भाजपा और नितिन नवीन : तय करता है रुख कायस्थ समाज

बिहार की राजनीतिक- सामाजिक, साहित्यिक- सांस्कृतिक विरासत को समृद्ध करने में कायस्थ समाज का महत्वपूर्ण योगदान रहा है. शैक्षणिक रूप से ये काफी समृद्ध होते थे. लालू-राबड़ी शासनकाल में यह समाज तेजी से विस्थापित होता चला गया. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर इल्जाम है कि उन्होंने भी बिहार में कायस्थ समाज के सियासी बाग को बड़ी बेरुखी से उजाड़ डाला.

विभेष त्रिवेदी
31 दिसम्बर 2025
Patna : बात पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की. वहां कायस्थ समाज की आबादी तकरीबन 03 प्रतिशत है, लेकिन राजनीतिक ताकत (Political Power) कहीं ज्यादा है. करीब 25 से 30 लाख की आबादी वाले कायस्थ (Kayastha) शहरों से लेकर गांवों तक सभी जातियों में भी चुनावी हवा का रुख तय करते हैं. ये 50 से अधिक सीटों पर तो निर्णायक भूमिका निभाते ही हैं. 2021 के चुनाव में ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) की पार्टी तृणमूल कांग्रेस (Trinamool Congress) ने 17 कायस्थ उम्मीदवार उतारे थे. इतिहास पर नजर दौड़ायें, तो आजादी के बाद पश्चिम बंगाल की सत्ता 37 वर्षों तक कायस्थ मुख्यमंत्रियों के हाथों में रही. वामपंथी (Leftist) शासनकाल में कायस्त समाज के ज्योति बसु (Jyoti Basu) 23 वर्षों तक मुख्यमंत्री (Chief Minister) रहे. उनसे पहले इसी समाज के विधानचंद्र राय (Vidhanchandra Rai) 14 वर्षों तक मुख्यमंत्री रहे. पश्चिम बंगाल (West Bengal) की सत्ता प्रायः भद्रलोक के हाथों में रही है. भद्रलोक ‘जेंट्री’ या ‘इंटेलिजेंटसिया’ कहलाते हैं. ब्राह्मण, कायस्थ और वैद्य समाज का शिक्षा (Education), साहित्य (Literature) और प्रशासनिक (Administrative ) महकमे में दबदबा रहा है. सुभाषचन्द्र बोस (Subhash Chandra Bose) और स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekananda) जैसी महान विभूतियां भी कायस्थ थे. पश्चिम बंगाल के शहरी क्षेत्रों में भद्रलोक की 15 से 20 प्रतिशत की आबादी निर्णायक होती है. राहत की बात यह है कि बिहार-उत्तर प्रदेश की तरह पश्चिम बंगाल का पिछड़ा समाज भद्रलोक से विद्वेष नहीं पालता है.
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उत्तर प्रदेश में दिखेगा असर
नितिन नवीन (Nitin Naveen) उत्तर प्रदेश में भी पार्टी को ताकत देंगे. जातीय समीकरण की बुनावट में मजबूत धागे का काम करेंगे. पश्चिम बंगाल के बाद 2027 में उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) में विधानसभा का चुनाव (Assembly Elections) होना है. पिछली बार भाजपा (BJP) ने राजपूत के अलावा ब्राह्मण, कुशवाहा, मल्लाह जातियों पर विशेष रूप से फोकस किया था. अब कायस्थों पर भी नजर रहेगी. वहां ये भले ही पिछड़ी जाति में आते हैं, परन्तु सियासी, साहित्यिक और प्रशासनिक रसूख की बदौलत हमेशा आगे रहे हैं. अखिल भारतीय कायस्थ महासभा (All India Kayastha Mahasabha) की मानें तो उत्तर प्रदेश में इनकी आबादी डेढ़ से दो करोड़ है. सूबे के 37 जिलों के 67 विधानसभा क्षेत्रों में इनकी बड़ी आबादी है. कानपुर (Kanpur), उन्राव (Unrao), लखनऊ (Lucknow), आगरा (Agra), बरेली (Bareilly) और अलीगढ़ (Aligarh) समेत विभिन्न जिलों की 25 सीटों पर तो ये निर्णायक हैं ही. श्रीवास्तव, सिन्हा, माथुर और सक्सेना उपनाम वाले कायस्थ खुद को चित्रगुप्त के वंशज मानते हैं.
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उजड़े बाग में बसंत
बिहार में भी कायस्थ समाज के उजड़ चुके सियासी बाग में फिर से बसंत आने की उम्मीद जगी है. इस समाज ने देशरत्न डा. राजेन्द्र प्रसाद (Dr. Rajendra Prasad), लोकनायक जयप्रकाश नारायण (Loknayak Jaiprakash Narayan), पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा (Yashwant Sinha), फिल्म अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा (Shatrughan Sinha) जैसे सितारे दिये. बिहार (Bihar) की सियासत में कभी इनकी तूती बोलती थी. कृष्णवल्लभ सहाय और महामाया प्रसाद सिन्हा बिहार के मुख्यमंत्री बने. बिहार की राजनीतिक- सामाजिक, साहित्यिक- सांस्कृतिक विरासत को समृद्ध करने में कायस्थ समाज का महत्वपूर्ण योगदान रहा है. शैक्षणिक रूप से ये काफी समृद्ध होते थे. लालू-राबड़ी शासनकाल में यह समाज तेजी से विस्थापित होता चला गया. प्रधानमंत्री (Prime Minister) नरेन्द्र मोदी (Narendra Modi) पर इल्जाम है कि उन्होंने भी बिहार में कायस्थ समाज के सियासी बाग को बड़ी बेरुखी से उजाड़ डाला.
हमेशा भाजपा के साथ
पहले पूर्व केन्द्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा और उनके पुत्र जयंत सिन्हा हाशिये पर धकेल दिये गये. फिर पूर्व केन्द्रीय मंत्री शत्रुघ्न सिन्हा को ठिकाने लगा दिया गया. अंत में एक दिन ऐसा भी आया, जब अचानक केन्द्रीय मंत्रिमंडल से रविशंकर प्रसाद (Ravishankar Prasad) की छुट्टी कर दी गयी. हालिया बिहार विधानसभा चुनाव में जब कुम्हरार (kumharaar) सीट के तत्कालीन विधायक अरुण कुमार सिन्हा की जगह किसी कायस्थ को उम्मीदवार नहीं बनाया गया, तो पटना में कायस्थ समाज के दिल का मवाद बहने लगा. हालांकि, यह समाज हमेशा भाजपा के साथ रहा है, परन्तु जानता है कि पटना साहिब (Patna Sahib) के सांसद रविशंकर प्रसाद की मोदी मंत्रिमंडल में वापसी की कोई उम्मीद नहीं है. अब भाजपाई कायस्थ समाज के जख्म पर मरहम लगाते हुए कहेंगे, पार्टी ने सर्वाेच्च कमांडर की कुर्सी पर कायस्थ नेता को बैठा दिया है. बिहार से आज तक किसी को भाजपा में इतनी बड़ी कुर्सी नहीं सौंपी गयी थी.
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