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जगदम्बा स्थान : भगवती – दर्शन से मिल जाते हैं वैष्णो देवी समान पुण्य फल!

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आदिशक्ति मां दुर्गा के विविध स्वरूपों में एक सभी देवियों में अपूर्व सुंदरी भगवती त्रिपुर सुंदरी देवी भी हैं. बड़हिया के मां जगदम्बा मंदिर में मां बाला त्रिपुर सुंदरी के रूप में वह मृतिका पिंड में प्रतिष्ठापित हैं. स्थानीय स्तर पर जगदम्बा मंदिर को महारानी स्थान की बड़ी पहचान मिली हुई है. मां बाला त्रिपुर सुंदरी की मृतिका पिंड में प्रतिष्ठापना, जगदम्बा मंदिर की स्थापना और सनातनी आस्था में सिद्धपीठ का स्थान मिलना, महारानी स्थान की अपरम्पार महिमा को स्थापित करते हैं. इस सिद्धपीठ के महात्म्य के बारे में बहुत कुछ पढ़े और सुने होंगे, लेकिन यहां सिलसिलेवार जो तथ्य और सच रखे जा रहे हैं वे बेहद रोचक हैं. इसमें ऐसी कई संदर्भित जानकारियां हैं, जिन्हें आप पहली बार जानेंगे. गहन अध्ययन- मनन का यह निष्कर्ष तीन खंडों में है. प्रथम खंड में इस सिद्ध मंगलापीठ की ओर श्रद्धालु क्यों और कैसे खुद- ब-खुद खींचे चले आते हैं और बिना मांगे उनकी मुरादें पूरी हो जाती हैं, इस दैवीय शक्ति पर दृष्टि डाली गयी है.

राजकिशोर सिंह
03 अप्रैल 2025
Lakhisarai: बड़हिया (Badhiya) …! बिहार (Bihar) के लखीसराय जिले के इस छोटे-से शहर का नाम सुनते या स्मरण में आते ही आम जनमानस में गर्व और भय मिश्रित कई तरह के भाव उभर आते हैं. अधिकतर अच्छे तो कुछ बुरे भी. सामान्य धारणा में सभ्य समाज में जितनी आच्छाइयां होनी चाहिये, करीब-करीब सभी ‘रईसों की इस बस्ती’ के इतिहास में दर्ज हैं, तो खौफ भरे कुछ काले अध्याय भी हैं. कभी तीस से अधिक अखाड़ों और पहलवानी के सधे दांव से इसे राष्ट्रीय स्तर की सुर्खियां मिलती थी. पवित्र सावन माह में सौ से अधिक मंदिरों (Temples) और ठाकुरबाड़ियों (Thakurwadis) में झुलनोत्सव के आयोजन से इसका छोटी अयोध्या का रूप निखर आता था. चारो तरफ आनंद ही आनंद! विश्वकर्मा पूजा (Vishwakarma Puja) पर दूर-दूर तक चर्चा में रहने वाली कव्वाली जमती थी. ऐसे आयोजनों पर नृत्य-गीत की महफिल भी सजती थी. संगीत का अपना बड़हिया घराना (Barhia Gharana) तो था ही, बाहर के कलाकारों द्वारा भी मोहक प्रस्तुति की जाती थी. आमतौर पर ऐसा नहीं होता है, परन्तु बड़हिया में महालक्ष्मी (Mahalakshmi) और महासरस्वती (Mahasaraswati) की कृपा एक साथ बरसती थी. मां दुर्गा (Maa Durga) और मां काली (Maa Kali) की भी. कमोबेश अब भी बरस ही रही है.

तब मरघट बन गया होता
आम धारणा है कि बड़हिया की काली केबाल मिट्टी में दूध की धारा बहती है. प्रसिद्धि पा रहे वहां के बहुरंगी रसगुल्लों की मिठास इसकी पुष्टि करती है. पर, अफसोस इस बात का कि इस मिठास में कभी बारूद (Barood) की गंध भी घुली थी. धमाकों के अंतहीन सिलसिला से अनिष्ट की आशंका गहरा गयी थी. सामान्य समझ में वह तो वहां विराजमान मां बाला त्रिपुर सुन्दरी (Maa bala Tripura sundari) की असीम कृपा हुई कि बड़ी निर्दयता से युवा पीढ़ी को निगल रही वर्चस्व की जंग पर विराम लग गया. नहीं तो बड़हिया मरघट बन गया होता. ‘शाक्त बंधुओं’ की ‘वीरभूमि’ वीरविहीन हो विधवाओं की बस्ती का दर्द झेलता, सिसकता रहता. इसे सिर्फ और सिर्फ पहले बल और फिर बुद्धि देने वाली मां बाला त्रिपुर सुन्दरी का प्रताप ही कहा जायेगा कि आशंकित अनिष्ट से बड़हिया उबर गया. इससे फिर सिद्ध हुआ कि बड़हिया की यह ‘कुलदेवी’ वास्तव में इसकी हितरक्षक व संरक्षक हैं.


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बिन मांगे पूरी होती हैं मुरादें
लखीसराय जिले के इस ‘सर्वगुण संपन्न’ शहर के अक्सर चर्चा में बने रहने के भले अनेक कारण हैं, पर शताब्दियों से यह इसी आदिशक्ति जगतजननी मां बाला त्रिपुर सुन्दरी को लेकर सनातन (Sanatan ) धर्मावलंबियों  में ख्यात है. मां जगदम्बा (Maa Jagadamba) के इस मंदिर को महारानी स्थान (Maharani sthan ) कहा जाता है. पतित पावनी गंगा के तट पर अवस्थित महारानी स्थान में आत्मिक शांति एवं कामना पूर्ति के लिए श्रद्धालु आते हैं. मां की महिमा ऐसी कि इस सिद्ध मंगलापीठ (Mangalapith) की ओर लोग खुद-ब-खुद खींचे चले आते हैं. बिना मांगे उनकी मुरादें पूरी होती हैं. मां की अनुकंपा ही थी कि न सरकार की कोई मदद और न राजनीतिज्ञों का कोई अवदान, सिर्फ जन सहयोग से 128 फीट ऊंचे मंदिर का निर्माण हो गया-सिद्ध मंगलापीठ मां बाला त्रिपुर सुन्दरी जगदम्बा मंदिर. ऐसा कहा जाता है कि यह बिहार (Bihar) का सबसे ऊंचा देवी मंदिर है. चमचमाते सफेद संगमरमर से निर्मित मंदिर के गुम्बज पर स्वर्ण कलश और चांदी जड़ित दरवाजा इसकी भव्यता प्रदर्शित करते हैं.

प्रतिष्ठापित हैं पांच मृतिका पिंडियां
मंदिर का गर्भगृह जमीन से 12 फीट ऊपर है. अलौकिक छटा वाले गर्भगृह में पांच मृतिका पिंडियां प्रतिष्ठापित हैं. बाला त्रिपुर सुन्दरी (मां जगदम्बा), महाकाली, महालक्ष्मी एवं महासरस्वती की पिंडियों की प्राण-प्रतिष्ठा प्रकांड विद्वान, महान तांत्रिक एवं भक्त शिरोमणि श्रीधर ओझा (Sridhar Ojha) ने सनातन वैदिक विधि-विधान से की थी. ऐसी मान्यता है कि पिंडियों की प्रतिष्ठापना के बाद भगवती वैष्णवी (Bhagwati Vaishnavi) के आदेश पर उन्होंने गंगा में जल समाधि ले ली. स्नान करने की बात कह निकले और फिर लौट कर नहीं आये. तब उनके भक्तों ने गर्भगृह के उत्तरी हिस्से में पांचवां पिंड श्रीधर ओझा का प्रतिष्ठापित कर दिया. ये पिंडियां पहले छोटी-सी कुटिया में थीं. बाद में छोटा-सा पक्का मंदिर बना. अब तो इसकी भव्यता और दिव्यता कोसों दूर से दिखती और आकर्षित करती है.

ताखों में बसती हैं योगिनियां
गर्भगृह में पिंडियों के लिए चांदी (Silver) का घुमावदार सिंहासन बना हुआ है. इसका निर्माण श्रद्धालुओं द्वारा भगवती को चढ़ायी गयी चांदी एवं अन्य धातुओं की झांप, छत्र एवं मुकुट से हुआ है. मंदिर के प्रथम तल पर नवदुर्गा (Navadurga) की भव्य मूर्तियां हैं. ताखों में भगवती की योगिनियां बसती हैं. ऐसी धारणा है कि जो श्रद्धालु वैष्णो देवी (Vaishno Devi) का दर्शन नहीं कर पाते हैं, उन्हें बड़हिया में विराजमान मां बाला त्रिपुर सुन्दरी का दर्शन कर लेने से वैसे ही पुण्य फल की प्राप्ति हो जाती है. मां जगदम्बा के प्रति स्थानीय लोगों में आस्था ऐसी है कि किसी के घर-परिवार या प्रतिष्ठान में कोई मांगलिक कार्य होता है, तो महारानी स्थान में पूजा-पाठ के बाद ही उसकी शुरूआत होती है.

(यह आस्था और विश्वास की बात है. मानना और न मानना आप पर निर्भर है.)

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