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भोजपुरी गीत-संगीत: टपकती थी तब शहदीया मिठास

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भोजपुरी के संस्कारित गीत-संगीत में आकंठ समायी अश्लीलता-फूहड़ता पर आलेख प्रकाशित होते रहते हैं. पर, उनमें गंभीरता नहीं होती. यह विद्रूपता क्यों आयी इसका विशद विश्लेषण नहीं होता. छह किस्तों के इस आलेख में इसके कारकों एवं कारणों का सच उघारा गया है. प्रस्तुत है प्रथम किस्त :-


राजेश पाठक
30 सितम्बर, 2021

PATNA. एक जमाना था…साठ के दशक में ‘लागी नाहीं छूटे राम’ और ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’ जैसी भोजपुरी फिल्में (Bhojpuri Films) आती थीं और काफी सफल होती थीं. लोग दूर-दराज के गांवों से बैलगाड़ियों में भर-भरकर शहर आते थे. सिर्फ इन फिल्मों को देखने के लिए. मनोरंजन के साथ-साथ बड़ी सलीकेदार थी ये फिल्में. नाजिर हुसैन (Najir Husain) इन फिल्मों के निर्माता-निर्देशक-अभिनेता होते थे.

ड्रामा के साथ-साथ बड़ा अच्छा संदेश भी हुआ करता था इन फिल्मों में. लोकधुनों की शहदीया मिठास से युक्त फिल्मों का संगीत बार-बार सुनने पर भी मन नहीं भरता था. चित्रगुप्त जैसे संगीतकार के साथ लता मंगेशकर (Lata Mangeshkar) एवं तलत महमूद (Talat Mahmood) की आवाज होती थी. कुमकुम (Kumkum) का डांस और उनकी शोख अदाएं लोगों को मदहोश कर देती थीं.

जमाना शारदा सिन्हा का
इनके बाद भी सत्तर, अस्सी और नब्बे के दशक में कई भोजपुरी फिल्में आयीं जैसे ‘नदिया के पार’ और हिट रहीं. उनके गाने घर-परिवार में सुनने लायक होते थे. सत्तर के दशक में भोजपुरी फिल्मों से अलग एक आवाज ने सभी को चौंकाया. वह आवाज थी शारदा सिन्हा (Sharda Sinha) की. सत्तर और अस्सी के दशक में शारदा सिन्हा के गीतों ने भोजपुरी श्रोताओं के दिलों पर राज किया.

सब कुछ ठीक चल रहा था. तब रिकार्ड प्लेयर (Record Player) का जमाना था. गीतों के छोटे-बड़े तवे बिकते थे. किन्तु उस वक्त का संगीत कुछ खास घरों तक ही सीमित था. साथ में रेडियो से भी गाने बजते थे. इसके बाद टेपरिकार्डर (Tape recorder) आ गया.

गुलशन कुमार का उदय
गानों के कैसेट बनने लगे. कुछ पुरानी म्यूजिक कम्पनियों से अच्छी क्वालिटी का कैसेट तो निकलता था, किन्तु उनके दाम मंहगे होते थे. उसी दौरान म्यूजिक इंडस्ट्री में गुलशन कुमार (Gulshan Kumar) का उदय हुआ. उन्होंने काफी सस्ते दामों में कैसेट निकाला. साथ ही संगीत सुनने वाला टेपरिकार्डर और डेक भी बनाया जो गरीब तबकों और मजदूरों की पहुंच के भीतर था.

लेकिन, गुलशन कुमार ने कुछ नियमों का बेजा इस्तेमाल कर बड़े-बड़े गायकों और गायिकाओं के डुप्लीकेट कैसेट से मार्केट को भर दिया. कवर पर मोहम्मद रफी (Mohammad Rafi) या लता मंगेशकर (Lata Mangeshkar) के बड़े फोटो रहते थे और नीचे गायक का नाम कुछ और होता था. इससे म्यूजिक का स्तर गिरने लगा, पर गुलशन कुमार ने कैसेट इंडस्ट्री (Cassette Industries) में कमाई खूब की. असली की जगह श्रोता नकली चीज ही खरीदने लगे.

विंध्यवासिनी देवी का भी था एक युग
भोजपुरी में पहले लोग रेडियो से लोक संगीत अधिक सुनते थे. उस समय विंध्यवासिनी देवी (Bindhyavasini Devi) का नाम लोकप्रिय था. वह विशुद्ध रूप से संस्कार गीत ज्यादा गाती थीं. भोजपुरी में शारदा सिन्हा ने भी लोक-संगीत की राह पकड़ी और अपने मधुर स्वर के कारण काफी हिट भी हुईं. टी-सीरिज से रिलीज उनके गाने खूब बिके.


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शारदा सिन्हा संभ्रांत गायिका (Singer) थीं. पढ़ी-लखी थीं किन्तु म्यूजिक कंपनियों को भोजपुरी के ठेठपन में ही बिक्री की संभावना दिखी. भरत शर्मा (Bharat Sharma) और मदन राय (Madan Ray) ने भोजपुरी में ठेठपन के साथ-साथ मधुर गायकी का नमूना पेश किया. भरत शर्मा ने मुख्य रूप से अच्छे और देहाती रंग के गीतों को स्वर दिया और काफी लोकप्रिय हुए. मंजुल (Manjul) उनके गीतकार हुआ करते थे. मदन राय ने निर्गुण गायकी में उत्कृष्टता हासिल की.

चंदन तिवारी और मैथिली ठाकुर
भोजपुरी की अच्छी गायिकाओं में दो और नाम उल्लेखनीय हैं-मालिनी अवस्थी (Malini Awasthi) और विजया भारती (Vijaya Bharti). इन लोगों ने भी कभी अश्लीलता को नहीं अपनाया. चंदन तिवारी (Chandan Tiwari) और मैथिली ठाकुर (Maithili Thakur) भी दो संस्कारित गायिकाएं उभरी हैं.

चंदन तिवारी ने जहां पूरी तरह भोजपुरी को अपनाया वहीं मैथिली ठाकुर ने ज्यादातर मैथिली गीतों को स्वर दिया. ये गायिकाएं यूट्यूब (YouTube) के जरिये उभरी हैं. यहां तक सब ठीकठाक चला. मुन्ना सिंह, विष्णु ओझा, अजय पांडेय आदि को भी हम अच्छी श्रेणी का गायक मान सकते हैं.

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