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हाजीपुर का रामचौरा: दो बार पधारे थे श्रीराम

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अश्विनी कुमार आलोक
23 जनवरी 2024

Hajipur : तुलसी दास ने ‘सियराममय सब जग जानी’ कहकर समूचे संसार को प्रणाम निवेदित किया है. समूचे संसार में राम रमते हैं. राम रमण करते हैं, तभी राम हैं. राम बिहार की धरती पर अनेक बार आये-गये. तब, इस परिक्षेत्र का नाम बिहार भले नहीं था, लेकिन आज के बिहार में हजारों साल पुरानी मान्यताओं से जुड़ी हुईं किवंदितयों पर लोगों का विश्वास कम नहीं हुआ है. वैशाली का एक पुराना मुहल्ला रामकथा की मान्यताओं के साथ बसा हुआ है. वैशाली (Vaishali) जिला मुख्यालय में अवस्थित है रामचौरा. गंगा-गंडक और माही नदी का संगम क्षेत्र. उत्तर से आकर दक्षिण की ओर मुड़ती हुई गंडक नदी अचानक गंगा नदी में समाहित हो गयी है.

रामभद्र मुहल्ला
कुछ ज्ञानियों का मत है कि बहुत पहले यहां माही नाम की कोई पतली-सी नदी बहती थी. बड़ी नदियां अपने पीछे छारन छोड़ती चलती हैं. अनेक बार वे बरसात के समय में जल-संपन्न होकर नदियां बन जाती हैं. संभवतः ‘माही’ भी उन्हीं में से एक रही होगी. कोसी-क्षेत्र में तो ऐसी अनेक नदियां जन्मी और खो भी गयीं, जैसे धर्ममूला नदी, दुलारीदाय नदी आदि. गंगा-जमुना के संगम (Confluence) में सरस्वती नदी के विलीन होने की कथा तो पुराणों ने भी कही हैं. कभी इसी तरह गंगा और गंडक के संगम के लिए ‘माही’ ने अपना अस्तित्व मिटा दिया था, दो विपुल धाराओं के बीच माही ने अपने को मिटा दिया था. इसी संगम के समीप रामभद्र मोहल्ला है, जहां रामचौरा अवस्थित है. कभी मिट्टी के टीले पर राम (Ram) और उनके छोटे भाई लक्ष्मण (Laxman) ने विश्राम किया था, ऐसा कहा जाता है.

भव्य मंदिर है वहां
राम के चरणचिह्न को स्थानीय लोगों ने बचा लिया था. मान्यता है कि मुनियों को त्रस्त करने वाले असुरों का नाश करने के लिए विश्वामित्र जिन दो दशरथ कुमारों को लेकर जा रहे थे, उन्हें तत्कालीन क्षेत्रवासियों ने असाधारण (Exceptional) माना था. लोगों को यह भरोसा था कि इन्हीं दोनों राजपुत्रों से उनके प्राण और प्रतिष्ठा की रक्षा हो सकती है. राम के सुरक्षित किये गये उन चरणचिह्नों की पूजा की जाने लगी. कालांतर में किसी श्रद्धालु ने वहां एक छोटा-सा मंदिर बनवा दिया था. अब वहां एक विशाल और भव्य मंदिर बनवाया जा रहा है.


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रामदाने की लाई
प्रति वर्ष रामनवमी को रामचौरा (Ramchaura) में बहुत श्रद्धा से लोग जुटते हैं, शोभायात्रा निकाली जाती है. मेला लगता है. रामदाने की लाई और बेल सदियों से यहां भगवान राम को अर्पित किये जाते हैं. यहां का प्रसाद लाई और बेल ही है. रामभद्र मुहल्ले में एक लोकगीत प्रसिद्ध हैं-‘राम नहैलन गंगा रामचौरा घाट’. कहते हैं, जिस समय विश्वामित्र के रक्षार्थ राम और अनुज लक्ष्मण तारका को बध के लिए चले थे, तत्कालीन वृज्जि जनपद के राजा सुमति ने उनका स्वागत किया था. राम-लक्ष्मण और विश्वामित्र नदी मार्ग से आये थे. तीनों ने यहां स्नान किया था और गंगा की पूजा-अर्चना की थी. कहते हैं कि सीता स्वयंवर के बाद राम ससुराल जाने के क्रम में एक बार और इस स्थल पर विश्राम के लिए रुके थे.

वैशाली महोत्सव
मेघालय के गारो हिल्स में बाजा वक्रम की पहाड़ियों पर राम के चरणचिह्न आज भी सुरक्षित हैं. ‘गारो रामायण’ में इसका उल्लेख भी है. रामचौरा का उल्लेख भले किसी प्रसिद्ध कृति में नहीं है, लेकिन वैशाली के इतिहासकारों (Historians) एवं लोकमान्यता- विशेषज्ञों (Popularity – Experts) ने अनेक आधुनिक साहित्य-पुस्तकों में रामचौरा और यहां की मान्यताओं पर आलेख लिखे हैं. वैशाली महोत्सव स्मारिकाओं एवं वैशाली जिला स्थापना दिवस समारोह स्मारिकाओं में भी रामचौरा- रामभद्र का उल्लेख हुआ है.

मुंडन करवाया था
कथा यह भी है कि राम ने यहां अपना मुंडन करवाया था. उनके चरण-चिह्न जिस स्थल पर सुरक्षित किये गये थे, वह भूमितल से पैंतालीस मीटर की ऊंचाई पर था. कुछ लोगों ने बताया कि ‘रामचौरा’, ‘रामचउरा’ के रूप में अपभ्रंश को पालि और प्राकृत के अनेक ग्रंथों ने आदर दिया है. कभी रामभक्त और कवि शिरोमणि तुलसीदास का भी आगमन हुआ था. उन्होंने श्रीराम- जानकी, लक्ष्मण और हनुमान की पूजा की थी. मंदिर की दक्षिण-पश्चिम दिशा में यज्ञकुंड की निर्माण-शैली,यज्ञावशेष, हवन-सामग्री, खंडित भांड और यज्ञावशेष मिले थे. कोनहारा घाट के समीप तुलसीदास (Tulsidas) का एक मंदिर भी बनवाया गया है. इसे तुलसीदास की उपासना-स्थल माना जाता है.

ऐसे पड़ी थी मंदिर की नींव
इधर के दिनों में रामचौड़ा में राम के चरणचिह्न की एक अन्य प्रतिकृति बनवायी गयी है. रामचौड़ा में राम भी भक्ति से आकर्षित होकर आये थे मदनमोहन अग्रवाल. वह पटनासिटी के निवासी थे. उन्होंने एसे भग्न और प्राचीन मंदिर के निकट एक विशाल एवं भव्य मंदिर की नींव रख दी. अन्य श्रद्धालुओं ने भी सहयोग किया. वह मंदिर अब लगभग पूरी तरह तैयार है. श्रद्धालुओं ने नये मंदिर में पूजा-अर्चना शुरू कर दी है. लेकिन, मंदिर के पास पचपन बीघे में विस्तृत कोई बड़ा भूखंड भी था. स्थानीय लोगों ने उस पर कब्जा कर लिया है. कुछ लोगों ने इस अतिक्रमण (Encroachment) के विरुद्ध आवाज उठायी. लेकिन, प्रशासन की ओर से कोई सकारात्मक कदम (Positive Steps) नहीं उठाया जा सका. लोगों की आवाज दबकर रह गयी. रामकथा की लोकमान्यताओं के संरक्षण का प्रयास, पर्यटन विभाग को भी करना चाहिये, वैशाली जैसे प्रसिद्ध क्षेत्र को इससे और लाभ होता.

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