Bihar Politics : चिराग का चमत्कार! घिग्घी बंध गयी… आलोचकों की

चुनाव के नतीजे सामने आये, तो सभी चौक गये. 29 सीटों की हिस्सेदारी पर सवाल खड़ा करने वाली जुबानों की भाषा बदल गयी- एनडीए ने कोई गलती नहीं की. नतीजों से आलोचकों की बोलती तो बंद हुई ही, यह भी स्थापित हुआ कि चिराग पासवान ने पिता रामविलास पासवान की राजनीतिक विरासत को न सिर्फ बचाकर रखा है, बल्कि सम्मानजनक तरीके से उसे विस्तृत भी किया है.

राजकिशोर सिंह
01 जनवरी 2026
Patna : बिहार विधानसभा के हालिया चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) में लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के हिस्से में 29 सीटें गयीं तो राजनीति (Poltics) हैरान रह गयी. राजनीति के विश्लेषेकों को छोड़िये, सियासत की हल्की-फुल्की समझ रखने वाली जुबान से भी यही निकला कि एनडीए बहुमत से दूर रह गया तो उसकी बड़ी वजह चिराग पासवान (Chirag Paswan) के हिस्से की यही 29 सीटें होंगी. मतलब चुनाव (Election) की दृष्टि से ज्यादा सक्षम-समर्थ नहीं दिख रही लोजपा (रामविलास) (LJP-R) इन सीटों में से अधिसंख्य पर हार जायेगी. दुष्परिणाम एनडीए के बहुमत हासिल नहीं कर पाने के रूप में सामने आयेगा, सत्ता हाथ से फिसल जायेगी. जीतनराम मांझी (Jitan Ram Manjhi) की पार्टी हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM), उपेन्द्र कुशवाहा (Upendra Kushwaha) की पार्टी राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के हिस्से में गयीं छह-छह सीटों को लेकर ऐसी कोई आशंका नहीं जतायी गयी.
बोलती बंद हो गयी
चुनाव के नतीजे (Election Results) सामने आये, तो सभी चौक गये. 29 सीटों की हिस्सेदारी पर सवाल खड़ा करने वाली जुबानों की भाषा बदल गयी- एनडीए ने कोई गलती नहीं की. नतीजों से आलोचकों की बोलती तो बंद हुई ही, यह भी स्थापित हुआ कि चिराग पासवान ने पिता रामविलास पासवान की राजनीतिक विरासत (Political Legacy) को न सिर्फ बचाकर रखा है, बल्कि सम्मानजनक तरीके से उसे विस्तृत भी किया है. चुनाव परिणाम का सर्वाधिक दिलचस्प हिस्सा यह रहा कि सीटों के मामले में 18 नवम्बर 2025 को मुख्यमंत्री (Chief Minister) पद की शपथ लेने का ‘डपोरशंखी ढिढ़ोरा’ पीटनेवाले राजद के अघोषित सुप्रीमो तेजस्वी प्रसाद यादव (Tejaswi Prasad Yadav) से लोजपा (रामविलास) मात्र 06 सीटें ही नीचे रही. राजद को 25 सीटें मिली हैं तो लोजपा (रामविलास) को 19 सीटें. क्रमवार भाजपा (BJP), जदयू (JDU) और राजद (RJD) के बाद इसी का स्थान है.
तब दिखा था यह दम
नीतीश कुमार (Nitish Kumar) की राजनीति को सीमा में रखने की वह भाजपा की चाल रही हो या फिर चिराग पासवान का ही उनसे (नीतीश कुमार) हद से ज्यादा दिल जल गया हो, 2020 में लोजपा एनडीए से अलग अकेले चुनाव में उतर गयी थी. जीत-हार अपनी जगह है, तब किसी को कितना कमजोर कर सकती है, उसमें यह दम दिखा था. विश्लेषकों के मुताबिक चिराग पासवान को खुन्नस नीतीश कुमार की राजनीतिक कार्यशैली से थी, तभी तो जिन 134 सीटों पर उन्होंने उम्मीदवार उतारे थे, उनमें दो-चार को छोड़ शेष एनडीए में जदयू के हिस्से की थी. इसका असर जदयू की चुनावी सेहत पर पड़ा, खूब पड़ा. 115 सीटों पर चुनाव लड़नेवाली पार्टी महज 43 सीटों में सिमट गयी. अपनी इस दुर्गति के लिए जदयू ने खुले तौर पर चिराग पासवान को जिम्मेवार ठहराया. चुनाव के दरमियान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के खिलाफ चिराग पासवान द्वारा दिये गये बयानों को इसका आधार बताया.
नेपथ्य में चले गये
इसे लोजपा का दुर्भाग्य ही कहेंगे कि 2020 में ही विधानसभा चुनाव के कुछ समय पहले लोजपा के संस्थापक रामविलास पासवान का निधन हो गया. कहने के लिए रामविलास पासवान के ‘भरत समान भाई’ पशुपति कुमार पारस (Pashupati Kumar Paras) ‘अभिभावक’ की भूमिका में थे. परन्तु, पार्टी संगठन और चुनाव की संपूर्ण व्यवस्था पर चिराग पासवान हावी हो गये. वैसे, पिता रामविलास पासवान (Ramvilash Paswan) ने जीवित रहते ही लोजपा (LJP) की तमाम जवाबदेही चिराग पासवान को सौंप दी थी. यानी सर्वेसर्वा बना दिया था. पशुपति कुमार पारस नेपथ्य में चले गये थे. 2020 में एनडीए से अलग चुनाव लड़ने का निर्णय चिराग पासवान का था, जो पार्टी के लिए घातक साबित हुआ. इस रूप में कि 134 में से सिर्फ एक उम्मीदवार की जीत हुई. मटिहानी (Matihani) से राजकुमार सिंह (Rajkumar Singh) की. वह भी कुछ माह बाद जदयू में शामिल हो गये. लोजपा के हाथ में शून्य रह गया. इस बार राजकुमार सिंह जदयू के उम्मीदवार थे. मुंह की खानी पड़ गयी.
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दावा बनाये रखना विरासत पर
2020 में रामविलास पासवान के निधन और चुनाव में हार के बाद 2021 में लोजपा में विभाजन के रूप में चिराग पासवान को एक और बड़ा झटका लगा. 2019 में एनडीए में रहते लोजपा के 06 सांसद निर्वाचित हुए थे. चाचा पशुपति कुमार पारस ने पांच सांसदों को साथ मिला तात्कालिक तौर पर पार्टी पर कब्जा कर लिया. चिराग पासवान अलग-थलग पड़ गये. लोजपा (रामविलास) और राष्ट्रीय लोजपा (RLJP) के नाम से पार्टी दो हिस्सों में बंट गयी. गौर करने वाली बात यह रही कि इन तमाम घटनाक्रमों के बीच चिराग पासवान प्रधानमंत्री (Prime Minister) नरेन्द्र मोदी (Narendra Modi) और भाजपा के करीब बने रहे. इतना ही नहीं, पिता रामविलास पासवान की राजनीतिक विरासत पर दावा भी बनाये रखा. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मिले खट्टे-मीठे अनुभवों को सहेजते-समेटते बिहार (Bihar) में लगातार सक्रिय रह वह पार्टी के जनाधार को मजबूत करने में जुटे रहे.
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टिक नहीं पाये चाचा
उधर, उनके बड़े प्रतिद्वंदी के रूप में उभरे रालोजपा सुप्रीमो चाचा पशुपति कुमार पारस कहीं टिक नहीं पाये, जबकि वह भी नरेन्द्र मोदी को ‘भगवान’ मानते- बताते रहे. केन्द्र में मंत्री का सुख भोगते रहे. इस दौरान राज्य की राजनीति में भारी उलटफेर हुआ. 2022 में नीतीश कुमार एनडीए से नाता तोड़ महागठबंधन का हिस्सा बन गये. हालांकि, कुछ समय बाद एनडीए में लौट भी आये. पलटा-पलटी के इस दौर में चिराग पासवान को एनडीए में अहमियत मिली. 2024 के संसदीय चुनाव के वक्त हालात पूरी तरह बदल गये. चिराग पासवान की पार्टी लोजपा (रामविलास) घोषित तौर पर एनडीए का हिस्सा बन गयी. पशुपति कुमार पारस तिरस्कृत कर दिये गये. लाख गिड़गिड़ाते रहे, भाजपा ने कोई महत्व नहीं दिया. जदयू ने भी मुंह फेर लिया.
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