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नवरात्र : मंदिर में तीनों रूप में विराजमान हैं मां दुर्गा!

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एस एन श्याम
20 अक्तूबर 2023

Patna : बड़ी पटन देवी में मां तीनों रूप में विराजमान हैं इसलिए जो भी भक्त उनके दरबार में हाजिरी लगाता है उसे बुद्धि, वैभव और बल तीनों की प्राप्ति होती है. इस कारण ही इनका नाम सर्वानंदकरी पड़ा है. सच्चे दिल और पवित्र उद्देश्य से मां के समक्ष मत्था टेकने और अराधना करने वाले भक्तों की हर मनोकामना (Desire) पूरी होती है. बड़ी पटन देवी के महत्व को इस रूप में समझा जा सकता है कि लोग प्रत्येक मांगलिक कार्य के बाद मां का आशीर्वाद पाने वहां जरूर पहुंचते हैं. वैसे तो वहां भक्तों की रोज भीड़ लगती है. पर, नवरात्र का नजारा कुछ और ही होता है. उस दौरान हजारों श्रद्धालु (Devotee) मनोकामना सिद्धि के लिए आते हैं.

मिलता है आशीर्वाद
महासप्तमी को महानिशा पूजा, महाष्टमी को महागौरी और नवमी को सिद्धिदात्री देवी के पूजन के बाद हवन और कुंवारी पूजन में भारी भीड़ जुटती है. दशमी को अपराजिता पूजन, शस्त्र पूजन और शांति पूजन होता है. आम धारणा यह भी है कि अर्द्धरात्रि के समय पूजा और आरती के बाद पट खुलते ही जो भक्त मां का दर्शन करता है उसे साक्षात भगवती का आशीर्वाद प्राप्त होता है. सामान्य समय में हर मंगलवार को माता का शृंगार होता है. अन्य दिन सिर्फ फूल बदल दिये जाते हैं. नवरात्र में शृंगार दो दिन किया जाता है. नवरात्र (Navratri) के पहले दिन और महानिशा पूजा के दिन. शृंगार के समय मंदिर का पट बंद रखा जाता है.

तब भी विकास नहीं
मंदिर में श्रद्धाभाव से नियमित मत्था टेक मां का दर्शन करने वाले कई व्यक्ति आज की तारीख में बिहार के दिग्गज नेता हैं. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (Nitish Kumar) भी शारदीय नवरात्र में महाष्टमी के दिन मां के दरबार में हाजिरी लगाते हैं. पूर्व पथ निर्माण मंत्री नंदकिशोर यादव तो वहां के निवासी ही हैं. पटना साहिब से कई वर्षों से विधायक हैं. पूर्व केन्द्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद पटना साहिब से भाजपा के सांसद हैं. पटना नगर निगम (Patna Municipal Corporation) की महापौर सीता साहू  पटन देवी मंदिर के ठीक पीछे रहती हैं. वहां उनका पुश्तैनी मकान है. इसके बावजूद पटन देवी मंदिर का अपेक्षित विकास नहीं हो पाया है.

छोटी पटनदेवी मंदिर
बड़ी पटन देवी (Badi Patan Devi) मंदिर से लगभग 6 किलोमीटर दूर गुरुद्वारा पटना साहिब तख्त श्री हरिमंदिर के समीप है छोटी पटन देवी मंदिर. धर्मग्रंथों में ऐसा कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं है, पर छोटी पटन देवी के महंत आचार्य अभिषेक अनंत द्विवेदी के अनुसार सती की पीठ का कुछ भाग यहां गिरा था इसलिए इसे भी शक्तिपीठ माना जाता है. कुछ इतिहासकारों और बड़ी पटन देवी के महंत विजय शंकर गिरि की बातों पर विश्वास करें, तो मुगल सम्राट अकबर के सेनापति राजा मान सिंह ने सोलहवीं-सत्रहवीं सदी में इस मंदिर का निर्माण कराया था. ईस्वी कौन थी इसकी प्रामाणिक जानकारी शायद कहीं नहीं है. इस मंदिर में गणेश, विष्णु , शंकर एवं सूर्य की छवियों को बरकरार रखा गया है.


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मुख्य पीठासीन देवता
सन् 1811-12 के मध्य पटना और गया जिलों का सर्वेक्षण करनेवाले इतिहासकार (Historian) फ्रांसिस बुकानन (बाद में हैमिल्टन) के मुताबिक कभी इस मंदिर को पटना का मुख्य पीठासीन देवता माना जाता था. अठारहवीं और उन्नसवीं सदी में शहर के मुख्य दरवाजे पर स्थित यह मंदिर सुरक्षा एवं रक्षा की दृष्टि से कुछ अधिक जनप्रिय था. कहा जाता है कि इसी मकसद से प्राचीन नगर के पूरब दरवाजा पर राजा मान सिंह ने नगर रक्षिका के रूप में देवी को स्थापित किया था. इस मंदिर की मूर्तियां भी सतयुग (Satyug) की बतायी जाती हैं.

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