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पुल-प्रकरणः हो न जाये घोरमट्ठा!

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अविनाश चन्द्र मिश्र
25 जून 2023
Patna : भागलपुर (Bhagalpur) के सुल्तानगंज और खगड़िया के अगुवानी घाट (Aguwani Ghat)के बीच गंगा नदी पर 01 हजार 794 करोड़ रुपये की लागत से निर्माणाधीन तीन किलोमीटर लंबे सड़क पुल (Road Bridge) का एक हिस्सा 04 जून 2023 को धराशायी हो गया. असंख्य आंखों ने अगुवानी घाट की तरफ के इस हिस्से को बालू की भीत की तरह भरभरा कर गंगा में गिरते देखा. यदा-कदा छोटे मोटे पुल-पुलियों के निर्माण के दौर में ध्वस्त हो जाने को उतनी गंभीरता से नहीं लिया जाता. बात गंभीर रहने के बाद भी कमजोर तकनीकी पक्ष के मद्देनजर नजरंदाज कर दिया जाता है. यह तो महासेतु है, इसके ढहने को डिजाइन की त्रुटि और निर्माण में गड़बड़ी की बात कह प्रशासनिक और नैतिक जिम्मेवारी से नहीं बचा जा सकता.

मानक गुणवत्ता नहीं
मामले में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (Chief Minister Nitish Kumar) और पथ निर्माण विभाग संभाल रहे उपमुख्यमंत्री तेजस्वी प्रसाद यादव (Deputy Chief Minister Tejashwi Prasad Yadav) के अलग-अलग जो बयान आये उनसे पश्चाताप का नहीं, बेचारगी और बचाव का मिश्रित भाव झलकता है. नीतीश कुमार का कहना रहा कि पुल ठीक नहीं बन रहा था तभी तो गिरा. क्या यह उनकी बेचारगी नहीं है? उनके कहने का तात्पर्य यही न था कि निर्माण सही ढंग से नहीं हो रहा था और वह कोई कार्रवाई नहीं कर पा रहे थे! विभागीय मंत्री तेजस्वी प्रसाद यादव का बयान आया कि पहली बार पुल का एक हिस्सा गिरा था तब निर्माण में गड़बड़ी का मुद्दा उन्होंने ही उठाया था.

क्यों नहीं हुई कार्रवाई ?
सत्ता शीर्ष के इन कथनों से खुद-ब-खुद पुष्टि हो जाती है कि पुल के निर्माण में मानक गुणवत्ता का पालन नहीं हो रहा था. ऐसा था तो फिर निर्माण के काम हो कैसे रहे थे? सत्ता शीर्ष के समक्ष ऐसी क्या विवशता थी कि 30 अप्रैल 2022 को हवा के हल्के झोंके से पुल के स्ट्रक्चर के गिर जाने के बाद भी निर्माण कार्य पर रोक नहीं लगायी गयी? पुल का निर्माण कर रही एसपी सिंगला कंस्ट्रक्शन कंपनी (SP Singla Construction Company) के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई? और कुछ नहीं, बस इस ‘विवशता’ के अंदरुनी कारणों का खुलासा हो जाये तो रहस्य सामने आ जा सकता है. वैसे, आईआईटी, रूड़की (IIT, Roorkee) के जांच-प्रतिवेदन के आधार पर तर्क रखा जा रहा है कि डिजाइन में त्रुटि थी.

अगुवानी घाट पुल का ध्वस्त हिस्सा. चित्र सोशल मीडिया

कोई जवाब नहीं
उसमें कहा गया है कि अलग ढाले गये सेंगमेंट को पिला पर चढ़ाने के दौरान लोड बढ़ जाने से वह गिर गया और पिलर क्षतिग्रस्त हो गये. फाउंडेशन मानक के अनुसार हुआ, पाया और संरचना के निर्माण में गड़बड़ी हुई. इस सवाल का सरकार के पास कोई जवाब है कि डिजाइन में त्रुटि थी तो फिर नौ साल से निर्माण के कार्य कैसे और क्यों हो रहे थे? इसका मतलब तो यह भी हो सकता है कि किसी दबाव में या प्रलोभन में त्रुटिपूर्ण डिजाइन को स्वीकृति दी गयी? ऐसा हुआ, तो इसके लिए जिम्मेवार कौन है? पहले इसका निर्धारण होना चाहिये. लेकिन, सत्ता शीर्ष इसके प्रति गंभीर नहीं है. उपमुख्यमंत्री तेजस्वी प्रसाद यादव ने पुल का फिर से निर्माण कराने की बात कह तमाम सुलगते सवालों को नेपथ्य में डाल दिया है.

रोचक किस्सा भ्रष्टाचार का
बिहार में जहां कहीं भ्रष्टाचार की चर्चा होती है तो एक किस्सा बड़े रोचक अंदाज में सुनाया जाता है. एक बीडीओ (BDO ) साहब ने अपने इलाके में कागज पर कुआं खुदवाया. कुछ समय बाद उनका तबादला हो गया. नये साहब की नजर उस कुएं पर गयी. उन्होंने उसकी उड़ाही करवा दी. उनके बाद जो साहब आये वह कुछ ज्यादा चालाक थे, देखा कि आज न कल पूर्व के साहबों की गर्दनें फंसेंगी ही, अनुपयोगी बता उन्होंने कुएं को भरवा दिया. बाजीगरी देखिये, एक ही कुएं की कागजी खुदाई, उड़ाही और भराई के नाम पर तीनो साहबों ने अवैध कमाई कर ली और किसी भी रूप में कहीं इसका कोई सबूत नहीं छोड़ा.


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हमाम में सभी नंगे हैं
निष्पक्ष उच्च स्तरीय जांच हो, तो सुल्तानगंज- अगुवानी घाट पुल (Sultanganj- Aguwani Ghat Bridge) के मामले में थोड़ा बदले स्वरूप में उक्त किस्से सरीखे निष्कर्ष ही सामने आयेंगे. पर, यक्ष प्रश्न यह है कि निष्पक्ष उच्च स्तरीय जांच करायेगा कौन? इससे जुड़ा दूसरा सवाल यह भी कि निष्पक्ष जांच के लिए मुट्ठियां लहरायेगा कौन? हमाम में तो सभी नंगे हैं! वैसे, जनहित याचिका के जरिये मामला पटना उच्च न्यायालय (Patna High Court) में गया है. उच्च न्यायालय ने गंभीरता दिखायी है. सरकार से संबंधित ब्योरा तलब किया है. इससे अलग न्यायिक जांच और सीबीआई (CBI) जांच के लिए औपचारिक आवाज भी उठी है. पर, यह नक्कारखाने में तूती की आवाज की तरह है.

औचित्य समझ से परे
ऐसा भी नहीं कि नीतीश कुमार ने जांच के लिए पहल नहीं की. पहल की है, जांच का जिम्मा पथ निर्माण विभाग में वर्षों से जमे अपर मुख्य सचिव प्रत्यय अमृत को सौंप दी है. उस प्रत्यय अमृत (Pratyay Amrt) को जिनकी निष्पक्षता पर विश्वास सत्तारूढ़ जदयू के ही विधायक डा. संजीव कुमार (JDU MLA Dr. Sanjeev Kumar ) को नहीं है तो आमलोगों को क्या होगा? पुल का निर्माण उनके ही परबत्ता विधानसभा क्षेत्र में हो रहा है. सड़क से लेकर सदन तक वह गुणवत्ता का सवाल उठाते रहे हैं. प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष प्रत्यय अमृत को संदेह के घेरे में लाते रहे हैं. ऐसे में प्रत्यय अमृत को ही जांच की जिम्मेवारी सौंपने का औचित्य समझ से परे है. सब घोरमट्ठा!

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