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जाति आधारित गणना : कमजोर पड़ जायेगा तब…

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बिहार में जाति आधारित गणना का मामला उलझ गया-सा दिखता है. उससे संबंधित किस्तवार आलेख की यह दूसरी कड़ी है :


महेन्द्र दयाल श्रीवास्तव
06 मई 2023

PATNA : ‘सर्वदलीय बैठक’ का हिस्सा बन भाजपा (BJP) ने तब जदयू (JDU) और राजद (RJD) की रणनीति की हवा निकाल दी. परन्तु, इसका मतलब यह नहीं कि बिहार (Bihar) की जाति आधारित गणना से उसकी खुद की राजनीति (Politics) प्रभावित नहीं होगी. प्रभावित गणना होने पर भी होती, नहीं होने पर भी होगी. क्यों और कैसे, इसको इस रूप में समझिये. भाजपा की राजनीति मुख्यतः हिन्दुत्व पर आधारित है. इसके समर्थकों में हिन्दुओं के तमाम जाति समूह हैं. जाति (Cast) के आधार पर हिन्दू (Hindu) समाज बंटा तो हिन्दुत्व का मुद्दा स्वाभाविक तौर पर कमजोर पड़ जायेगा. परन्तु, इसके लिए सुकून की बात है कि पार्टी (Party) का राष्ट्रीय नेतृत्व कथित रूप से अतिपिछड़ा समाज के काफी सशक्त हाथ में है. संगठन और सरकार (Government) का स्वरूप पूर्व की तरह ‘खालिस सवर्णवादी’ नहीं रह गया है. उसकी राजनीति की परंपरागत धारा बदल गयी है, गैर यादव पिछड़ा वर्ग पर केन्द्रित हो गयी है. अतिपिछड़ों का हित सर्वोपरि हो गया है.

कुछ भी कर सकती है भाजपा
कल क्या होगा क्या नहीं, यह भविष्य की बात है. वर्तमान में भाजपा जिस सधे अंदाज में देश की राजनीति को अपनी रणनीति के अनुरूप ढालने का प्रयास कर रही है उससे यह स्पष्ट संकेत मिल रहा है कि गैर यादव पिछड़ों का मुकम्मल समर्थन हासिल करने के लिए वह कुछ भी कर सकती है, किसी भी सीमा तक जा सकती है. मेडिकल (Medical) की उच्च शिक्षा में पिछड़ा वर्ग (Backward Class) और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को केन्द्रीय कोटे से आरक्षण, राज्यों को पिछड़ा वर्ग की सूची में जातियों को शामिल करने का अधिकार, केन्द्रीय मंत्रिमंडल में पिछड़ा वर्ग का पर्याप्त प्रतिनिधित्व, राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा आदि इसके प्रमाण हैं.

बढ़ा रही है पैठ
भाजपा विरोधी दलों का कहना जो हो, बिहार में जाति आधारित गणना (Caste based Enumeration) के मामले में भी इसका सकारात्मक रुख रहा है. इन सबका असर है कि धीरे-धीरे ही सही, गैर यादव पिछड़ों में पार्टी की पैठ मजबूत हो रही है. इसकी पुष्टि इससे भी होती है कि 2019 के संसदीय चुनाव (Parliamentary Election) में राजग (NDA) को पिछड़ा वर्ग का लगभग 47.1 प्रतिशत वोट मिला. 43.2 प्रतिशत अनुसूचित जाति का और 39.5 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति का. 2021 में उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) की सत्ता में भाजपा की वापसी में भी इन सामाजिक समूहों के समर्थन का अहम योगदान रहा. नेतृत्व आश्वस्त है कि सवर्ण और वैश्य तो करीब-करीब साथ हैं ही, गैर यादव पिछड़ा वर्ग का संपूर्ण समर्थन मिल गया, तो फिर सत्ता में जमे उसके पांव को उखाड़ना विपक्ष के लिए कठिन हो जायेगा.

यह भी है बेचैनी की वजह
विश्लेषकों की मानें, तो पिछड़ावाद की हवा बांध जाति (Cast) की राजनीति करने वाले दलों एवं उनके नेताओं की बेचैनी-बौखलाहट का बड़ा कारण यह भी है. बिहार में जाति आधारित गणना को उसी नजरिये से देखा जा रहा है. ऐसे बेचैन नेताओं की समझ है कि जातिवाद के उभार से ही हिन्दुत्व के विस्तार को रोक भाजपा को सत्ता से बाहर किया जा सकता है. लेकिन, इसके दुष्परिणाम कितने घातक होंगे इसकी चिंता शायद उन्हें नहीं है. तभी तो जातिवाद (Casteism) का जहर बोने का उपक्रम-दर-उपक्रम किये जा रहे हैं.

प्रामाणिक माने जायेंगे आंकड़े?
पटना उच्च न्यायालय (Patna High Court) ने जाति आधारित गणना के आंकड़े सार्वजनिक करने पर अंतरिम रोक लगा रखी है. अंतिम सुनवाई में रोक हट भी जाती है (संभावना कम है) तो क्या उन आंकड़ों को प्रामाणिक माना जायेगा? केन्द्र सरकार (Central Government) ऐसा कतई नहीं मानेगी. कारण बिल्कुल साफ है. जनगणना कराने का संवैधानिक अधिकार और जिम्मेवारी केन्द्र सरकार की है, राज्य सरकार (State Government) की नहीं. संविधान में प्रावधान है कि दशकीय जनगणना में सिर्फ अनुसूचित जाति (Scheduled Caste) और अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribe) के लोगों की ही गणना होगी. अन्य किसी की नहीं. जातीय जनगणना से केन्द्र के इनकार का आधार संभवतः यही है. वैसे भी जातीय जनगणना संविधान की जातिविहीन समाज की अवधारणा के विपरीत है.


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सरदार पटेल की अनदेखी
यह लौहपुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल (Sardar Vallabh Bhai Patel) की उस चेतावनी की अनदेखी भी है जिसमें उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा था-‘अगर हम जातीय जनगणना कराते हैं, तो देश का सामाजिक तानाबाना टूट जायेगा.’ यह बात उन्होंने 1952 में देश के गृह मंत्री (Home Minister) रहते संसद में कही थी. इस चेतावनी पर गौर नहीं किया गया. नीतीश कुमार (Nitish Kumar) की तरह की जिद में ही 2015 में कर्नाटक (Karnataka) के तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री सिद्धारमैया (Siddaramaiah) ने जातीय जनगणना करवायी थी.162 करोड़ रुपये खर्च हुए थे. उसके आंकड़े सचिवालय की संचिकाओं में धूल फांक रहे हैं. एक तो वैधानिकता का सवाल था, दूसरा वहां की दो ताकतवर जातियों लिंगायत एवं वोक्कालिंगा की नाराजगी से कांग्रेस की राजनीति प्रभावित हो जाने का खतरा था. अन्य तरह की सामाजिक समस्याएं खड़ी हो जातीं सो अलग.

उपयोग किस रूप में करेंगे?
बिहार (Bihar) में जातीय जटिलताएं कुछ अधिक हैं. ऐसे में अपनी जिद में नीतीश कुमार सरकारी खजाने से पांच सौ करोड़ रुपये की बड़ी राशि खर्च कर जाति आधारित गणना कराने में सफल हो भी जाते हैं, तो उसके आंकड़े का उपयोग कैसे और किस रूप में करेंगेे? क्या कर्पूरी ठाकुर (Karpoori Thakur) की तरह अपना कोई फार्मूला इजाद करेंगे? या फिर महाराष्ट्र (Maharastra), तमिलनाडु (Tamilnadu), तेलंगाना (Telangana), हरियाणा (Haryana), छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh), राजस्थान (Rajasthan) एवं मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) की तरह 50 प्रतिशत की सीमा लांघ आरक्षण का प्रतिशत बढ़ा देंगे? ज्यादा संभावना इसी की है. वैसे, विश्लेषकों की समझ है कि इन आंकड़ों का उपयोग और किसी रूप में हो या नहीं, चुनावों (Elections) में जातीय समीकरण बैठाने-सुलझाने में तो हो ही सकता है. यानी राजनीतिक (Political) लाभ उठाया जा सकता है. पटना उच्च न्यायालय के अंतरिम आदेश का एक आधार यह भी है.

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