में हार जाने पर यह नहीं कहा जा सकता है कि तेजस्वी प्रसाद यादव की राजनीति का पतन हो रहा है. गौर कीजिये, इक्के-दुक्के अपवाद को छोड़, राजद के किसी भी प्रत्याशी को 50-60 हजार से कम वोट नहीं मिले हैं. यह सही है कि तेजस्वी प्रसाद यादव अपना कोई नया जनाधार पैदा नहीं कर पाये हैं. विरासत में उन्हें जो जनाधार मिला है, वही काफी है. उसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता है. इसे समझने के लिए विधानसभा के पिछले छह चुनावों में लालू प्रसाद की पार्टी राजद ने जो फसल काटी है, उसका अवलोकन व विश्लेषण जरूरी है. बिहार की राजनीति की गहन जानकारी रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार विभेष त्रिवेदी चुनावों के आंकड़ों के आधार पर इसे इस रूप में समझाते हैं कि जहां पहुंचने के लिए भाजपा को सम्राट चौधरी (Samrat Choudhary), विजय कुमार सिन्हा (Vijay Kumar Sinha), डा. दिलीप जायसवाल (Dr. Dleep Jaiswal), डा. संजय जायसवाल (Dr. Sanjay Jaiswal), नीतीश मिश्र (Nitish Mishra), मंगल पाण्डेय (Mangal Panday) को आगे रखते हुए नीतीश कुमार, चिराग पासवान, जीतनराम मांझी और उपेन्द्र कुशवाहा से हाथ मिलाना पड़ता है, वहां तेजस्वी प्रसाद यादव ‘माय’ रूपी पुश्तैनी जनाधार की बदौलत आसानी से पहुंच जाते हैं.

करिश्मा लालू प्रसाद का नहीं

राजद को फरवरी 2005 में 75 (25.07 प्रतिशत), नवम्बर 2005 में 54 (23.45 प्रतिशत), 2010 में 22 (18.84 प्रतिशत), 2015 में 80 (18.4 प्रतिशत), 2020 में 75 (23.11 प्रतिशत) और 2025 में 25 सीटें (23 प्रतिशत) मिली हैं. रोचक तथ्य है कि 2010 की अपेक्षा 2015 में राजद (RJD) को प्राप्त मतों का प्रतिशत 18.84 से घटकर 18.4 हो गया, परन्तु वोट में 0.44 प्रतिशत की कमी के बावजूद विधायकों की संख्या 22 से बढ़कर 80 हो गयी. हलांकि, यह तेजस्वी प्रसाद यादव (Tejaswi Prasad Yadav) या उनके पिता राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद (Lalu Prasad) का करिश्मा नहीं था, 2015 में नीतीश कुमार जैसे मजबूत कंधे का सहारा मिला तो वोट का प्रतिशत घटने के बाद भी 58 सीटें बढ़ गयीं. 2025 में वोट प्रतिशत में मात्र 0.11 की कमी आयी और विधायकों की संख्या 75 से घटकर 25 पर आ गयी.

खुद का कंधा कितना मजबूत?

भाजपा (BJP) और जदयू (JDU) के कंधे तो मजबूत हैं ही, एनडीए (NDA) ने चिराग पासवान, उपेन्द्र कुशवाहा, जीतनराम मांझी से हाथ मिलाने की समझदारी दिखायी. प्रचंड बहुमत से सत्ता बनी रह गयी. नीतीश कुमार (Nitish Kumar) ने 2020 में चिराग पासवान के चुनावी महत्व को नहीं समझा. परिणामस्वरूप जदयू के विधायकों की संख्या 71 से घटकर 43 पर अटक गयी. सवाल उठता है कि तेजस्वी प्रसाद यादव का खुद का कंधा कितना मजबूत है और किन-किन क्षेत्रीय ताकतों, जातीय समूहों के लिए भरोसेमंद है? जनता ने अनुभव और एकजुटता पर विश्वास किया. जहां एक ओर एनडीए ने नीतीश कुमार, ललन सिंह (Lalan Singh), नंदकिशोर यादव (Nandkishore Yadav), शाहनवाज हुसैन (Shahnawaz Hussain), सम्राट चौधरी, विजय कुमार सिन्हा, विजय कुमार चौधरी (Vijay Kumar Choudhary), संजय झा (Sanjay Jha), उपेन्द्र कुशवाहा (Upendra Kushwaha), जीतनराम मांझी (Jeetanram Manjhi) , चिराग पासवान (Chirag Paswan) समेत दर्जनों कद्दावर नेताओं को चुनाव अभियान में उतारा था, वहीं दूसरी ओर राजद, कांग्रेस और भाकपा-माले ने राहुल गांधी, तेजस्वी प्रसाद यादव और मुकेश सहनी के सिवा किसी प्रभावी चेहरे को अभियान से नहीं जोड़ा.

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मुसलमानों का साथ कब तक?

राजद को जब तक 23 प्रतिशत के आसपास वोट मिलता रहेगा, भले ही तेजस्वी प्रसाद यादव सरकार नहीं बना पायेंगे, उनके विधायकों की संख्या बढ़ती-घटती रहेगी और वह ताकतवर विपक्ष की भूमिका में रहेंगे. लेकिन, सवाल यहां यह उठता है कि लंबे समय तक सत्ता से दूर रहने पर तेजस्वी प्रसाद यादव इस 23 प्रतिशत वोट पर कब तक एकाधिकार रख पायेंगे? आरक्षण की 50 प्रतिशत की सीमा को तोड़ने की घोषणा कर रहे कांग्रेस (Congress) नेता राहुल गांधी (Rahul Gandhi) आखिर कब तक बिहार में तेजस्वी प्रसाद यादव के सहारे चलेंगे? क्या मुसलमान धीरे-धीरे राहुल गांधी में अपना भविष्य नहीं ढूंढ़ेंगे? मुसलमान कई वजहों से राहुल गांधी पर भरोसा करते हैं. वह राष्ट्रीय स्तर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी (Narendra Modi) का विरोध कर रहे हैं. राहुल गांधी हिंदू नहीं, पारसी हैं. सोनिया गांधी (Soniya Gandhi) रोमन कैथोलिक ईसाई हैं. इंदिरा गांधी (Indra Gandhi) हिन्दुत्व की लाइन पर चलती थीं. राजीव गांधी (Rajeev Gandhi) को आरएसएस (RSS) के नेताओं से मिलवाया जाता था, जबकि राहुल गांधी ने कट्टर हिन्दू विरोधी की छवि अर्जित कर रखी है.

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झुक जायेंगे तब कांग्रेस की ओर

प्रियंका गांधी (Priyanka Gandhi) उतनी हिन्दू विरोधी नजर नहीं आती हैं. देश का ईसाई समाज सोनिया-राहुल का समर्थन कर रहा है. जिस दिन तेजस्वी-राहुल अलग-अलग लड़ेंगे, मुसलमान कांग्रेस की ओर झुक जायेंगे. इस रूप में राजद के आधार मतों में बिखराव हुआ, तब तेजस्वी प्रसाद यादव औंधे मुंह गिर जा सकते हैं. तेजस्वी प्रसाद यादव की पार्टी राजद ने 2015 और 2020 के विधानसभा चुनावों में क्रमशः 80 और 75 विधायकों के आंकड़े छुए, तो इसमें नीतीश कुमार और चिराग पासवान (परोक्ष रूप से भाजपा) की ही मेहरबानी थी. नीतीश कुमार की मेहरबानी इस रूप में कि 2015 में महागठबंधन (Mahagathbandhan) का महत्वपूर्ण घटक बन उन्होंने राजद और तेजस्वी प्रसाद यादव की राजनीति को पुनर्जीवित कर दिया. चिराग पासवान ने 2020 में जदयू के खिलाफ हर सीट पर लोजपा का प्रत्याशी उतार राजद की जीत आसान बना दी. विश्लेषकों की समझ में इन दोनों जीत से तेजस्वी प्रसाद यादव को भ्रम हो गया कि वह बड़े जनाधार वाले नेता हो गये हैं. सलाहकार की भूमिका वाले राजद सांसद संजय यादव (Sanjay Yadav) ने खुद को बड़ा रणनीतिकार बताते हुए बांह पुजवाना शुरू कर दिया. 2025 में चिराग पासवान एनडीए में लौट गये, तेजस्वी प्रसाद यादव के जनाधार की पोल खुल गयी.

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