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भोजपुरी गीत-संगीत : विनय बिहारी ने बना दिया अश्लीलता का जतरा

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भोजपुरी के संस्कारित गीत-संगीत में आकंठ समायी अश्लीलता-फूहड़ता पर आलेख प्रकाशित होते रहते हैं. पर, उनमें गंभीरता नहीं होती. यह विद्रूपता क्यों आयी इसका विशद विश्लेषण नहीं होता. छह किस्तों के इस आलेख में इसके कारकों एवं कारणों का सच उघारा गया है. प्रस्तुत है तीसरी किस्त :-


राजेश पाठक
4 अक्तूबर, 2021

PATNA. भोजपुरी में एक गीतकार हैं विनय बिहारी (Binay Bihari). इन्होंने कल्पना के लिए सर्वप्रथम फूहड़ गीत लिखे और कल्पना रातोरात फेमस हो गयीं. उनका एक बिकाऊ गीत हुआ था-‘एगो चुम्मा ले ल राजा जी बन जाई जतरा.’ फिर कंपनियों ने ऐसे ही फूहड़, अश्लील और साहित्यविहीन गीतों से बाजार को पाट दिया. शारदा सिन्हा (Sharda Sinha) जैसे लोग हाशिये पर चले गये.

किन्तु 2003 में भोजपुरी (Bhojpuri) गीत-संगीत के इस स्याह माहौल में एक छोटी-सी लड़की देवी (Devi) भोजपुरी गीत-संगीत प्रेमियों के लिए आशा की एक किरण बनकर आयी. लोग ऐसा मान चुके थे कि गीत-संगीत के बाजार में सिर्फ अश्लीलता ही बिकती है.

देवी ने इस धारणा को तोड़ते हुए भोजपुरी लोक संगीत की साफ-सुथरी परम्परा को पुनः स्थापित किया. उसका पहला एलबम ‘पुरबा बयार’ बाजार में आया और आंधी की गति से हिट हो गया. फिर उसकी लोकप्रियता का ग्राफ बढ़ता ही गया.


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अच्छे गीतों का खड़ा हुआ बाजार
जो लोग यह समझने लगे थे कि भोजपुरी में साफ-सुथरे लोकगीत बिक ही नहीं सकते वे गलत सिद्ध हुए. हालांकि, उस समय अश्लील गीतों का बाजार भी बना रहा, किन्तु देवी ने अच्छे गीतों का एक समानान्तर बाजार भी खड़ा कर दिया.

सन् 2000 के बाद तक भोजपुरी कैसेटों और वीडियोज का एक बहुत बड़ा मार्केट (Market) बन चुका था और भोजपुरी क्षेत्र के लोगों के घर-घर में भोजपुरी कलाकार अपने गीतों के साथ पहुंच चुके थे. घर-घर में डेक बजते थे.

झोपड़ियों तक पहुंच गया भोजपुरी संगीत
पहले ग्रामोफोन रिकार्ड प्लेयर आदि सिर्फ धनी लोगों के ‘ड्राइंग रूम’ की शोभा थे. पर, अब झुग्गी-झोपड़ियों तक बड़ी संख्या में भोजपुरी संगीत पहुंच चुका था.

भोजपुरी गीतों की लोकप्रियता को देखते हुए भोजपुरी सिनेमा का एक नया दौर शुरू हुआ. मनोज तिवारी (Manoj Tiwari) और रानी चटर्जी (Rani Chatarjee) को लेकर भोजपुरी फिल्म बनी ‘ससुरा बड़ा पैसा वाला’.

लाइन लग गयी भोजपुरी फिल्मों की
भोजपुरी गानों को डेकों और वीडियो के माध्यम से देखने वाला एक बड़ा वर्ग अपने गायकों को बड़े पर्दे पर देखने-सुनने हेतु आतुर होकर थियेटरों में पहुंचने लगे और मनोज तिवारी (Manoj Tiwari) की यह पहली फिल्म हिट रही. उसके बाद भोजपुरी फिल्मों की लाइन लग गयी.

भोजपुरी गानों का श्रोता अब भोजपुरी सिनेमा का दर्शक बन गया. भोजपुरी गानों के लेखक, गायक, संगीतकार, वीडियोग्राफर आदि सभी ने अब दिल्ली के टी-सिरिज से मुम्बई का रास्ता पकड़ लिया.

दौड़ पड़े मुम्बई की ओर
भोजपुरी गीत-संगीत से जुड़े जो लोग पहले दिल्ली (Delhi) की कैसेट कंपनियों के इर्द-गिर्द दिखते थे, वे सभी मुम्बई के आदर्शनगर लोखंडवाला, अंधेरी आदि के आसपास चाय की दुकानों और रेस्तराओं में दिखने लगे.

संयोग से भोजपुरी फिल्मों में भी भोजपुरी गायक-गायिकाओं का ही वर्चस्व बन गया. उस समय के लगभग सभी बिकाऊ गायक एवं कल्पना (Kalpana) जैसी गायिका भी भोजपुरी फिल्मों में हीरो या हिरोइन के रूप में किस्मत आजमाने लगे.


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रवि किशन भी घुस गये
उठाये दर्जनों कलाकार भोजपुरी सिनेमा में डुबकी लगाने लगे. भोजपुरी का बनता मार्केट देखकर रवि किशन (Ravi Kishan) भी अपनी हिन्दी की छोटी-सी छवि को त्याग कर भोजपुरी में आ गये.

बहुत जल्द ही मनोज तिवारी, रवि किशन, निरहुआ, पवन सिंह आदि भोजपुरी में स्टार कहे जाने लगे. कल्पना फिल्मों में तो नहीं चलीं किन्तु उन्होंने भोजपुरी में गाये जाने वाले अश्लील गीतों का दामन थाम लिया. खासकर आइटम गाने कल्पना गाने लगीं.

कल्पना के पदचिह्नों पर इन्दू सोनाली
बाद में भोजपुरी फिल्मों का डिमांड बढ़ने लगा तो इन्दु सोनाली (Indu Sonali) जैसी गायिकाओं ने इस क्षेत्र में प्रवेश किया. इन्दू सोनाली के गाये आइटम सांग और गीतों को सुनकर लोग सहज ही अंदाजा लगा सकते हैं कि वे कल्पना के पदचिह्नों पर ही चलती रहीं.

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