तापमान लाइव

ऑनलाइन न्यूज़ पोर्टल

हरिहर क्षेत्र मेला : अस्तित्व खो रही साधु गाछी

शेयर करें:

अवध किशोर शर्मा
05 दिसम्बर 2023

Sonpur : सोनपुर के एशिया प्रसिद्ध हरिहर क्षेत्र मेले का व्यावसायिक हृदय स्थल नखास है तो आध्यात्मिक दिल और दिमाग साधु गाछी में बसते हैं. वर्तमान में हालात ऐसे बन गये हैं कि साधु गाछी के अस्तित्व पर ही संकट पैदा हो गया है. साधु-संतों की यह आश्रय स्थली बड़ी तेजी से रिहायशी बस्ती में परिवर्तित होती जा रही है. परिणामस्वरूप साधु गाछी का दायरा दिन- प्रतिदिन सिमटता जा रहा है. स्थानीय कुछ लोगों के साधु गाछी क्षेत्र पर स्वामित्व जताने, अवैध बिक्री करने या फिर अपना आशियाना बनाने के कारण यह स्थिति उत्पन्न हुई है. एक दशक पूर्व जिस किसी ने भी मेला क्षेत्र के हाथी बाजार और साधु गाछी का मुआयना किया होगा, उन्हें अब साधु गाछी बदला-बदला सा दिखेगी. वहां मकान, दुकान और व्यावसायिक प्रतिष्ठान (Professional Establishment) धड़ल्ले से आकार ग्रहण कर रहे हैं.

तब होता था तपोस्थली का बोध
ऐसी स्थिति मुख्य रूप से इस वजह से पैदा हुई है कि रैयतों ने अपने कब्जे की जमीन बेचना शुरू कर दिया है या उस पर खुद का कारोबार खड़ा कर लिया है. जहां साधु-महात्मा कभी धूनी रमाते थे, वहां बड़े-बड़े मकान मुस्कुराते-इठलाते नजर आ रहे हैं. इस कारण साधु गाछी क्षेत्र में नारायणी नदी के किनारे स्थापित अनेक मठ-मंदिर अब मुख्य सड़क से स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देते. इसी जगह कभी कार्तिक पूर्णिमा के एक दिन पूर्व से लेकर सप्ताहांत तक प्रदेश के विभिन्न भागों से आये साधु-संतों की मंडलियों के शिविर लगते थे. जगह-जगह आयोजित संतों के प्रवचन और महाभंडारा के दृश्य अपने आप में मनोरम होते थे, सोनपुर के सचमुच तपोस्थली होने का बोध कराते थे. संतों का सत्संग आत्मिक सुख प्रदान करता था.

संपूर्ण भूमि संतों की!
वे सब अब भी दिखाई देते हैं, पर स्थान बदलता जा रहा है. साधु गाछी के रिहायशी मकानों, मठ-मंदिरों के बीच में अवस्थित जगहों और नारायणी नदी के तटीय इलाके काली घाट, सबलपुर में गंगा- गंडक संगम स्थल जाने वाले मार्गों पर साधुओं ने अपना खेमा गाड़ना और प्रवचन करना शुरू कर दिया है. पहले साधु गाछी में प्रवचन, भजन, कीर्तन और भंडारा चलता था. जप, तप और होम से सम्पूर्ण वातावरण पवित्र और सुवाषित रहता था. खुली जगह की कमी के कारण वह अब अन्यत्र विस्तारित हो रहा है.नारायणी नदी के पश्चिमी किनारे साधु गाछी का क्षेत्र, दक्षिणी हाथी बाजार से काली घाट मही नदी मुहाना के बीच की संपूर्ण भूमि संतों की है. मेला के दौरान कार्तिक पूर्णिमा के आरंभिक एक सप्ताह के भीतर तक यह भूमि तपोभूमि के रूप में तब्दील रहती है.

यह स्थिति है साधु गाछी की.

बन गये दुकान व प्रतिष्ठान
सोनपुर मेला क्षेत्र की समस्याओं की बारीकियों को समझने वाले सोनपुर नगर पंचायत के मानपुर ग्राम निवासी वरिष्ठ साहित्यकार एवं ‘हरिहर क्षेत्र’ पुस्तक के लेखक सुरेन्द्र मानपुरी कहते हैं कि प्रारंभ से मेले का दो प्रमुख क्षेत्र रहा है. एक धर्म एवं आध्यात्मिक का और दूसरा व्यापार का. व्यापार का क्षेत्र तो आज भी पहले की तरह ऊंचाई पर है. लेकिन, आध्यात्मिक क्षेत्र (Spiritual Realm) स्थान की कमी के कारण प्रायः सिमट गया है. गजेन्द्र मोक्ष चौक से काली घाट तक का एक किलोमीटर लंबा और आधा किलोमीटर चौड़ा भाग साधु गाछी नाम से ख्यात है. नारायणी नदी के तट पर स्थित साधु गाछी में बड़े-बड़े मकान और प्रतिष्ठान बन गये हैं. इस कारण साधु गाछी में 30 साल पहले की तुलना में विभिन्न संप्रदायों के साधुओं की संख्या एक चौथाई से भी कम रह गयी है.

हो रहा मर्यादा का हनन
अकेले वैष्णव संप्रदाय के दूसरे राज्यों से आनेवाले दो दर्जन से अधिक साधुओं की मंडली अब नहीं आती. हालांकि, कबीर पंथियों के कई आश्रम, सिक्खों का एक शिविर और सर्व संप्रदाय के दो-तीन अखाड़े अब भी आ रहे हैं.50 साल पहले तक साधुओं की संख्या 50 हजार से अधिक हुआ करती थी, अब पांच- छह हजार की संख्या में ही पहुंच पाते हैं. ऐसा इसलिए हो रहा है कि कभी किताबों में एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला कहा जानेवाला यह क्षेत्र व्यवसाय और बाजारवाद की अंधी दौड़ में शामिल हो गया है. मेले की मूल आत्मा धर्म (Religion) और अध्यात्म (Spirituality) बदले स्वरूप में ही सही, कायम है. सोनपुर नगर पंचायत के पूर्व पार्षद अभय कुमार सिंह, अधिवक्ता बताते हैं कि अनियमित और बेतरतीब तरीके से साधु गाछी में मकान बनने से इस सनातन तीर्थ की मर्यादा का हनन हो रहा है.


ये भी पढें :
सामाजिकता ही नहीं संवेदनशीलता भी
समंदर कोई कहता है, कोई कतरा समझता है…
उस दिन पांच लाख गांवों में भी होगा अयोध्या जैसा आनंदोत्सव


दिखानी होगी गंभीरता
श्री गजेन्द्र मोक्ष देवस्थानम् दिव्य देश पीठाधीश्वर जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामी लक्ष्मणाचार्य साधु गाछी के सिकुड़ने से काफी व्यथित हैं. उनके मुताबिक दो दशक पहले तक हर साल हजारों साधु, नागा संत, विदेशी पर्यटक मेला देखने आते थे. मेला क्षेत्र बहुत विशाल होता था. हाजीपुर (Hajipur) के कोनहारा घाट से पहलेजा घाट तक फैले छत्तर मेला घूमने में पर्यटकों को दो दिन लग जाते थे. साधु गाछी में साधुओं और हाथी मेला समेत पूरे मेला क्षेत्र घूमने में चार पांच दिन. स्वामी लक्ष्मणाचार्य जी का कहना है कि अब पांच से छह घंटे में लोग मेला घूम लेते हैं. नब्बे के दशक में सोनपुर के बड़े जमींदारों में गिने जाने वाले बच्चा बाबू का घोड़ा, हाथी, शेर, बाघ, पशु-पक्षी भी मेला के आकर्षण हुआ करते थे. नाव का पुल, सीढ़ी घाट हाजीपुर से साधु गाछी सोनपुर के पुलघाट के लिए भीड़ सम्हालते बड़ा मनोहारी दृश्य बनाता था. स्वामी लक्ष्मणाचार्य जी महाराज का मानना है कि मेला के प्राचीन भव्य स्वरूप को फिर से निखारने में राज्य सरकार (State Government) को गंभीरता दिखानी होगी. अन्यथा उसकी उदासीनता और स्थानीय लोगों की लोलुपता इसे औपचारिकता (Formality) में समेट देगी.

#Tapmanlive

अपनी राय दें