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आर. एस. भट्टी : होना भी तो यही था !

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 संजय वर्मा
16 अगस्त 2023

Patna : हर तरह से हताश-निराश बिहार (Bihar) को पुलिस महानिदेशक राजविंदर सिंह भट्टी (R S Bhatti) से बहुत उम्मीद थी. इस रूप में कि उनके कमान संभालने से ‘जंगलराज’ की तरफ बढ़ रहा ‘सुशासन’ का पांव ठिठक जायेगा. ‘कानून का राज’ पटरी पर आ जायेगा. बदतर विधि- व्यवस्था की वजह से अवरुद्ध ‘न्याय के साथ विकास’ रफ्तार पकड़ लेगा. परन्तु, वैसा कुछ नहीं हुआ, समस्या और गहरा ही गयी. तब भी पुलिस (Police) की इस विफलता के लिए मुकम्मल रूप में आर एस भट्टी को ही जिम्मेवार नहीं ठहराया जा सकता. पर, इस तर्क को भी सही नहीं माना जा सकता कि राज्य में शराबबंदी जनित नयी अर्थ व्यवस्था अपराध की रफ्तार बढ़ा दी है.

तब तो शराबबंदी नहीं थी!
इस कारण विधि-व्यवस्था का संधारण कठिन हो गया है. स्थिति पुलिस महानिदेशक आर एस भट्टी के नियंत्रण से बाहर हो गयी है. अवैध शराब की अबाध तस्करी और खुली बिक्री से विधि-व्यवस्था जरूर प्रभावित हुई है. पर, विफलता का ठीकरा इस पर फोड़ने जैसे हालात नहीं हैं. इसके मूल में शराबबंदी के रहने की समझ रखने वाले लोग अभयानंद (Abhayanand) और डी एन गौतम (D N Gautam) के कार्यकाल पर नजर दौड़ायें, तो बुद्धि खुद-ब-खुद खुल जायेगी. उस कालखंड में तो शराबबंदी नहीं थी? दोनों कहां खरा उतरे थे? असल में मर्ज कुछ और है दवा कुछ और दी जा रही है. ऐसे में हालात कैसे सुधरेंगे?

काबिलियत पर संदेह नहीं
आर एस भट्टी की काबिलियत संदेह से परे है. कड़क मिजाज, पर कर्तव्यनिष्ठ, अनुशासनप्रिय, न्यायशील व ईमानदार पुलिस अधिकारी हैं लालू-राबड़ी (Lalu-Rabri) शासनकाल के कथित ‘जंगलराज’ में अलग-अलग समय में कई जिलों में पुलिस अधीक्षक रहते उन्होंने इसे स्थापित किया था. वह जहां-जहां रहे शासन का इकबाल कायम रहा. पुलिस महानिदेशक के रूप में भी उनसे राज्य स्तर पर वैसे ही इकबाल की अपेक्षा थी, जो किसी भी रूप में पूरी होती नहीं दिख रही है. सत्ता के गलियारे की चर्चाओं पर भरोसा करें, तो उन्हें नीतीश कुमार (Nitish Kumar) की नाक का बाल बने उस रिटायर अधिकारी की आह लग गयी जो उनकी जगह किसी और की पदस्थापना के लिए जुगत भिड़ा रहे थे.

इस सवाल का जवाब नहीं
वैसे, पुलिस महानिदेशक के तौर पर उनकी पदस्थापना से एक बड़ा सवाल खुद-ब-खुद खड़ा हो गया कि जब सत्ताशीर्ष के दावे के अनुसार 17 साल से बिहार में ‘सुशासन’ है, ‘कानून का राज’ है, ‘न्याय के साथ विकास’ है तब फिर आर एस भट्टी जैसे कड़क पुलिस महानिदेशक की अपेक्षा जनता को और जरूरत नीतीश कुमार की सरकार को क्यों पड़ गयी? यह जानते- समझते हुए भी कि पूर्व के ऐसे ‘प्रयोग’ तनिक भी सुकूनदायक नहीं रहे? ‘सुशासन’ को लेकर ‘अपने मुंह मियां मिट्ठू’ बनी नीतीश कुमार की सरकार के पास इस सवाल का शायद कोई जवाब नहीं है. बल्कि ऐसे सवालों से उसे मुंह ही छिपाना पड़ जा रहा है.

वह भी थे कड़क मिजाज
विधि-व्यवस्था में भारी गिरावट को लेकर वर्तमान में आर एस भट्ठी जिस शर्मिंदगी को झेल रहे हैं, नीतीश कुमार के अब तक के शासन काल में कमोबेश पूर्व के तमाम पुलिस महानिदेशकों को झेलने पड़े हैं. मसलन 31 जनवरी 2019 को कृष्ण स्वरूप द्विवेदी (K S Dwivedi) की सेवानिवृत्ति के बाद गुप्तेश्वर पांडेय (Gupteshwar Pandey) ने पुलिस महानिदेशक का पदभार ग्रहण किया था. गुप्तेश्वर पांडेय भी कानून के अनुपालन के प्रति सख्त तेवर के साथ न्यायप्रिय पुलिस अधिकारी की पहचान रखते थे.


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सत्ताशीर्ष के भरोसेमंद
अपनी काबिलियत और सलाहियत की बदौलत लालू-राबड़ी शासनकाल से लेकर ‘सुशासन (Good Governance)’ तक में सत्ताशीर्ष के भरोसे पर खरा उतरते रहे. नीतीश कुमार के शासनकाल में पुलिस महानिदेशक के रूप में ताजपोशी से पहले उन्हें भले कोई महत्वपूर्ण पद नहीं मिला था, लेकिन शासनिक कार्यों में महत्व किसी भी बड़े पुलिस अधिकारी से कम नहीं था. उनकी दक्षता-क्षमता और सत्ता की नजर में उसकी अनिवार्यता को इस रूप में समझा जा सकता है कि उस कालखंड में राज्य में जहां कहीं भी विधि-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ती थी या अचानक उभरा साम्प्रदायिक तनाव (Communal Tension) खतरनाक रूप लेने लगता था, हालात पर काबू पाने के लिए आमतौर पर उन्हें ही भेजा जाता था. इसमें उन्हें सफलता भी मिल जाती थी.

थोड़ा भी सुधार नहीं हुआ
लेकिन, पुलिस महानिदेशक (Director General of Police) के रूप में उपलब्धि क्या रही? यह सवाल अब भी उसी रूप में मौजूद है. वजह सियासी महत्वाकांक्षा रही हो या शासन का दबाव, गुप्तेश्वर पांडेय ने अवकाश ग्रहण की निर्धारित तारीख- 28 फरवरी 2021-से पांच माह पूर्व 22 सितम्बर 2020 को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली. पद छोड़ते ही जदयू (JDU) से जुड़ गये. मंशा शायद विधानसभा का चुनाव लड़ने की थी, जो पूरी नहीं हो पायी. इस कारण ही उनकी स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति को राजनीतिक नजरिये से देखा गया. सब कुछ आनन-फानन में हुआ. गुप्तेश्वर पांडेय 20 महीने तक पुलिस महानिदेशक रहे. उस दौरान कानून-व्यवस्था की स्थिति क्या रही? पूर्व की तुलना में थोड़ा-सा भी सुधार दिखा? जवाब नकारात्मक (Negative) ही होगा.

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