नक्सलवाद… टूटती सांसें : अगड़ा बनाम पिछड़ा, बंट गये माओवादी भी!

विष्णुकांत मिश्र
05 दिसंबर 2025
New Delhi : भाकपा (माओवादी) की केन्द्रीय समिति का प्रवक्ता अभय कौन था जिसके सशस्त्र संघर्ष को अस्थायी तौर पर त्याग हथियार डालने (lay down Arms) और सरकार से संवाद करने से संबंधित बयान ने नक्सलियों (Naxalites) के 58 वर्षीय ‘जनयुद्ध’ में भ्रम भर दिया? बाद में उसने पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण (Surrender) कर दिया? नक्सलवाद को गहराई से जानने-समझने वालों के मुताबिक 70 वर्षीय अभय का मूल नाम मल्लोजुला वेणुगोपाल (Mallojula Venugopal) है. तेलंगाना के करीमनगर जिले के पेद्दापल्ली शहर में एक ब्राह्मण परिवार में उसका जन्म हुआ था. तकरीबन 50 वर्षों तक भूमिगत रह नक्सली गतिविधियों को गति देने वाले मल्लोजुला कोटेश्वर राव उर्फ किशनजी का वह छोटा भाई है. 24 नवंबर 2011 को पश्चिम बंगाल के पश्चिमी मेदिनीपुर जिले के एक जंगल में सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में किशनजी मारा गया.
किशनजी का भाई
भाकपा (माओवादी) संगठन में शीर्ष के तीसरे ओहदेदार किशनजी (Kishanji) पोलित ब्यूरो (Politburo) का सदस्य था. बताया जाता है कि लंबे समय तक दोनों भाई माओवादी संगठन की केन्द्रीय समिति और पोलित ब्यूरो का सदस्य रहे. मल्लोजुला वेणुगोपाल उर्फ अभय को सांगठनिक और वैचारिक मामलों का बड़ा रणनीतिकार माना जाता रहा है. माओवादी संगठन में उसे भूपति और सोनू के नाम से भी जाना जाता था. 2010 में पार्टी के प्रवक्ता चेरिकुरी राजकुमार उर्फ आजाद के मारे जाने के बाद से मल्लोजुला वेणुगोपाल अभय के नाम से प्रवक्ता की जिम्मेवारी संभाल रहा था. 28 वर्षों से केन्द्रीय समिति के सदस्य के तौर पर भी काम कर रहा था.
पत्नियां भी थीं नक्सली
मारे गये मल्लोजुला कोटेश्वर राव उर्फ किशनजी की पत्नी पोतुला पद्मावती उर्फ सुजाता उर्फ कल्पना और मल्लोजुला वेणुगोपाल उर्फ अभय की पत्नी विमला चन्द्र सिड़ाम उर्फ तारक्का भी नक्सली थी. विमला चन्द्र सिड़ाम उर्फ तारक्का ने खराब स्वास्थ्य और सशस्त्र बलों के बढ़ते हमलों के दबाव में संघर्ष का रास्ता त्याग 01 जनवरी 2025 को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीश (Devendra Fadnavis) के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया. वह दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी (Dandakaranya Special Zonal Committee) की सदस्य थी. लगभग नौ माह बाद पोतुला पद्मावती उर्फ सुजाता ने भी 13 सितम्बर 2025 को हैदराबाद में हथियार डाल दिये. वह भाकपा (माओवादी) की केन्द्रीय समिति की सदस्य थी.

महासचिव पद का दावेदार
नंबाला केशवराव उर्फ बसवराजू के मारे जाने के बाद मल्लोजुला वेणुगोपाल उर्फ अभय के पार्टी का महासचिव बनने के कयास लगाये जा रहे थे. आधार यह कि वरीयता क्रम में वह शीर्ष पर था. लेकिन, सशस्त्र संघर्ष की राह छोड़ मुख्य धारा से जुड़ने की उसकी कोशिश के मद्देनजर सितम्बर 2025 के दूसरे सप्ताह में उसे दरकिनार कर तिप्परी तिरुपति उर्फ देवजी को नक्सली संगठन का नया महासचिव बना दिया गया. दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी के सचिव का पद खूंख्वारियत का पर्याय नक्सली माडवी हिड़मा को मिल गया. हालांकि, भाकपा (माओवादी) की ओर से इस बात की पुष्टि नहीं की गयी है. पर, नक्सलियों के बीच इसकी खूब चर्चा है.
इसलिए मिली पदोन्नति
तिप्परी तिरुपति उर्फ देवजी का जुड़ाव पीपुल्सवार ग्रुप (Peopleswar Group) से था. 1990 में उसे गढ़चिरौली (Gadchiroli) डिवीजनल कमेटी का सदस्य बनाया गया. 1999 में दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी के सचिव का पद मिल गया. 2001 में भाकपा (माओवादी) की सेण्ट्रल मिलिट्री कमीशन में शामिल किया गया. 2019 से वह उसका नेतृत्व कर रहा है. 2023 में उसे माओवादी संगठन में निर्णय लेने वाली सबसे बड़ी संस्था पोलित ब्यूरो का सदस्य बना दिया गया. ऐसा कहा जाता है कि तिप्परी तिरुपति उर्फ देवजी को केन्द्रीय समिति और पोलित ब्यूरो में उसके सैन्य कौशल और रणनीतियों के कारण पदोन्नत किया गया था.
दलित हैं देवजी
विश्लेषकों की समझ में तिप्परी तिरुपति उर्फ देवजी और माडवी हिड़मा की संगठन में वाकई पदोन्नति हुई थी तो इसके कई मायने निकाले जा सकते हैं. एक तो यह कि तेलंगाना (Telangana) के कोरुट्ला शहर का रहने वाला तिप्परी तिरुपति उर्फ देवजी (Tippari Tirupati alias Devji) दलित पृष्ठभूमि से है. सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ (Encounter with Security Forces) में मारा गया दक्षिण बस्तर के पुव्वर्ति गांव का माडवी हिड़मा आदिवासी था. 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी (Naxalbari) गांव से शुरू हुए नक्सली विद्रोह (Naxalite Rebellion) के लगभग 58 वर्षों के इतिहास में अब तक किसी दलित नक्सली को संगठन में सर्वोच्च पद नहीं मिला था. तिप्परी तिरुपति उर्फ देवजी के रूप में पहली बार ऐसा हुआ.
पहली बार मिली बागडोर
इसी तरह 1980 से लेकर अब तक जारी सशस्त्र संघर्ष में किसी स्थानीय आदिवासी को दंडकारण्य कमेटी की बागडोर पहली बार मिली थी. दंडकारण्य को नक्सली अपना सबसे बड़ा आधार क्षेत्र मानते हैं. कई वरिष्ठ नक्सलियों को किनारे कर माडवी हिड़मा को उच्च पद पर बिठाया गया था, इसका एक अर्थ यह भी निकाला गया कि इस रूप में माओवादियों ने इस मिथक को तोड़ने के मकसद से ऐसा किया कि दलित और आदिवासियों को नक्सली संगठन में सर्वोच्च पद नहीं दिये जाते हैं. सर्वोच्च पदों पर अगड़ी जाति के लोग काबिज रहते हैं.
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