तापमान लाइव | Tapmanlive

न्यूज़ पोर्टल | Hindi News Portal

नक्सलवाद : टूटती सांसें… सरकार से संवाद, खड़े हो जाते हैं कई सवाल

विष्णुकांत मिश्र
03 दिसंबर 2025

New Delhi : केन्द्रीय गृह मंत्रालय (Union Home Ministry) ने माओवादियों के ‘संवाद प्रस्ताव’ (Maoists’ ‘dialogue proposal’) को ठुकरा दिया. माडवी हिड़मा की मौत के बाद आत्मसमर्पण के लिए मोहलत (Time to Surrender) की मनुहार भरे नये प्रस्ताव को भी खारिज कर दिया, तो इसके बहुत तार्किक वजह हैं. सरकार और माओवादियों के बीच बातचीत (Talks Between the Government and the Maoists) की यह कोई पहली पेशकश नहीं है. ऐसी पेशकश 2002 से ही हो रही है. नक्सलवाद (Racism) की गहरी समझ रखने वालों के मुताबिक संघर्ष विराम की पहल (Ceasefire Initiative) इस वजह से कभी कारगर नहीं हो पायी कि माओवादियों और सरकार के बीच एक-दूसरे के प्रति भरोसा रहता ही नहीं है. प्रायः हर बार यही देखा गया है कि बातचीत से पहले माओवादी ऐसी शर्तें रख देते हैं जिनकी पूर्ति लोकतांत्रिक व्यवस्था (Democratic System) में संभव ही नहीं है. वार्ता के दौरान हिंसा (Violence During Negotiations) जारी रहना भी विफलता का बड़ा कारण रहा है. ऐसा एक-दो बार नहीं, कई बार हुआ है.

इन वजहों से नहीं हो पाती शांति वार्ता

माओवादी चाहते हैं कि ‘संघर्ष विराम’ पर वार्ता में आत्मसमर्पण और हिंसा (Surrender and Violence) को छोड़कर मुख्य रूप से भूमि सुधार (Land Reform), आदिवासी अधिकार (Tribal Rights), विस्थापन (Displacement), खनन परियोजनाओं (Mining Projects), लोकतांत्रिक स्वतंत्रता (Democratic Freedom) जैसे मुद्दों पर चर्चा हो. लेकिन, सरकार शांति वार्ता (Peace Talks) को कानून-व्यवस्था और सुरक्षा (Law & Order and Security) पर ही केन्द्रित रखना चाहती है. इन्हीं वजहों से न कभी शांति वार्ता हो पायी है और न आगे कभी होने की कोई गुंजाइश दिखती है. यहां बड़ा सवाल यह भी है कि किसी एक संगठन के साथ ‘शांति पर सहमति’ बन भी जाती है, तो क्या देश के स्तर पर नक्सली हिंसा पर पूर्ण विराम लग जायेगा? हकीकत यह है कि भारत में भाकपा (माओवादी) सबसे बड़ा नक्सली संगठन है. लेकिन, उसके अलावा माओवादियों के छोटे-बड़े कम से कम 18 और संगठन हैं, जो अलग-अलग क्षेत्रों में सक्रिय हैं. शांति वार्ता भाकपा (माओवादी) के साथ होती है, वार्ता में कोई समझौता हो जाता है, तो क्या अन्य नक्सली संगठनों की भी सहमति उस पर बन पायेगी? भाकपा (माओवादी) के तमाम नक्सली हथियार डाल देंगे तो क्या दूसरे संगठनों के नक्सली उसका अनुसरण करेंगे?

यह है परिपाटी

माओवादी संगठनों (Maoist organizations) में लोकतांत्रिक राजनीति का रास्ता अपना मुख्य धारा में लौटने वालों को ‘संशोधनवादी’ बता हिंसा जारी रखने की परिपाटी बहुत पुरानी है. तब भी विश्लेषकों का मानना है कि हथियार डालने वाले नक्सलियों (Naxalites Surrendering their Weapons) के सम्मानजनक पुनर्वास (Dignified Rehabilitation), राजनीति में भागीदारी (Participation in Politics) और नक्सल प्रभावित इलाकों (Naxal Affected Areas) में बुनियादी विकास (Basic Development) सुनिश्चित कर अन्य को भी हथियार डालने के लिए उत्साहित किया जा सकता है. इसके बरक्स इन मसलों की अनदेखी कर सरकार केवल सैन्य कार्रवाई (Military Action) जनित दबाव और आत्मसमर्पण आधारित नीति अपनाती रहेगी तो तात्कालिक तौर पर नक्सली हिंसा भले दब जाये, पूरी तरह खत्म नहीं हो पायेगी. नये रूप में फिर सिर उठा लेगी.

इस पर देना होगा ध्यान

महत्वपूर्ण बात यह भी कि सरकार को परिवर्तित स्वरूप में अब भी कायम उन सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों (Socio-Economic Conditions) में आमूलचूल बदलाव के लिए भी कारगर पहल (Effective Initiative) करनी होगी जिनकी कोख से नक्सली आंदोलन (Naxalite Movement) निकला और देश के बड़े हिस्से में विस्तृत हो गया. यह बहुत बड़ी चुनौती है. इससे सरकार कैसे निपटती है, नक्सली हिंसा का समूल खात्मा बहुत कुछ उस पर ही निर्भर करेगा.

#Tapmanlive

……………….

अगली कड़ी : अगड़ा बनाम पिछड़ा… बंट गये माओवादी भी!

ये भी पढ़े :

नक्सलवाद : टूटती सांसें…संघर्ष विराम’, संगठन में कोहराम

नक्सलवाद : टूटती सांसें… मारे जा रहे ओहदेदार, माओवादी मांग रहे पनाह!

नक्सलवाद : टूटती सांसें… संगठन में तकरार… नहीं बख्श रही सरकार