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दिनकर भूमि सिमरिया : मानस की पाठ-परंपरा से निखरी काव्य प्रतिभा

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अश्विनी कुमार आलोक
16 सितम्बर 2023

सिमरिया गांव अब तीन भागों में विभक्त है, मल्हीपुर, सिमरिया एक और सिमरिया दो. सिमरिया (Simaria) एक पंचायत में कोई बारह हजार की आबादी के बीच खड़ा है पंचायत भवन, दिनकर की प्रतिमा इस ओर स्वाभाविक संकेत करती है कि दिनकर-भूमि पर हम आकर खड़े हो चुके हैं. मूर्त्ति के दाहिने जाने वाले रास्ते में दिनकर का घर और उनके नाम पर स्थापित पुस्तकालय (Library). गांव का पहला घर पूर्व मुखिया रामानंदी सिंह का और गंगा नदी पर बने बांध के समीप अंतिम घर जिला पार्षद राजीव कुमार सिंह का है.रामधारी सिंह ‘दिनकर’ (Ramdhari Singh ‘Dinkar’) के पैतृक घर को उनके छोटे बेटे केदारनाथ सिंह ने तोड़कर उस पर एक पक्का मकान खड़ा कर लिया है. इसमें दिनकर जी के द्वारा उपयोग में लायी गयीं कुछ वस्तुएं संरक्षित की गयी हैं.

छोटा- सा संग्रहालय
इस घर को एक छोटा-सा संग्रहालय (Archive) कहा जा सकता है. इसमें एक सभाकक्ष और कुछ आवास के रूप में उपयोग किये जा रहे कमरे हैं. समीप में दिनकर जी का पैतृक दालान है. जीर्ण-शीर्ण और प्रायः उपेक्षित अवस्था में पड़े इस दालान के संबंध में कहा जाता है कि यह दिनकर के बड़े और असमय मृत्यु को प्राप्त हो गये बेटे रामसेवक सिंह की संततियों का है, जो पटना (Patna) में रहती हैं. दिनकर के घर में दिनकर की संततियां प्रायः नहीं रहतीं, ताले पड़े रहते हैं. तालों की चाभी नरेश प्रसाद सिंह के पास रहती है. नरेश प्रसाद सिंह न सिर्फ तालों को खोलते और जिज्ञासुओं को घर में घुमाते-टहलाते हैं, बल्कि दिनकर और उनके कविकर्म से जुड़ीं अनेक अप्रकट घटनाएं भी सुनाने को तैयार रहते हैं, आप सुनना चाहें तो.

मानस सुनते-बांचते…
रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के पिता बाबू रवि सिंह और मां मनरूप देवी पारंपरिक संस्कारों के वाहक रहे. रामचरित मानस (Ramcharit Manas) का पाठ करते और खेती-किसानी से जीवन-यापन करते हुए उन्होंने तीन पुत्रों को जन्म दिया – बसंत सिंह, रामधारी सिंह और सत्यनारायण सिंह. बसंत सिंह के बेटे आदित्य नारायण सिंह, रामधारी सिंह के रामसेवक सिंह और केदारनाथ सिंह, सत्यनारायण सिंह के रामानुज प्रसाद सिंह और नरेश प्रसाद सिंह. रामसेवक सिंह चार बेटियों एवं एक पुत्र अरविंद कुमार सिंह को जन्म देकर असमय स्वर्ग सिधार गये. केदारनाथ सिंह से दो बेटियों एवं एक बेटे का जन्म हुआ. स्थानीय बारो गांव, मोकामा (Mokama) उच्च विद्यालय में पढ़ते हुए रामधारी सिंह इतिहास (History) विषय के प्रति रुचिवान हुए थे, पर रामचरित मानस सुनते-बांचते उनमें कवित्व जाग रहा था.

देर नहीं लगी दिनकर बनते
पिताजी बाबू रवि सिंह ने बचपन में ही साथ छोड़ दिया था, लेकिन दरवाजे पर रामचरित्र मानस की पाठ-परंपरा नहीं छूटी थी. ऐसे में रामधारी सिंह को रामधारी सिंह ‘दिनकर’ बनते बहुत देर नहीं लगी. इतिहासविद काशीप्रसाद जायसवाल, डा. राजेन्द्र प्रसाद के सहयोगी एवं साहित्यकार गंगा शरण सिंह, रामवृक्ष बेनीपुरी आदि के सान्निध्य (Contiguity) ने काव्य प्रतिभा को ऊंचाई दी. रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की पहली पुस्तक सरदार बल्लभ भाई पटेल (Sardar Vallabhai Patel) के आंदोलन और बारदोली विजय पर प्रकाशित हुई थी ‘विजय संदेश’ (1928). अगले ही साल ‘प्राणभंग’ और उसके दो वर्षों के भीतर ‘रेणुका’ और ‘हुंकार’. काशीप्रसाद जायसवाल के सान्निध्य में भागलपुर (Bhagalpur) के किसी कवि सम्मेलन ने ‘हिमालय’ जैसी काव्य-रचना को जन्म दिया.


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ऐसे हुई ‘हिमालय’ की रचना
रात्रि में उन्हें जिस खाट पर सुलाया गया था, उसमें बहुत खटमल थे. पूरी रात जागते हुए बीती थी. उसी जागती हुई रात ने ‘हिमालय’ जैसी कविता को जन्म दिया था, जिसे सुबह आयोजित होनेवाले कवि-सम्मेलन में श्रोताओं ने बार-बार सुनने की इच्छा व्यक्त की. गद्य-पद्य की कुल 62 पुस्तकें लिखने और समूचे देश में कविताओं का वीरत्व प्रवाह प्रसारित करने के लिए रामधारी सिंह ‘दिनकर’ राष्ट्रकवि की पदवी से अभिहित हुए. उन्हें साहित्य अकादमी, ज्ञानपीठ जैसे शीर्षस्थ पुरस्कार एवं पद्मविभूषण जैसी सम्मानोपाधि दी गयी. ‘उर्वशी’ में ‘अपने समय का सूर्य हूं मैं’ के रूप में किया गया उनका उद्घोष सच निकला. हाई स्कूल के प्रधानाध्यापक रहते हुए छद्मनाम ‘अमिताभ’ से विरोधी साहित्य लिखते रहे. सब रजिस्ट्रार हुए तो प्रताड़नाएं सहीं. फिर प्राध्यापक जैसे पदों को भी सुशोभित किया. वह अनेक अध्यापकीय एवं अध्यापन- प्रशासकीय पदों को सुशोभित करते रहे. साहित्य में पौरुष रचा और वाणी में आत्मशक्ति (Self Power) का जयघोषण किया. 24 अप्रैल 1974 को रामधारी सिंह दिनकर अपनी कविताओं में समाज की चिंता छोड़कर विदा हो गये.

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