चढ़ल चइत : गड़ी गेल छतिया में कांटा हो रामा…
शिवकुमार राय
28 मार्च 2025
प्रसिद्ध साहित्यकार पद्मश्री डा. शांति जैन (Dr. Shanti Jain) के एक आलेख में चैती (Chaiti) की विशद व्याख्या की गयी है. उसमें कहा गया है-‘चैती गीतों में प्रेम के विविध रूपों की व्यंजना है. इनमें संयोग शृंगार की कहानी भी रागों में लिखी हुई है. कहीं आलसी पति को सूर्याेदय के बाद सोने से जगाने का वर्णन है तो कहीं पति-पत्नी के प्रणय-कलह की झांकी देखने को मिलती हैं. कहीं ननद और भौजाई के पनघट पर पानी भरते समय किसी दुश्चरित्र पुरुष द्वारा छेड़खानी का उल्लेख है तो कहीं सिर पर मटका रखकर दही बेचनेवाली ग्वालिनों से कृष्ण के द्वारा गोरस मांगने का वर्णन है. कहीं कृष्ण-राधा (Krishna-Radha) के प्रेम-प्रसंग हैं तो कहीं राम-सीता (Ram-Sita) का आदर्श दांपत्य प्रेम है. कहीं दशरथनंदन के जन्म का आनंदोत्सव है तो कहीं राम और उनके भाइयों का नैसर्गिक प्रेम. कहीं स्वीकिया तथा कहीं परकीया नायिका के प्रेम के विविध रूप दिखाये गये हैं.
हृदय को छू जाता है
तात्पर्य यह कि चैती गीतों में विभिन्न कथानकों का समावेश पाया जाता है. इन गीतों में वंसत की मस्ती एवं इंद्रधनुषी (Indradhanushi) भावनाओं का अनोखा सौंदर्य है. इनके भावों से छलकती रसमयता लोगों को मंत्रमुग्ध कर देती है. चैती गीतों में कहीं-कहीं भावनाओं का इतना प्रभावशाली चित्रण हुआ है जो हृदय को छू जाता है. इनमें दैनिक जीवन के शाश्वत क्रिया कलापों का चित्रण है. साथ ही चित्र-विचित्र कथा प्रसंगों एवं भावों के अतिरिक्त सामाजिक जीवन की कुरीतियां भी चित्रित हुई हैं. आलेख में विरहणियों की व्यथा की बेहतरीन प्रस्तुति है. उसमें वर्णित है कि कोई नायिका खेत में बैगन तोड़ने जाती है और उसकी छाती में कांटा गड़ जाता है-
बैगन तोड़े गेलौं ओहो बैगन बरिया
गड़ी गेल छतिया में कांटा हो रामा
सईयां नहीं आयल…
इस गीत में कांटा गड़ जाने का तात्पर्य विरह-व्यथा की तीव्रता ही है. कोई किशोरी बधू देखते-देखते युवा अवस्था में प्रवेश कर जाती है, किन्तु चैत के महीने में उसका प्रिय नहीं लौटता. यह उसे बड़ा क्लेश देता है-
चइत मास जोवना फुलायल हो रामा
कि सईयां नहीं आयल…
बसंत (Basant) में शृंगार भाव की प्रधानता होने के कारण विरहणियों (virahaniyon) की चैत माह व्याकुलता बढ़ा देता है. इसकी व्यथा स्वाभाविक है कि जब उपद्रवी चैत के मादक महीने में प्रियतम नहीं आये तो बाद में आना किस काम का?
चैत बीती जयतई हो रामा
तब पिया की करै अयतई
पिया न भेजे पतिया
इस उत्पाती माह में कम से कम पिया की पाती भी आ जाये तो उसे थोड़ा चैन मिले-
आयल चइत उतपतिया हो रामा
पिया न भेजे पतिया.
विरहणी अपने प्रियतम को संदेश भेजती है-चैत मास में वन में टेसू फूल गये हैं. भौरें उसका रस ले रहे हैं. तुम मुझे यह दुख क्यों दे रहे हो. तुम्हारी प्रतीक्षा करते-करते वियोगजनित दुख से रोते हुए मैंने अपनी आंखें गंवा दी है.
सामूहिकता है विशेषता
राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार (National Film Awards) प्राप्त कला समीक्षक (art critic) विनोद अनुपम (Vinod Anupam) के एक आलेख में कहा गया है कि गायन की इस अद्भुत परंपरा में वीररस (Veeraras) और शृंगार रस (Shrngar Ras) समवेत होते हैं. चैता का कमाल यह है कि नगाड़ा, मृदंग और डफ जैसे वाद्य भी प्रेम का सुर बिखेरते हैं. इसका एक स्वरूप चैती भी है, जो अकेले भी गायी जाती है. लेकिन, अन्य तमाम लोकगीतों (lokagiton) की तरह चैता की विशेषता इसकी सामूहिकता है. हालांकि, शायद अब कहीं-कहीं ही औपचारिकता बची हो, पहले कई स्थानों पर दरी-चादर बिछाकर सैकड़ों लोगों को एक साथ चैता गाते देखा और सुना जाता था. चैता गायन की गति और उत्साह का यही कमाल है कि सारे काम निपटा कर जब रात में गायन की शुरुआत होती है तो सुर्योदय कब हो जाता, लोगों को अहसास नहीं हो पाता था. चैता की विशेषता है कि इसके समूह में हर कोई गायक है, हर कोई वादक है. इसके उत्साह का अहसास कोई सिर्फ चैता सुनकर नहीं कर सकता. वास्तव में उस ऊर्जा, उस आनंद, उस उत्साह का अहसास उस समूह का हिस्सा बने बगैर नहीं किया जा सकता.
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