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अररिया : नहीं जग रही आस …!

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अशोक कुमार
06 मई 2024

Araria : चुनावी विश्लेषण में आजकल प्रायः हर मुकाबले को कांटे के संघर्ष का विशेषण दे दिया जाता है. इससे लोग भ्रमित हो जाते हैं. ऐसा या तो समझदारी के अभाव में हो रहा है या फिर समझ रखते हुए भी अतिरिक्त आकर्षण पैदा करने के लिए किया जा रहा है. इस परिप्रेक्ष्य में बात बिहार (Bihar) के सीमावर्ती अररिया संसदीय क्षेत्र की करें तो वहां वाकई अतिरंजना रहित कांटे की टक्कर है. वैसे, सरसरी तौर पर स्वरूप त्रिकोणीय दिखता है. पर, विश्लेषकों की मानें तो तीसरे कोण में परिणाम के रूख को मोड़ देने‌ जैसा दमखम नहीं है. मतदान के दिन वैसा कुछ दिख जाये तो वह अलग बात होगी. फिलहाल भाजपा के प्रदीप सिंह (Pradip Singh) और राजद के शाहनवाज आलम (Shahnawaz Alam) के बीच सीधी भिडंत है. दावे जो हों, इस भिड़ंत में तीसरे किसी उम्मीदवार की कोई खास मौजूदगी नहीं है. इसके बावजूद तस्वीर साफ नहीं हो रही है.

आशंका की लम्बी चादर
मतों का ध्रुवीकरण करीब-करीब पूर्व की तरह परिलक्षित है, पर भितरघातियों ने दोनों तरफ आशंका की लम्बी चादर फैला रखी है. इस कारण चुनाव (Election) का रूख परख पाना कठिन है. भितरघात का खतरा भाजपा (BJP) में कुछ अधिक था. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी (Narendra Modi) की चुनावी सभा के बाद हालात लगभग सामान्य हो गये हैं. उधर राजद (RJD) के पूर्व विधायक मुरलीधर मंडल के पुत्र शत्रुघ्न मंडल (Shatrughan Mandal) निर्दलीय ताल ठोक रहे हैं. मुरलीधर मंडल सिकटी से विधायक निर्वाचित हुए थे. वहां‌ शत्रुघ्न मंडल को भी एक बार राजद की उम्मीदवारी मिली थी. मात खा गये थे. इस आधार पर बागी मान लोग उनके मैदान में रहने से राजद उम्मीदवार शाहनवाज आलम के हित प्रभावित होने की बात करते हैं.

बंटा है दो धाराओं में
चुनावी राजनीति की गहन जानकारी रखने वालों का मानना है कि शत्रुघ्न मंडल जो कुछ भी मत हासिल करेंगे उनमें अधिसंख्य भाजपा समर्थकों के होंगे, राजद के नहीं. ऐसे में यह कहा जा सकता है कि शत्रुघ्न मंडल की उपलब्धि जितनी बड़ी होगी, प्रदीप सिंह की हार की आशंका उतनी ही गहरी मानी जायेगी . शत्रुघ्न मंडल के चुनाव अभियान की कमान ‌भाजपा के पूर्व विधायक जनार्दन यादव (Janardhan Yadav) ने संभाल रखी है. लोग चर्चा करते हैं कि जनार्दन यादव के साथ भाजपा के और भी कई नेता भितरघाती की भूमिका में हैं. लेकिन, मतदाताओं का मिज़ाज जिस ढंग से दो धाराओं में बंटा है उसमें इन कथित भितरघातियों का कुछ चल पायेगा इसकी संभावना नहीं दिखती है.


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गुल खिला सकता है गुस्सा
राजद के अघोषित सुप्रीमो तेजस्वी प्रसाद यादव (Tejaswi Prasad Yadav) ने पूर्णिया की तरह अररिया में भी खूब जोर लगाया. स्वजातीय समाज का भाजपाई मिज़ाज नहीं बदला. पूर्व की तरह ‘माय’‌ छिन्न-भिन्न है. राजद प्रत्याशी शाहनवाज आलम का समर्थन मुख्य रूप से एक समुदाय विशेष में सिमट सा गया दिखता है. वह समुदाय भी कुल्हैया और शेखड़ा बिरादरी के रूप में बंटा है. दोनों में घोर प्रतिद्वंद्विता है. शाहनवाज आलम कुल्हैया बिरादरी से हैं‌. राजद की उम्मीदवारी से वंचित कर दिये गये उनके बड़े भाई सरफराज आलम का गुस्सा भी अपनी जगह कायम है. यह गुस्सा गुल खिला सकता है.

कांटे की टक्कर
पुलिस उपाधीक्षक का पद त्याग पटना विश्वविद्यालय (Patna University) में प्राध्यापक बन गये प्रो. अखिलेश कुमार (Prof. Akhilesh Kumar) भी निर्दलीय मैदान में हैं. यादव बिरादरी से आते हैं. मलाल उन्हें इस बात का है कि बड़ी आबादी रहने के बावजूद राजद किसी यादव (Yadav) को उम्मीदवार नहीं बनाता है. इसी को उन्होंने मुद्दा बना रखा है. चर्चित आरटीआई कार्यकर्ता प्रसेनजीत कृष्ण (Prasenjit Krishna) का मानना है कि अररिया में जीत हासिल करने के लिए राजद को हिन्दू उम्मीदवार उतारना होगा. ऐसा इसलिए कि यहां की जनता के दिमाग में यह बात अच्छी तरह से बैठा दी गयी है कि मुस्लिम समुदाय के किसी नेता को अब इस संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व नहीं करने दिया जायेगा. वैसे, इस बार टक्कर कांटे की है. परिणाम कुछ भी निकल सकता है.

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