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जातीय जनगणना का जिन्न

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अविनाश चन्द्र मिश्र
31 जनवरी , 2022

PATNA : भारत में आखिरी जातीय जनगणना (Caste Census) 1931 में हुई थी. हुई 1941 में भी थी, पर आंकड़े सार्वजनिक (Public) नहीं किये गये थे. शायद द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण वैसा हुआ था. भारत (India) तब पराधीन था. स्वतंत्र भारत में 1951 की प्रथम जनगणना के वक्त केन्द्र सरकार के समक्ष ऐसा प्रस्ताव आया, तो समाज में भेदभाव पैदा करने वाला बता खारिज कर दिया गया.

सरदार वल्लभ भाई पटेल (Sardar Ballabh Bhai Patel) गृह मंत्री थे. उनका कहना रहा कि ऐसा करने से सामाजिक तानाबाना छिन्न-भिन्न हो जायेगा. मामला वहीं खत्म हो गया. अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए संविधान में आरक्षण का प्रावधान किया गया. इस कारण उन जातियों की गणना आवश्यक हो गयी. 1951 से उनकी गणना हो रही है. हर जनगणना में उनके आंकड़े संग्रहित और प्रकाशित किये जा रहे हैं.

यहां गौर करने की जरूरत है कि 70 वर्षों से हो रही जातीय गणना और आरक्षण (Reservation) से इन दोनों समुदायों की किन जातियों के कैसे लोग लाभान्वित हो रहे हैं? लाभ मिल रहा है, पर उस लाभ पर दोनों समुदायों की कुछ खास जातियों और वंचित जातियों के कतिपय दबंग परिवारों का वर्चस्व स्थापित हो गया है. आमतौर पर उन्हीं के इर्द-गिर्द यह लाभ घूम रहा है.


जातिविहीन लोकतांत्रिक समाज की वकालत करने वाले जातीय जनगणना को सैद्धांतिक तौर पर भले जातिवाद के पुनरुद्धार के रूप में देख रहे हों, सामाजिक समरसता की बात कर रहे हों, पर इसके व्यावहारिक खतरे को नजरंदाज नहीं किया जा सकता. यह खतरा अगड़ा बनाम पिछड़ा के टकराव तक ही सीमित नहीं रहेगा. अन्य पिछड़ा वर्ग और अनुसूचित जाति एवं जनजाति के बीच भी कई टकराव होंगे.


तल्ख सच्चाई यह है कि इतने वर्षों के बाद भी टूटी-फूटी-उजड़ी झोपड़ियों, तम्बुओं और मलीन बस्तियों में अमानवीय हालात में जी रही बहुत बड़ी आबादी लाभ की बात दूर, इसका मायने-मतलब भी समझ नहीं पायी है. ऐसे में यह सवाल उठता है कि जिस लक्ष्य को लेकर आरक्षण की व्यवस्था हुई, वह पूरा हो रहा है क्या? अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की तरह आरक्षण की मांग अन्य पिछड़ी जातियों ने भी उठायी.

1931 की जातीय जनगणना के मुताबिक देश में अन्य पिछड़ी जातियों की आबादी 52 प्रतिशत है. मंडल कमीशन (Mandal Commission) की रिपोर्ट (Report) इसी आंकड़े पर आधारित है. उसी रिपोर्ट को मापदंड मान अन्य पिछड़ी जातियों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण लागू हुआ. जाति की राजनीति करनेवाले नेताओं की सत्ता और सियासत लड़खड़ाती है, तो जातीय भावना को उभार देते हैं.

लालू प्रसाद (Lalu Prasad), मुलायम सिंह यादव (Mulayam Singh Yadav), शरद यादव (Sharad Yadav) आदि जातीय नेताओं ने 2010 में जातीय जनगणना की मांग उठा दी. केन्द्र में कांग्रेस के नेतृत्व में संप्रग की सरकार थी. मनमोहन सिंह (Manmohan Singh) प्रधानमंत्री (Prime Minister) और पी चिदम्बरम (P. Chitambram) गृहमंत्री (Home Minister) थे. पी चिदम्बरम ने इसका कड़ा विरोध किया था. कहा था – जाति आधारित जनगणना के बाद तमाम ऐसे मुद्दे उठेंगे, जिससे देश में आपसी भाईचारा व सौहार्द्र बिगड़ेगा. शांति-व्यवस्था भंग होगी.

गृह मंत्री की समाज के व्यापक हित वाली इस चिंता पर राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद का दबाव भारी पड़ गया. जातीय जनगणना के लिए सरकार को पहल करनी पड़ गयी. ‘सामाजिक, आर्थिक एवं जातीय जनगणना’ के नाम से जातियों की गणना करायी गयी. चार हजार आठ सौ करोड़ रुपये खर्च हुए. उस जनगणना के जातीय आंकड़े सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय की संचिकाओं से बाहर नहीं निकल पाये. सरकार उन आंकड़ों को सार्वजनिक करने का साहस नहीं जुटा पायी.


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लालू प्रसाद (Lalu Prasad) तो स्थायी हिमायती हैं ही, इस बार बोतल में बंद जातीय जनगणना के जिन्न को ‘जाति नहीं जमात’ की राजनीति का दंभ भरनेवाले नीतीश कुमार (Nitish Kumar) ने निकाला है. तर्क वंचित जातियों की आबादी के अनुरूप विकास का है, पर लक्ष्य राजनीतिक है. 27 प्रतिशत आरक्षण के बाद भी अन्य पिछड़ा वर्ग की अधिसंख्य जातियां पिछड़ी हुई ही हैं. उन्हें इसका लाभ न के बराबर मिल रहा है.

अन्य पिछड़ा वर्ग की कोटि में तकरीबन दो हजार सात सौ जातियां हैं. इनमें एक हजार जातियों ने इसका सर्वाधिक लाभ उठाया है. 50 प्रतिशत सिर्फ सौ जातियां हड़प रही हैं. एक हजार सात सौ जातियां इससे वंचित हैं. जातीय जनगणना से इन वंचितों को उनका हक मिलने लग जायेगा? क्या होगा, क्या नहीं यह भविष्य की बात है.

जातिविहीन लोकतांत्रिक समाज की वकालत करने वाले जातीय जनगणना को सैद्धांतिक तौर पर भले जातिवाद के पुनरुद्धार के रूप में देख रहे हों, सामाजिक समरसता की बात कर रहे हों, पर इसके व्यावहारिक खतरे को नजरंदाज नहीं किया जा सकता. यह खतरा अगड़ा बनाम पिछड़ा के टकराव तक ही सीमित नहीं रहेगा. अन्य पिछड़ा वर्ग और अनुसूचित जाति एवं जनजाति के बीच भी कई टकराव होंगे. इन टकरावों से समाज जूझेगा. जाति की राजनीति (Politics) करनेवाले नेताओं का मकसद तो पूरा हो ही जायेगा!

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