महारानी स्थान : ऐसे प्रकट हुईं मां बाला त्रिपुर सुन्दरी
बड़हिया बिहार के लिए बड़ा नाम है. कई संदर्भों में इसकी चर्चा होती है. यहां हम बतायेंगे कि बस्ती के रूप में यह कब और कैसे अस्तित्व में आया. नाम बड़हिया ही क्यों पड़ा. बाला त्रिपुर सुन्दरी कैसे प्रकट हुईं. मृतिका पिंडी में उनकी प्रतिष्ठापना किसने और कैसे की, इस प्रस्तुति में शास्त्र सम्मत तथ्यों पर आधारित जानकारी दी जा रही है.
राजकिशोर सिंह
04 अप्रैल 2025
Lakhisarai : तंत्र चूड़ामणि में 51 शक्तिपीठों (Shaktipeeths) का वर्णन है. ऐसे शक्तिपीठ वे हैं जहां आदि शक्तिस्वरूपा मां सती (Maa sati) के अंग गिरे थे. इन शक्तिपीठों के अलावा भगवती (Bhagwati) की प्राण-प्रतिष्ठा (Pran-Pratishtha) , पूजा-पाठ (puja-path) की निरंतरता और साधना-अराधना से और भी कई धार्मिक स्थान ऊर्जायित हुए हैं. साधक साधु-संतों को सिद्धियां मिली हैं. उन स्थलों को सिद्धपीठ (Siddhapeetha) कहा जाता है. धर्माचार्यों (Dharmacharyon) के मुताबिक शक्तिपीठ और सिद्धपीठ में यही अंतर है. ऐसे सिद्धपीठों में बड़हिया (Badhiya) की मां बाला त्रिपुर सुन्दरी (Maa Bala Tripura Sundari) का महारानी स्थान (Maharani Place) भी है. बड़हिया में जहां मां बाला त्रिपुर सुन्दरी विराजमान हैं, वहां पहले डीह (टीला) था. यानी कोई बस्ती नहीं थी. बस्ती कैसे बसी इसकी रोचक कथा है. भगवती बाला त्रिपुर सुन्दरी की प्रतिष्ठापना की भी.
अहसास हो गया अलौकिक शक्ति का
पहले बड़हिया के अस्तित्व में आने की कहानी. बात आठवीं सदी की है. दरभंगा (Darbhanga) जिले के संदहपुर गांव (Sandahpur Village) के दिघवैत मूल के मैथिल ब्राह्मण परिवार के दो शाक्त बंधु पृथू ठाकुर (Prithu Thakur) और जयजय ठाकुर (Jayjay Thakur) जगन्नाथपुरी (Jagannathpuri) की यात्रा पर निकले थे. उसी क्रम में गंगा पार कर इस डीह पर पहुंचे. रात्रि विश्राम वहीं किया. वहां उन्हें चूहे और बिल्ली का एक अद्भुत युद्ध दिखा. उस युद्ध में चूहे से बिल्ली पराजित होती नजर आयी. इससे उन्हें आभास हो गया कि इस वीरभूमि में मां बाला त्रिपुर सुन्दरी की अलौकिक शक्ति है. दोनों धर्मनिष्ठ शाक्त बंधु शास्त्रज्ञ और त्रिकालदर्शी (Trikaldarshi) थे. तंत्र शास्त्र के भी प्रकांड विद्वान थे. देवी भागवत (Devi Bhagwat) में जिक्र है कि गंगा के तट पर भगवती की एक सिद्धपीठ है जिसे मंगलापीठ (मंगलापीठ) कहा जाता है. ऐसा माना जाता है कि वह मंगलापीठ यही है. तर्क यह कि भारत (India) में गंगा तट (Ganga Tat) पर और कहीं इस तरह का कोई सिद्धपीठ नहीं है.
राजा भी रह गये चकित
अगली सुबह दोनों शाक्त बंधु जगन्नाथपुरी की ओर बढ़ गये. कुछ माह बाद यात्रा पूरी कर दरभंगा लौटने लगे तो फिर उस डीह पर गये और उसकी ऊर्जायिता के मद्देनजर उसे प्राप्त करने का प्रयत्न करने लगे. शास्त्रों में वर्णित तथ्यों के अनुसार उस कालखंड में पालवंश (Palavansh) के प्रतापी राजा इन्द्रदुम्न (indraduman) का राज था. लखीसराय में रेलवे स्टेशन के समीप जयनगर गांव (Jayanagar village) है. वहीं राजा इन्द्रदुम्न की राजधानी थी. राजा का इकलौता पुत्र कुष्ठ पीड़ित था. मृत्यु करीब दिख रही थी. यह जान दोनों शाक्त बंधु राजा से मिलने जयनगर गये. उस क्रम में उनके सिर के ऊपर बिना किसी आधार के तनी सफेद चादर देख लोग चकित रह गये. खबर राजा इन्द्रदुम्न तक गयी. शाक्त बंधुओं की सिद्धि से चमत्कृत राजा भी उनके दर्शन को पहुंच कुष्ठ पीड़ित पुत्र की जिंदगी की भीख मांगी. अपनी तंत्र शक्ति से शाक्त बंधुओं ने राजपुत्र (Rajaputr) को रोगमुक्त कर दिया. राजा प्रसन्न हुए.
ऐसे नाम पड़ा बड़हिया
शाक्त बंधुओं की इच्छा के अनुरूप डीह वाली जमीन राजा ने उन्हें दे दी. उन्होंने वहां बस्ती बसा दी. नाम वीरभूमि (Veerbhoomi) रखा. उसी वीरभूमि का अपभ्रंश बड़हिया है. बड़हिया का मतलब बड़ हिया यानी बड़ा हृदय वाला होता है. ऐसा दिखता भी है. वैसे, मां जगदम्बा मंदिर (Maa Jagdamba Temple) निर्माण समिति की ओर से प्रकाशित पुस्तिका-‘बड़हिया निवासिनी सिद्धदात्री मां बाला त्रिपुर सुन्दरी’ में कहा गया है कि वहां बढ़ई जाति के लोग वास करते थे इसलिए नाम बड़हिया हो गया. उसी पुस्तिका में वर्णित है कि जयजय ठाकुर कर्मकांड (karmakand) के प्रकांड पंडित थे. विद्वता की बदौलत जीवन यापन लायक धन मिलने लगा. तब अपने हिस्से की भूमि उन्होंने भाई पृथु ठाकुर को दे दी और खुद पौरोहित्य करने लगे. इस आधार पर जयजय ठाकुर के वंशज मैथिल ब्राह्मण और पृथु ठाकुर के वंशज भूमिहार ब्राह्मण के रूप में प्रतिष्ठित हुए.
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प्राप्त कर रखी थीं अनेक सिद्धियां
जयजय ठाकुर ने पूजा-पाठ में सगे भाई पृथु ठाकुर से दान लेना मुनासिब नहीं समझा. गांव से जलेवार ब्राह्मण को बुला यहां बसा दिया.उसी जलेवार ब्राह्मण वंश के श्रीधर ओझा (Sridhar Ojha) थे. पृथ्वी पर कब अवतरित हुए, इसकी कोई प्रामाणिक जानकारी नहीं है.1939 में गीता प्रेस, गोरखपुर (Gorakhpur) ने ‘भक्त चरित्रांक’ प्रकाशित किया था. उसमें श्रीधर ओझा को बाल ब्रह्मचारी, सिद्ध तांत्रिक और श्मशानी बताया था. बात संभवतः पालवंश के शासन के आखिरी काल की है. श्रीधर ओझा ने घर-परिवार से दूर गंगा के तट पर कुटिया में रह भगवती-साधना से अनेक सिद्धियां प्राप्त की थी. ख्याति पूरे देश में फैल गयी थी. समय-समय पर देश के विभिन्न भागों में जाकर वह अपनी चमत्कारिक सिद्धियों से लोगों को अभिभूत भी करते थे. ऐसा कहा जाता है कि वैष्णो देवी (Vaishno Devi) के रूप में ख्यात कश्मीर की वैष्णवी देवी के प्रतिष्ठाता यही श्रीधर ओझा थे.
दर्शन हुए त्रिपुर सुन्दरी के
वैष्णवी देवी की अवतार कथा में इनकी विशद चर्चा है. कथा को विस्तार इस रूप में मिलता है. कश्मीर (kashmir) से लौट कर श्रीधर ओझा बड़हिया आये तो स्वप्न हुआ कि उन्हें यहां ज्योतिस्वरूपा मां बाला त्रिपुर सुन्दरी का दर्शन होगा. गंगा में प्रवाहित मिट्टी के खप्पर में ज्योति रूप में वह उन्हें दिखेंगी. गंगा की पवित्र मिट्टी से पिंड के रूप में स्थापित कर वह उनका पूजन करें. इससे संसार का दुख-दर्द दूर होगा. अगली सुबह स्वप्न के अनुरूप श्रीधर ओझा को गंगा में मां बाला त्रिपुर सुन्दरी के दर्शन हुए. स्वप्न में मिले आदेश के अनुसार श्रीधर ओझा ने उक्त डीह पर चार मृतिका पिंडियां बनायी और शास्त्रानुसार दक्षिण की तरफ से चार महादेवियों-त्रिपुर सुन्दरी, महाकाली, महालक्ष्मी एवं महासरस्वती की प्राण-प्रतिष्ठा की. बाद में मां वैष्णवी भी श्रीधर ओझा के सपने में आयीं और बोलीं -‘मेरी ही प्रेरणा से तुम्हें तुम्हारी जन्मभूमि में त्रिपुर सुन्दरी के दर्शन हुए हैं. वह बाला रूप में सदैव तुम्हारी जन्मभूमि में विराजमान रहेंगी. मेरी और मेरी अंशस्वरूपा त्रिपुर सुन्दरी के कारण तुम्हारा यश अखंड रहेगा.
(यह आस्था और विश्वास की बात है. मानना और न मानना आप पर निर्भर है.)
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