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लालू प्रसाद की कोशिशों के बाद भी पूरे नहीं हुए नीतीश कुमार के अरमान!

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प्रियरंजन भारती
06 सितम्बर 2023

Patna : ‘मेरी कोई इच्छा नहीं है…’ का रिकार्ड बजाते हुए नीतीश कुमार उस दिन मुम्बई गये. ‘ना- ना’ के साथ विपक्षी दलों के गठबंधन का संयोजक बनने की बड़ी चाहत भी दिल में दबा ले गये. विपक्षी नेताओं की बैठक से दो दिन पहले पहुंच लालू प्रसाद ने उनकी और अपनी कामना सिद्धि के लिए पूरजोर कोशिशें की, जमीन बनायी. नीतीश कुमार के नाम पर सोनिया गांधी‌ (Sonia Gandhi) से हामी भरवा ली. सोनिया गांधी ने हां कर दी, तो फिर व्यवधान कहां ? लेकिन, यह उनकी खुशफहमी थी. दरअसल लालू प्रसाद के ध्यान में नहीं रहा होगा या वह इतनी गहराई तक समझ नहीं पाये होंगे कि इस गठबंधन में सिर्फ कांग्रेस (Congress), राजद (RJD) और जदयू ही नहीं हैं. इन तीनों के अलावा 24 और दल हैं जिनमें जनाधार के मामले में कुछ राजद और जदयू (JDU) से कहीं ज्यादा मजबूत हैं. वैसे दल ‘थोपे हुए संयोजक’ को कैसे स्वीकार करेंगे?

सब‌ गुर गोबर हो गया
इस जमीनी सच को नजरंदाज कर लालू प्रसाद (Lalu Prasad) ने बैठक के समापन से पहले नीतीश कुमार को संयोजक के रूप में ‘स्थापित’ कराने की तैयारी कर ली थी‌. यहां यह जानने की जरूरत है कि लालू प्रसाद का नीतीश कुमार को विपक्षी गठबंधन के संयोजक की हैसियत दिलाने में उतावलापन इसलिए है कि वह (नीतीश कुमार)‌ राष्ट्रीय राजनीति में रमेंगे, तो बिहार (Bihar) की सत्ता खुद- ब – खुद उनके पुत्र तेजस्वी प्रसाद यादव (Tejashwi Prasad Yadav) की मुट्ठी में आ जायेगी. पर, अंतिम क्षण में सब गुर गोबर हो गया. भाजपा (BJP) से पूर्व की घनिष्ठता और पलटीमार प्रवृत्ति जनित राजनीतिक अविश्वसनीयता के मद्देनजर नीतीश कुमार को संयोजक (Coordinator) के रूप में अधिकतर नेता मन से मानने को तैयार नहीं हुए. एक – दो ने इसका मुखर विरोध किया.


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तर्क यह रखा गया
परिणामस्वरूप नीतीश कुमार (Nitish Kumar) की संभावनाओं को करीब – करीब समेटते हुए मामला आगे के लिए टल गया. सूत्रों की सूचना पर एतबार करें, तो नीतीश कुमार के नाम पर खुली और कड़ी आपत्ति तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सुप्रीमो और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) ने जतायी. उनका स्पष्ट कहना रहा कि नरेन्द्र मोदी (Narendra Modi) से लड़ने के लिए गठबंधन ऐसे नेता को अग्रिम मोर्चा पर रखे , जो शुद्ध मन से भाजपा का चिर विरोधी रहा हो. इस कसौटी पर नीतीश कुमार बिल्कुल खरा नहीं उतरते हैं. आधार यह कि अब तक के अपने राजनीतिक जीवन में सबसे अधिक समय तक वह भाजपा के ही साथ रहे हैं.

मामला अविश्वसनीयता का भी
नीतीश कुमार की लंबी सत्ता – यात्रा पर गौर करें, तो भाजपा के ही कंधे पर बैठ वह बिहार की सत्ता में आये और दो -ढाई वर्षों को छोड़ उसी के साथ मिलकर सरकार चलाते रहे हैं. अविश्वसनीयता (Incredulity) के मामले में उन्हें राकांपा (NCP) सुप्रीमो शरद पवार (Sharad Pawar) से कहीं ज्यादा संदेहास्पद बताया गया. ऐसा कहा जाता है कि तमिलनाडु (Tamil Nadu) के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन (MK Stalin) की भी ऐसी ही कुछ समझ है. इन बातों में यदि सच्चाई है, तो विपक्षी नेताओं के इस गठबंधन से नीतीश कुमार का जुड़ाव आगे कितने दिनों तक बन रह पायेगा, इसे आसानी से समझा जा सकता है. मुम्बई (Mumbai) से निराश लौटे नीतीश कुमार की भाव- भंगिमा और ‘एक देश एक चुनाव’ के समर्थन में आये उनके बयान से भी बहुत कुछ संकेत मिल जा रहे है.

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