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मांझी प्रकरण : यह अभिमान ही है उनका, और कुछ नहीं…!

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विशेष संवाददाता
19 जून 2023

PATNA : पारसमणि (Parsmani) के बारे में जरूर जानते होंगे. उससे लोहा सटता है तो सोना बन जाता है. मतिभ्रम कहें या भ्रमजाल, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (Nitish Kumar) और उनके नवरत्नों की समझ में राजनीति के क्षेत्र में जदयू ‘पारसमणि’ है. दंभ ऐसा कि जदयू से जो सटेगा, सोना तो नहीं, बड़े कद का नेता अवश्य बन जायेगा! हाल में दरभंगा नगर निगम की महापौर अंजुम आरा (Anjum Ara) और कांग्रेस से जुड़े रहे उनके बहुचर्चित पति सिबगतुल्लाह खान उर्फ डब्बू खान  (Sibagatullah khan urf dabboo khan) जदयू में शामिल हुए नहीं कि बड़ा नेता हो गये. ऐसा कहा जाता है कि विवादित छवि के सिबगतुल्लाह खान उर्फ डब्बू खान कभी जदयू के राष्ट्रीय महासचिव पूर्व केन्द्रीय मंत्री अली अशरफ फातमी (Ali Ashraf Fatmi) के शिष्य थे. जदयू के रणनीतिकारों ने अप्रत्यक्ष रूप से उसी शिष्य को गुरु के समानांतर खड़ा कर बड़ा नेता बना दिया. अली अशरफ फातमी के अघोषित विकल्प के तौर पर पेश कर दिया.

जदयू के हो गये भागीरथ मांझी और मिथुन मांझी!

काफी लंबा है उनका ख्वाब
अली अशरफ फातमी दरभंगा संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ते रहे हैं. राजद की उम्मीदवारी मिलती रही है. 2019 में राजद ने हाशिये पर डाल दिया. बागी उम्मीदवार के रूप में मधुबनी में मात खा जाने के बाद जदयू में शामिल हो गये. अब दरभंगा से उस पार्टी के दावेदार हो गये हैं. लेकिन, यहां दिक्कत यह है कि वर्तमान में जदयू की राजनीति में नीतीश कुमार के खासमखास माने जाने वाले जल संसाधन मंत्री संजय झा (Sanjay Jha) ने इस क्षेत्र से सांसद बनने का लंबा ख्वाब पाल रखा है. वैसे, 2014 में उन्हें यह अरमान पूरा करने का अवसर मिला था, मतदाताओं ने नकार दिया. 2014 और 2024 के राजनीतिक व सामाजिक समीकरणों में कोई खास अंतर नहीं आया है. इस तथ्य से हर कोई वाकिफ है. इसके बावजूद संजय झा की दावेदारी अपनी जगह कायम है. अली अशरफ फातमी या तो उनके रसूख से अनभिज्ञ हैं या फिर खुद को कुछ अधिक ‘बलशाली’ मान रहे हैं, अपनी दावेदारी से पीछे हटने को तैयार नहीं हैं. ऐसी चर्चा है कि उन्हें सीधे नकारा नहीं गया है, औकात में रखने के लिए सिबगतुल्लाह खान उर्फ डब्बू खान को सामने कर दिया गया है.

क्या दर्शाता है यह?
सोचिये, कहां अली अशरफ फातमी और कहां सिबगतुल्लाह खान उर्फ डब्बू खान! जदयू नेतृत्व की यह मानसिकता क्या दर्शाती है? अब इसका विस्तार देखिये, पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी (Ex CM. Jitan Ram Manjhi) जदयू में नहीं हैं. उनकी अपनी खुद की पार्टी है- हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा (हम). यह पार्टी भी महागठबंधन का हिस्सा थी. जदयू नेतृत्व ने इस पार्टी पर राजनीति की ‘छोटी दुकान’ बता जदयू में विलय के लिए दबाव बनाया. जीतनराम मांझी को कबूल नहीं हुआ, अलग हो गये. उनके पुत्र संतोष कुमार मांझी (Santosh Kumar Manjhi) ने मंत्री का पद त्याग दिया. जीतनराम मांझी का अगला पड़ाव क्या होगा, यह वक्त के गर्भ में है. वैसे तो यह पार्टी के अधिकार क्षेत्र का मामला है तब भी संवेदनशील लोग इस पर गौर फरमायेंगे.


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विकृत सोच ही है यह
विशुद्ध रूप से यह जदयू का आंतरिक मामला है. उसकी अपनी मर्जी है. लेकिन, सामान्य समझ में उसने जीतनराम मांझी का जो ‘विकल्प’ चुना है वह उन्हें अपमानित करने वाला तो है ही, पार्टी की विकृत सोच को भी उजागर करता है. संतोष कुमार मांझी की जगह मंत्री पद के लिए रत्नेश सदा (Ratnesh Sada) का चयन निर्विवाद है. हर कोई कहेगा कि यह अवसर उन्हें पहले मिल जाना चाहिए था. खैर, विलम्ब से ही सही, रत्नेश सदा मंत्री तो बन गये! इसके लिए शुक्रगुजार उन्हें नीतीश कुमार के साथ-साथ जीतनराम मांझी का भी होना चाहिए. इसलिए कि संतोष कुमार मांझी जमे रहते तो मंत्री – पद का सुख उन्हें फिलहाल नहीं मिलता. विश्लेषकों के मुताबिक हाशिये पर पड़े रहते और पूर्व की तरह नीतीश कुमार उधर नजर तक नहीं फेरते.

नीतीश कुमार और रत्नेश सदा.

अहंकार देखिये...
जदयू का अहंकार देखिये, गया की राजनीति में जीतनराम मांझी का जवाब दिवंगत पर्वत पुरुष दशरथ मांझी (Dashrath Manjhi) के पुत्र भागीरथ मांझी (Bhagirath Manjhi) और उनके दामाद मिथुन मांझी (Mithun Manjhi) को बनाया है! हालांकि, इस आशय कि उसकी अपनी कोई घोषणा नहीं है, पर आम धारणा ऐसी ही है. यह जदयू के किस नेता के दिमाग की उपज है, नहीं कहा जा सकता. दोनों ससुर-दामाद की पहचान बस इतनी ही है कि वे दशरथ मांझी के परिवार के हैं. हालांकि, नेता बनने के लिए ऐसी कोई बाध्यता नहीं है. तब भी यह कुछ न कुछ मतलब तो रखता ही है कि दोनों का किसी भी रूप में राजनीति से कभी कोई जुड़ाव नहीं रहा है. उल्लेख करने लायक सामाजिक प्रतिष्ठा भी नहीं है. समाज में सम्मानित ‘पर्वत पुरुष’ (mountain Man) की अंतर्राष्ट्रीय पहचान है, जिस पर राजनीति की कोई परछाई नहीं है. भागीरथ मांझी और मिथुन मांझी का राजनीति के ‘पारसमणि’ जदयू से जुड़ाव हुआ है तो वे जीतनराम मांझी जैसे दिग्गज दलित नेता को टक्कर देने वाले बड़ा नेता तो हो ही जायेंगे! वैसे, जदयू नेतृत्व को इतनी समझ तो होनी ही चाहिए कि लोहा ही ‘पारसमणि’ से सट कर सोना बनता है, दूसरा कोई धातु नहीं! आगे-आगे देखिये होता है क्या.

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