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पूर्वी चम्पारण : उभर सकता है नया समीकरण राजनीति में

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कफील एकबाल
09 जनवरी, 2022

MOTIHARI : बिहार में ग्राम पंचायतों के चुनाव दलीय आधार पर नहीं होते. लेकिन, अघोषित तौर पर तमाम राजनीतिक कर्मकांड दलीय आधार पर चुनाव जैसे ही होते हैं. उसमें अंतर इतना रहता है कि किसी के साथ कोई दलीय प्रतिबद्धता नहीं होती. जातीय समीकरण भी ज्यादा महत्व नहीं रखते. सारा खेल पैसों का होता है. विशेष कर जिला परिषद अध्यक्षों और प्रखंड प्रमुखों के चुनाव में. इक्के-दुक्के अपनी जनप्रियता के बल पर निर्वाचित हो जाते हों तो वह अलग बात होगी.

सबका साथ मिला
पूर्वी चंपारण (Purvi Champaran) जिला परिषद के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के चुनाव में करीब-करीब वैसा ही हुआ. अध्यक्ष पद के चुनाव में कांग्रेस नेता शशिभूषण राय उर्फ गप्पू राय (Shashibhushan Ray urf Gappu Ray) की पत्नी ममता राय (Mamta Ray) को अघोषित तौर पर राजद, कांग्रेस एवं वामदलों का सहयोग-समर्थन मिला. इस आधार पर उन्हें महागठबंधन समर्थित प्रत्याशी माना गया. ममता राय के मुकाबले निवर्तमान जिला परिषद अध्यक्ष प्रियंका जायसवाल (Priyanka Jaiswal) मैदान में उतरतीं. वह ढाका के भाजपा विधायक पवन जायसवाल (Pawan Jaiswal) की पत्नी हैं. इस कारण उनकी चर्चा राजग समर्थित उम्मीदवार के रूप में होने लगी, जबकि हकीकत में ऐसी कोई बात दिख नहीं रही थी.

भाजपाइयों ने भी मोड़ लिया मुंह
पूर्वी चंपारण जिला परिषद के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के चुनाव में गहरी रुचि दिखा परिणाम को मनोनुकूल रुख देने वाले मोतिहारी के भाजपा (BJP) सांसद (MP) पूर्व मंत्री राधामोहन सिंह (Radhamohan Singh) ने ही कथित रूप से पवन जायसवाल और प्रियंका जायसवाल से मुंह मोड़ लिया तो फिर मैदान छोड़कर उनका भागना लाजिमी था. जिले के भाजपा और जदयू के लगभग सभी प्रभावशाली नेताओं ने भी राधामोहन सिंह का अनुसरण किया. परिणामस्वरूप अध्यक्ष पद के चुनाव में हार सुनिश्चित समझ प्रियंका जायसवाल ने मैदान में उतरने का इरादा त्याग दिया. उनका साथ नीतू गुप्ता (Nitu Gupta) को मिला जो 57 सदस्यीय पूर्वी चंपारण जिला परिषद के मात्र 10 सदस्यों का ही समर्थन हासिल कर पायी. ममता राय को 45 म मिले. दो मत रद्द हो गये.

पवन जायसवाल.                                    ममता राय की जीत पर जश्न.

मैदान छोड़ दिया प्रियंका जायसवाल ने
कहा जाता है कि इस बार के चुनाव में राधामोहन सिंह (Radhamohan Singh) ने ‘निरपेक्षता’ का भाव अपना रखा था. लेकिन, ऐसी बात नहीं थी. उनका खुला साथ शशिभूषण राय उर्फ गप्पू राय और ममता राय को मिला. भाजपा एवं जदयू (JDU) के अन्य नेताओं का भी. अध्यक्ष पद के चुनाव में जीत की संभावना नहीं देख प्रियंका जायसवाल उपाध्यक्ष के चुनाव में कूद गयीं. वहां भी उन्हें मुंह की ही खनी पड़ गयी. पांच मतों के अंतर से गीता देवी ने उनके मंसूबों पर पानी फेर दिया. गीता देवी को 31 जिला पार्षदों का समर्थन मिला तो प्रियंका जायसवाल को सिर्फ 26 सदस्यों का.

राधामोहन सिंह का साथ
2016 में अध्यक्ष पद के चुनाव में प्रियंका जायसवाल और ममता राय के बीच मुकाबला हुआ था. महज तीन मतों के अंतर से ममता राय पिछड़ गयी थीं. ममता राय की इस बार की मुहिम की कमान शशिभूषण सिंह उर्फ गप्पू राय के अलावा पूर्व विधायक फैसल रहमान, पूर्व विधायक महेश्वर सिंह, पूर्वी चंपारण जिला राजद के अध्यक्ष सुरेश यादव, राजद के प्रदेश महासचिव इनामुल हक, पूर्वी चंपारण जिला कांग्रेस के अध्यक्ष शैलेन्द्र शुक्ला, आदि ने संभाल रखी थी. लेकिन, जीत के लिए यही काफी नहीं था. राधामोहन सिंह, पूर्व विधायक राजन तिवारी एवं भाजपा जदयू के स्थानीय प्रभावशाली नेताओं का साथ नहीं मिला होता तो शायद परिणाम कुछ और सामने आता.

पवन जायसवाल ने दी शुभकामनाएं
इस चुनाव में हुई राजनीति के जो संकेत मिले हैं उसके मुताबिक पूर्वी चंपारण जिले में अब नये समीकरण बन सकते हैं. अपनी पत्नी प्रियंका जायसवाल की हार को स्वीकार करते हुए भाजपा विधायक पवन जायसवाल ने ममता राय को जीत की शुभकामनाएं दी. आरोप मढ़ा कि राजग की हार भाजपा और जदयू के नेताओं का साथ नहीं मिलने की वजह से हुई. समय आने पर सभी को उचित जवाब देने की भी बात उन्होंने कही. पूर्वी चंपारण जिले में 12 विधानसभा क्षेत्र हैं. उनमें 9 पर राजग काबिज है. ढाका के पवन जायसवाल को छोड़ सबकी निष्ठा सांसद राधामोहन सिंह से जुड़ी है.


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बात पिछड़ावाद की भी
विश्लेषकों के मुताबिक इन विधायकों का अपना जीत दिलाऊ जनाधार नहीं है. उम्मीदवारी से लेकर जीत हासिल करने तक के लिए वे राधामोहन सिंह के मुखापेक्षी रहते हैं. पवन जायसवाल वैश्य बिरादरी से हैं. यानी पिछड़ा वर्ग से. अकड़ उनमें जरूरत से कुछ अधिक है. इसके बावजूद उन्हें मुस्लिम और पिछड़ा-अतिपिछड़ा समाज का समर्थन प्राप्त है. ढाका विधानसभा क्षेत्र में उनकी जीत का यही मुख्य आधार माना जा रहा है. ढाका से विधायक और पत्नी प्रियंका जायसवाल के जिला परिषद अध्यक्ष रहने से भाजपा में वह पिछड़ा वर्ग से एक नयी ताकत के रूप में उभर रहे थे.

राजन तिवारी की भूमिका
कुछ लोगों का कहना है कि सांसद राधामोहन सिंह से बनाव का यह भी एक बड़ा कारण है. गन्ना विकास मंत्री प्रमोद कुमार (Pramod Kumar) से भी. प्रमोद कुमार मोतिहारी से भाजपा के विधायक हैं. 2016 में अध्यक्ष पद के चुनाव में प्रियंका जायसवाल को पूर्व विधायक राजन तिवारी (Rajan Tiwari) का समर्थन मिला था. लोग कहते हैं कि उस समर्थन के लिए पवन जायसवाल ने राजन तिवारी का कोई एहसान नहीं माना. उनसे दूरी बनाकर रखी. यह उन्हें नागवार गुजरा. इस बार भाजपा में रहते हुए भी उन्होंने ममता राय का समर्थन कर हिसाब बराबर कर दिया. राजद के पूर्व विधायक फैसल रहमान (Faisal Rahman) की अतिसक्रियता का कारण यह रहा कि पवन जायसवाल उनके बड़े प्रतिद्वंद्वी हैं. इनका मुकाबला ढाका विधानसभा क्षेत्र में होता है.

मुस्लिम भी हुए ताकतवर
विश्लेषकों की समझ है कि ममता राय की मुहिम को इससे भी मजबूती मिली कि इस बार मुस्लिम समुदाय के 15 जिला पार्षद निर्वाचित हुए हैं. ऐसा कहा जाता है कि पूर्व विधायक फैसल रहमान ने इन तमाम मुस्लिम जिला पार्षदों को ममता राय के पक्ष में गोलबंद कर दिया. हालांकि, इतनी बड़ी संख्या में जीतकर आने के बाद भी इस समाज की हैसियत ‘पालकी’ ढोने वाली ही रह गयी. राजनीतिक हलकों में यह चर्चा होने लगी है कि शशिभूषण राय उर्फ गप्पू राय एवं ममता राय को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष भाजपा का साथ मिलने के पीछे कोई और रहस्य तो नहीं छिपा है? पूर्व में मोतिहारी संसदीय क्षेत्र में अपनी लड़खड़ायी स्थिति को दृष्टिगत रख राधामोहन सिंह ने रमा देवी को भाजपा में शामिल कराया था. शशिभूषण सिंह उर्फ गप्पू राय के साथ भी वैसा ही कुछ तो नहीं होगा?

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