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मोनाजिर हसन : मुश्किलें तो खड़ी कर ही देंगे …!

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संजय वर्मा
30 मई 2013

Patna : पूर्व मंत्री डा. मोनाजिर हसन (Dr. Monazir Hasan) जदयू से अलग हो गये. पार्टी की सदस्यता त्यागते हुए उन्होंने जदयू और राजद (RJD) पर मुस्लिमों के वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल से संबंधित जो गंभीर आरोप लगाये, उस पर तीखी प्रतिक्रिया होनी थी, तिलमिलाहट के रूप में हुई. लेकिन, बड़ी बात यह कि पार्टी से उनके जुड़ाव को जदयू इस कदर नकार देगा, ऐसा शायद ही किसी ने सोचा होगा. प्रदेश जदयू अध्यक्ष उमेश कुशवाहा (Umesh Kushwaha) ने सीधे तौर पर कहा कि डा. मोनाजिर हसन जदयू (JDU) में थे ही नहीं, तो छोड़ने की बात कैसी? नीतीश कुमार (Nitish Kumar) के अति करीबी नेता संसदीय कार्य मंत्री विजय कुमार चौधरी (Vijay Kumar Chaudhary) ने भी इन शब्दों का दोहराव किया. जदयू की उनकी सदस्यता के संदर्भ में वर्तमान सच क्या है, यह नहीं कहा जा सकता. पर, यह अकाट्य है कि 02 जुलाई 2018 को भाजपा (BJP) छोड़ कर वह जदयू में शामिल हुए थे और तत्कालीन प्रदेश जदयू अध्यक्ष सांसद वशिष्ठ नारायण सिंह (Vashishtha Narayan Singh) ने ‘घर वापसी’ के तौर पर उनका स्वागत किया था . पार्टी की प्राथमिक सदस्यता भी दी थी . बाद के दिनों में सदस्यता बनी रही , कोई सांगठनिक सक्रियता रही या नहीं , यह बताना कठिन है.

जायेंगे रालोजद के साथ!
बात अब डा. मोनाजिर हसन के अगले कदम की. जदयू से अलग होने के बाद अपनी राजनीति को नया मुकाम (New Stage) देने के लिए वह किसी दूसरे दल में शामिल होंगे या अपनी कोई पार्टी बनायेंगे, इसका खुलासा होना अभी शेष है.वैसे, ज्यादा संभावना राष्ट्रीय लोकतांत्रिक जनता दल (RLJD) सुप्रीमो उपेन्द्र कुशवाहा (Upendra Kushwaha) से गलबहियां करने की जतायी जा रही है. जो हो, विश्लेषकों की समझ में उनके इस फैसले से राज्य की राजनीति में भूचाल भले नहीं आये, ‘राजद तो है न’ के सुकून भरे मुगालते में जी रहे जदयू के समक्ष कुछ न कुछ मुश्किलें तो पैदा हो ही जायेंगी.

राजद से शुरू हुई थी राजनीति
राज्य की मुस्लिम सियासत (Muslim Politics)में अच्छा खासा महत्व रखने वाले डा. मोनाजिर हसन की राजनीति राजद से शुरू हुई थी. उसी पार्टी के उम्मीदवार के रूप में मुंगेर से विधायक चुने गये थे. राबड़ी देवी (Rabri Devi) की सरकार में मंत्री बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था. राजनीति ऐसा महसूस करती है कि हार के बाद के हालात का सामना करना शायद उनकी फितरत में नहीं है. 2005 में विधानसभा (Assembly) सभा का चुनाव हार गये तब राजद छोड़ सत्तारूढ़ जदयू में शामिल हो गये. तब के दौर में चर्चित इस मुस्लिम चेहरे को खुद से जोड़ जदयू धन्य हो उठा था. उन्हें उनकी अपेक्षा से कहीं ज्यादा तरजीह (Preference) मिलने लग गयी थी.

डॉ. मोनाजिर हसन जब भाजपा में शमील हुए थे.

यह है बड़ा कारण
उसी क्रम में पार्टी नेतृत्व ने 2009 के संसदीय चुनाव में भूमिहार समाज (Bhumihar Samaj) के बर्चस्व वाले बेगूसराय (Begusarai) से जदयू का उम्मीदवार बना राजनीति को चौंका दिया. बड़ी आसानी से वह जीत गये. लेकिन, मुंगेर (Munger) विधानसभा क्षेत्र से मोह खत्म नहीं हुआ. विश्लेषकों का मानना है कि यही मोह उनकी राजनीति में भटकाव का बड़ा कारण बन गया. जदयू का सांसद बनने के तकरीबन डेढ़ साल बाद 2010 में हुए विधानसभा के चुनाव में वह मुंगेर क्षेत्र की विरासत पत्नी शबनम परवीन (Shabnam Praveen) को सौंपना चाहते थे. इसके लिए उन्होंने पूरजोर कोशिश भी की. उस वक्त अनंत सत्यार्थी (Anant Satyarthi) मुंगेर से जदयू के विधायक थे. डा. मोनाजिर हसन का खूंटा उन्होंने ही उखाड़ा था. उन्हें बेदखल कर शबनम परवीन को अवसर उपलब्ध कराना जदयू नेतृत्व के लिए संभव नहीं था.


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देखना दिलचस्प होगा
डा. मोनाजीर हसन रुके नहीं. पूर्व के संबंधों के आधार पर शबनम परवीन को राजद की उम्मीदवारी दिलवा दी. मुख्य मुकाबले में वह रहीं, पर जीत नहीं पायीं. अपने सांसद डा. मोनाजिर हसन का यह आचरण जदयू को नागवार गुजरा. इसके बावजूद शबनम परवीन को उसने 2014 के उपचुनाव  (By-election) में मुस्लिम बहुल साहेबपुर कमाल से उम्मीदवारी दे दी. वहां भी हार ही मिली. भटकाव का सिलसिला आगे बढ़ा. अकल्पित- अप्रत्याशित निर्णय के तहत डा. मोनाजिर हसन जुलाई 2014 में भाजपा से जुड़ गये. चार वर्षों तक भगवा धारण किये रहे. किसी भी रूप में कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ. जुलाई 2018 में फिर से जदयू में शामिल हो गये. लेकिन, वहां भी हाशिए पर ही पड़े रहे. इस बार जदयू (JDU) से अलग होने के बाद किस्मत खुलती है या नहीं, देखना दिलचस्प होगा .

हकीकत यही है
वैसे, 2024 के संसदीय चुनाव (Parliamentary Elections) में बेगूसराय या मुंगेर से भाजपा के सहयोगी दल की उम्मीदवारी पाने का उन्होंने जो ख्वाब पाल रखा है उसके पूरा होने के दूर-दूर तक कोई आसार नहीं दिख रहे हैं. इस रूप में भी नहीं कि इन दोनों क्षेत्रों में भूमिहार समाज को नाराज कर भाजपा संसदीय चुनाव में अपना राजनीतिक – सामाजिक समीकरण को छिन्न-भिन्न करने का जोखिम शायद ही उठाना चाहेगी. विश्लेषकों की समझ है कि इन दोनों ही क्षेत्रों में इसी समाज से उम्मीदवार उतारना उसकी विवशता है. लोग इसे जिस दृष्टि से देखें या समझें, फिलहाल जमीनी हकीकत (Reality) यही है.

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